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'ऐ दिल्ली, मेरे वतन की धड़कन, जरा मुझे जवाब दो'

News18Hindi
Updated: November 15, 2019, 10:45 AM IST
'ऐ दिल्ली, मेरे वतन की धड़कन, जरा मुझे जवाब दो'
तमाम कोशिशों के बाद भी दिल्ली में वायु प्रदूषण कम नहीं हो रहा है.

जानलेवा प्रदूषण से जूझती और पढ़ती एक बेटी के माता-पिता की एक चिट्ठी दिल्ली (Delhi) के नाम.

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  • Last Updated: November 15, 2019, 10:45 AM IST
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ऐ दिल्ली, मेरे वतन की धड़कन...कई दिनों से बहुत परेशान हैं हम... क्योंकि हमारी धड़कन, हमारी बिटिया दिल्ली (Delhi) में पढ़ती है. हम उसके माता-पिता हैं. इन दिनों बहुत बेचैनी है भीतर. हालांकि हमारा स्वभाव परेशान होने वाला नहीं है. हम हमेशा सुलझाने, बुनने, गुनने और बढ़ते रहने में यकीन करते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से लगता है, जैसे कुछ छूटता जा रहा है हाथ से. आज लगा, तुम तक अपनी बात पहुंचा दें, तो शायद कुछ सुकून आए. शायद तुम हमारा दर्द समझ कर उसे दूर करने में हमारी मदद करो .

तो सुनो दिल्ली, इस यकीन के साथ आज अपनी बेचैनी की वजह तुमसे साझा कर रहे हैं कि तुम हमारे दिल की बात को सुनने, समझने का वक्त निकालोगी? सिस्टम को झकझोरोगी, सियासतदानों को जगाओगी. हम इतने स्वार्थी नहीं कि केवल बेटी के ही बारे में सोचें. दिल्ली हमें तुम्हारा भी ख्याल है, तुम्हारे दर्द का भी ख्याल है, लेकिन उसके साथ ही सवाल दर सवाल हैं.


27 अक्टूबर के बाद से तुम दिवाली के पटाखों और पंजाब-हरियाणा में जलती पराली की वजह से गैस चैंबर में बदलती गईं. दिल्ली का दम घुटता जा रहा है. मेरी बेटी को मास्क लगा कर घूमना पड़ा रहा है, उसे सांस लेने में घुटन महसूस हो रही है. उस जैसे तमाम बेटे-बेटियां, बच्चे, स्त्री-पुरुष, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, वनस्पतियां, नदियां, स्थायी, अस्थायी निवासी सबके फेफड़े शुद्ध सांस नहीं ले पा रहे. मुंह पर मास्क जिंदगी का हिस्सा तो बन गया, लेकिन जिंदगी नहीं दे पा रहा, खूबसूरत भी नहीं लगता. डॉक्टर कहते हैं कि इस वक्त जहरीली आबोहवा में दिल्ली का हर शख्स हर रोज 40 सिगरेट के बराबर प्रदूषित धुंआ सांसों के जरिए पी रहा है. भविष्य में कमजोर फेंफड़े कितनी सांसें ले पाएंगे, जिंदगी का कितना साथ निभा पाएंगे, कह नहीं सकते.

14 नवंबर को भी रात तक हमारी आंखें दिल्ली के एयर पॉल्युशन इंडेक्स को मापती रहीं. रात 9 से 10 बजे के दरमियान इंडेक्स 443 के आंकड़े को छू रहा था, सुबह तो ये 475 से लेकर कई इलाकों में 5 सौ से ऊपर छूता रहा. मौसम, पर्यावरण वैज्ञानिक इस आंकड़े को जानलेवा और अतिगंभीर बताते हैं. स्कूल में छुट्टी है. हेल्थ इमरजेंसी घोषित है. लोगों को अधिकांश समय घर पर रहने को कहा जा रहा. मेरे एक मित्र ने खबर दी कि दिल्ली के आनंद विहार समेत कुछ इलाकों मे लगे प्रदूषण मापक यंत्र हटा लिए गए हैं, ताकि लोगों को एयर पॉल्युशन इंडेक्स का पता ही ना चले और ऐसा भ्रम पैदा हो कि प्रदूषण उतना नहीं, जिसे हम गंभीर या जानलेवा कह सकें.

