कोरोना वायरस: पांच दिन ड्यूटी, दो दिन शवों का कफन-दफन करता है ये पॉवरलिफ्टर, कहा- इस वजन का दर्द बता नहीं सकता

कोरोना वायरस: पांच दिन ड्यूटी, दो दिन शवों का कफन-दफन करता है ये पॉवरलिफ्टर, कहा- इस वजन का दर्द बता नहीं सकता
सांकेतिक तस्वीर

अज़मत एक आईटी फर्म में प्रोग्राम मैनेजर हैं. वह हफ्ते में पांच दिन दफ्तर का काम करते हैं और बाकी के दो दिन कोरोना वायरस (COVID-19) संक्रमण से मरने वालों का अंतिम संस्कार करते हैं. 295 KG तक वजन आसानी से उठाने वाले अजमत कहते हैं कि ऐसे शवों को उठाने में होने वाला दर्द बयां नहीं कर सकते.

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बेंगलुरु.  कोरोना वायरस (Coronavirus) से मौत के बाद शुरू होती है दुख और दर्द की असली कहानी. इस बीमारी को लेकर समाज में डर का माहौल है. लोग कोविड-19 से मरने वालों के शवों (Dead Body) को छूने तक से परहेज कर रहे हैं. अपने परिवार के लोग भी शवों को हाथ लगाने से डरते हैं. वो इस बात से डरते हैं कि कहीं उन्हें भी कोरोना न हो जाए. लिहाजा कई बार अस्पताल प्रशासन को खुद शवों को दफनाने का इंतज़ाम करना पड़ता है. ऐसे मौके पर लाशों को सम्मान के साथ श्मशान घाट तक पहुंचाने का काम करते हैं, बेंगलुरु के आईटी कंपनी में काम करने वाले मोहम्मद अज़मतुल्ला.

 'दर्द को बयां करना मुश्किल'
लोग इन्हें अज़मत के नाम ने बुलाते हैं. ये पावरलिफ्टर भी रह चुके हैं. एक बार में आसानी से 295 किलोग्राम का वजन उठाने वाले पावरलिफ्टर अज़मत कोविड-19 से मरने वालों का पूरे सम्मान से 'अंतिम संस्कार' करने का सामाजिक काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि ऐसे शवों को उठाने में होने वाले दर्द को बयां करने के लिए उनके पास शब्द नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वाले किसी व्यक्ति के शव को उठाते वक्त जो दर्द मैं महसूस करता हूं, उसे बयां नहीं कर सकता.’

इसलिए करते हैं ये काम...
अज़मत वैसे तो एक आईटी फर्म डीएक्ससी में प्रोग्राम मैनेजर हैं और सप्ताह में पांच दिन, सोमवार से शुक्रवार तक नौकरी करते हैं, लेकिन बचे हुए अपने दो दिन (शनिवार, रविवार) को वो ‘मर्सी मिशन’ के साथ मिलकर कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वालों का अंतिम संस्कार करते हैं. अज़मत ने कहा, ‘मैं लॉकडाउन के दौरान राहत कार्य करने वाले ग्रुप का हिस्सा था, और जब मैंने इस बीमारी से जुलाई में बड़ी संख्या में लोगों को मरते हुए देखा तो मैंने खुद को मर्सी मिशन के साथ जोड़ने का फैसला लिया.’



दिक्कतों के बाद भी मोर्चे पर
इन दिनों हालत ये हैं कि लोग संक्रमण से मरने वालों के रिश्तेदारों को भी शक की नजर से देख रहे हैं. ऐसे में किसी शव का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करने की जिम्मेदारी उठाना बड़ी बात है. मर्सी मिशन के साथ काम करने वालों की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि अंतिम संस्कार में बहुत वक्त लगता है. अस्पताल से लेकर कब्रिस्तान तक पूरी प्रक्रिया बहुत लंबी है. इतना ही नहीं, स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ता है जिससे और देरी होती है. लेकिन अज़मत मोर्चे पर हमेशा डटे रहते हैं.


'कोरोना से किस बात डर'
कोरोना वायरस संक्रमण से बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं, लेकिन अज़मत को उनसे डर नहीं लगता है. उनका कहना है, ‘मौत को आना ही है, उसके बारे में ज्यादा सोचना नहीं चाहिए. लेकिन मैं पूरा एहतियात बरतता हूं, क्योंकि मेरा भी परिवार है.’ (PTI इनपुट के साथ)
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