जब SC के दखल के बाद जगदंबिका पाल को 1 दिन में छोड़ना पड़ा था UP CM का पद

उत्तर प्रदेश विधानसभा के 1997 के चुनाव ने तब रोचक मोड़ ले लिया था जब कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को एक दिन में ही मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. जगदम्बिका पाल वर्तमान में बीजेपी सांसद हैं.


Updated: May 18, 2018, 3:06 PM IST
जब SC के दखल के बाद जगदंबिका पाल को 1 दिन में छोड़ना पड़ा था UP CM का पद
प्रतीकात्मक फोटो

Updated: May 18, 2018, 3:06 PM IST
कर्नाटक के दंगल को एक नया ट्विस्ट देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार शनिवार को शाम चार बजे विधानसभा में शक्ति परीक्षण करे.  प्रोटेम स्पीकर आरवी देशपांडे को शक्ति परीक्षण कराने की जिम्मेदारी दी गई है.

सुप्रीम कोर्ट में बीएस येदियुरप्पा की तरफ से पेश हुए मुकुल रोहतगी ने इसके लिए समय मांगा, हालांकि कोर्ट ने कहा कि अब और समय नहीं दिया जा सकता है.

आइये राज्यों के उन चुनावों पर नजर डालते हैं जिनके लिए पार्टियों को कोर्ट जाना पड़ाः

उत्तर प्रदेश, 1997

उत्तर प्रदेश विधानसभा के 1997 के चुनाव ने तब रोचक मोड़ ले लिया था जब कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को एक दिन में ही मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. जगदम्बिका पाल वर्तमान में बीजेपी सांसद हैं.

पाल को उत्तर प्रदेश की राजनीति का 'वन डे' वंडर कहा जाता है. वह हाई पॉलिटिकल ड्रामे के बाद एक दिन के मुख्यमंत्री बने थे. जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उन्हें सीएम बनाया था तब इससे बीजेपी नेता कल्याण सिंह सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे.

1998 में 21-22 फरवरी को राज्यपाल भंडारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव दिया था. इसे लेकर विधानसभा में काफी हंगामा हुआ और बाद में केंद्र सरकार ने प्रस्ताव ठुकरार दिया.
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इस बात से खुश बीजेपी के सीएम उम्मीदवार कल्याण सिंह ने 93 सदस्यों की कैबिनेट का गठन कर दिया. इस कैबिनेट में उन्होंने अन्य पार्टियों के सदस्यों को भी शामिल किया था. उनके इस कदम से नाराज दूसरी पार्टियों ने सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी.

जब भंडारी ने उनकी सरकार को रातोंरात डिसॉल्व करने का फैसला किया तब कल्याण को बड़ा झटका लगा था. इसके बाद पाल ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. उन्होंने सीएम पद की शपथ भी ली लेकिन 1 दिन में ही उन्हें सीएम पद छोड़ना पड़ा था.

झारखंड 2005

सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2005 को झारखंड विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर को फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश दिए. यहां राज्यपाल द्वारा नियुक्त मुख्यमंत्री शिबु सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा आमने-सामने थे.

चीफ जस्टि आरसी लाहोटी, जस्टिस वायके सभरवाल और जस्टिस डीएम धर्माधिकारी की बेंच ने फैसला दिया कि अर्जुन मुंडा ने अंतरिम राहत के लिए मजबूत पक्ष रखा है.

इस बेंच ने राज्यपाल सय्यद सिबती राजी के विधानसभा में एंग्लो इंडियन सदस्य की नियुक्ति पर भी रोक लगा दी. कोर्ट ने कहा था कि फ्लोर टेस्ट के बाद जब सरकार बनेगी तब एंग्लो इंडियन सदस्य की नियुक्ति होगी. कोर्ट ने कहा कि सदन के निर्वाचित सदस्य ही फ्लोर टेस्ट में शामिल होंगे.

उत्तराखंड 2016
मोदी सरकार को बड़ा झटका देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 21 मई 2016 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को खारिज कर दिया था. इसके बाद राज्य में हरीश रावत की कांग्रेस सरकार को 29 अप्रैल तक बहुमत साबित करने का मौका दिया गया था.

केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए 27 मार्च को चीफ जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि राष्ट्रपति शासन लगाना सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ होगा.

 

गोवा, 2017
गोवा में 2017 में इसी तरह की स्थिति बनी थी. राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने बीजेपी नेता मनोहर पर्रिकर को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. यहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. बीजेपी ने गोवा में 40 में से 13 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

गोवा कांग्रेस लीडर चंद्रकांत कवलेकर 13 मार्च 2017 को कोर्ट पहुंचे थे. उन्होंने पर्रिकर को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के राज्यपाल के फैसले का विरोध किया था. तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आरके अग्रवाल की बेंच ने फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था.

तब कवलेकर के की तरफ से पेश हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि गोवा में किसी पार्टी के बीच प्री-पोल गठबंधन नहीं हुआ था ऐसे सबसे बड़ी पार्टी के नेता से बात किए बिना राज्यपाल यह तय नहीं कर सकतीं कि किसे सरकार बनाने के लिए न्यौता देना है. राज्यपाल को पहले सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना था.

इस पर कोर्ट ने आदेश दिया था कि ऐसी परिस्थितियों में राज्यपाल अपने विवेक से फैसला कर सकते हैं.

तमिलनाडु, 2017
मद्रास हाईकोर्ट ने 20 सितंबर 2017 को तमिलनाडु विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराने पर रोक की अवधि बढ़ा दी थी. इसके साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा की 18 सीटों पर उपचुनाव कराने पर भी रोक लगा दी थी.

इस मामले में विधानसभा से बर्खास्त किए गए 18 विधायकों ने विधानसभा स्पीकर  के फैसले के खिलाफ कोर्ट में रिट दाखिल की थी. वहीं डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन ने फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की थी.

 
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