दिल्ली में लोग दिनभर मास्क पहने के लिए मजबूर हैं. खासकर ट्रैफिक पुलिस के लिए तो ये और बड़ी मुसीबत है.


लोग कहते हैं दिल्ली बेदिल वालों की...
प्रदूषण को झेलने की बेशर्म आदत के कारण तो ऐसा नहीं कहा जाता? अब देखो न सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर को दिल्ली के प्रशासन के मुखिया को फटकारा कि हवा में जहर को पी रही जनता की फिक्र नहीं, तुम दिल्ली धूल और कचरा नहीं हटा सकते, तो कुर्सी पर क्यों बैठे हो? नेताओं और सरकारों की लानत-मलानत की, लेकिन किसी के माथे पर कोई बल नहीं दिखता. दिल्ली, हम दोनों पति-पत्नी कभी अकेले, कभी साथ-साथ अपनी अब तक की जिंदगी में तुमसे मिलने कुल जमा 20 बार आए. तुम्हारे साथ रहने का लंबा अवसर नहीं मिला, बावजूद इसके तुम हमें अपनी सी लगती हो? तुमसे बचपन ही से बहुत जुड़ाव महसूस होता है? तुमको लेकर एक सपना हमेशा रहता था कि कभी तुम्हारे साथ या आसपास रहने का मौका मिले, लेकिन छोटे शहरों और गांव के कई लोगों के लिए तुम तक पहुंचना मुश्किल था. हां, लेकिन असंभव नहीं थीं. शायद इसीलिए कहावत भी बन गई कि दिल्ली अभी दूर है या अब दिल्ली दूर नहीं ?
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सच भी तो है तुम कोई मामूली जगह नहीं हो, देश का दिल हो, जहां से धड़कता हुआ तुम्हारा रक्त-श्वास प्रवाह देश के हर हिस्से तक पहुंचता है. हम दोनों तो नहीं आ पाए तुम तक, लेकिन तुम तब हमें और प्रिय हो गई, जब हमने अपनी बेटी को अपनी आंखों में तुम्हारा ख्बाब संजोए देखा. वो जब छोटी थी, तबसे कहती थी कि मैं दिल्ली पढ़ने जाऊंगी, इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार घूमकर, उन्हें चूमकर वहां से दुनिया में अपनी जिंदगी की खूबसूरत नई उड़ान भरूंगी. बेटी ने सपना देखा, अपनी मेहनत से उसे हकीकत की जमीन पर उतारकर दिल्ली तुम्हें अपनी बाहों में भर लिया, तुम्हारा साथ पा लिया. मैं बहुत खुश थी उस दिन, जब उसे दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला मिला. तय हो गया कि अब उसके सपनों की उड़ान को और हौसला मिलेगा? मैं बहुत खुश था ही, बिटिया की मां के चेहरे पर गर्व और विश्वास से भरी दमक तो देखने के लायक ही थी, लेकिन दिल्ली मेरी खुशी इन दिनों घबराहट में तब्दील होती जा रही है.


हम भोपाल में रहते हुए अपनी बेटी के लिए हर पल चिंतित हैं, बेचैन हैं. हमारी बेचैनी की वजह तुम्हारी गलियों में बहने वाली जीवनदायनी हवा का लगातार ज़हरीला होता जाना है. ऐ दिल्ली, हमारी बेटी की तरह हर साल पूरे देश के छोटे-बड़े गांव-शहरों के हजारों बच्चे तुम्हारे साथ धड़कते हुए, तुम्हारे साथ रहते हुए अपनी किस्मत संवारने की सोचते हैं. दिल्ली तुम तो सब जानती हो कि ये बच्चे अपने सपनों को पूरा करने जब तुम्हारे पास आते हैं, तब वे तमाम मुश्किलों से जूझते हैं. अपना घर, अपना शहर उन्हें इसलिए छोडना पड़ता है कि वहां उतने अवसर और एक्सपोजर नहीं है, लेकिन अब हमें अपने बच्चों की सुरक्षा, खाना-पीना रहने से ज्यादा इस बात का डर लगा रहता है कि बच्चे ढंग से सांस भी नहीं ले पा रहे. बेटी के ऐसे फ्यूचर का हम क्या करेंगे, जहां जिंदगी और जिस्म दोनों बीमार हों. हम क्या करें, बताओ न, हमें तुमसे भी उतना ही प्यार है, जितना अपनी बेटी से....

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First published: November 15, 2019, 10:40 AM IST
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