Kashmir Diary: एक आतंकी के जनाजे की कहानी

News18Hindi
Updated: September 17, 2017, 4:16 PM IST
Kashmir Diary: एक आतंकी के जनाजे की कहानी
Kashmir Diary: एक आतंकी के शवयात्रा की कहानी ( IMAGE SOURCE: NEWS18 )
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Updated: September 17, 2017, 4:16 PM IST
सुबह के 7.30 बजे हैं और हम दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के लेलहारी गांव के बड़े से मैदान में खड़े हैं. हम यहां एक आतंकी के जनाजे में शामिल होने आए हैं. एक कुचला हुआ चमड़े का बैग जिस तरह धीरे-धीरे अपना आकार लेता है उसी तरह यह जनाजा भी आपको एक खत्म हो चुकी जिंदगी की याद दिलाता है.

एक दर्जन से ज्यादा लोग व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं. लाउडस्पीकरों का परीक्षण हो रहा है. मैदान के एक तरफ खड़े ट्रेक्टरों पर बैनर लगाए गए हैं. उसके उपर मृत आतंकी का शरीर रखा गया है जो पिछले दिन मारा गया था.

इसी बीच लोग आते हैं और बिना किसी मार्गदर्शन के अपना स्थान ग्रहण करते हैं. जिस तरह अनुशासन के साथ पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग पंक्तियों को जोड़ा गया है, वह हैरान कर देने वाला और निराशाजनक दृश्य है.

शवयात्रा में आए एक व्यक्ति ने बताया कि गांव ने पिछले दो महीनों में 14 से अधिक आतंकवादियों का अंतिम संस्कार किया है. उसने आगे कहा, "तो हम सभी जानते हैं कि अब क्या करना है."

पूरे जनाजे की निगरानी कर रहा सख्त सा दिखने वाला आदमी मंच के पीछे बातें करने वाले युवाओं को लगातार डांट रहा है. उन्हें फटकारते हुए कहता है "क्या किसी पार्टी में आए हो? यूनुस, क्या तुम अपने दोस्तों को बधाई देने के लिए आए हो?" आबिद, यूनुस और बाकी सभी तुरंत वहां से खिसक जाते हैं.

आयोजकों को महिलाओं को नियंत्रित करने में सबसे ज्यादा कठनाई का सामना करना पड़ता है. महिलाएं, युवा लड़के और पत्रकारों को किसी आतंकी के जनाजे में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई है. उन्होंने अपनी जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष किया है और अब इन कार्यक्रमों का जरूरी हिस्सा माने जाते हैं.

पुरुषों की तुलना में महिलाएं मंच के करीब पहुंचने की कोशिश अधिक कर रही हैं. अयूब लीलारी के शरीर को पाकिस्तानी झंडे में लपेट कर मंच पर रखा गया है, ताकि लोग शव को बेहतर तरह से देख सकें. आप लोगों को नारे चिल्लाते हुए भी सुन सकते हैं.

मृत आतंकी को पाकिस्तानी में झंडे में लपटने की एक अलग कहानी है.

अय्यूब के 14 दिन पहले, एक और आतंकी आरिफ नबी दार या आरिफ लेहारी का अंतिम संस्कार हुआ था. उसके शव को अन्य आतंकियों की तरह एक काले तौहिद झंडे में लपेटा गया था.

ज़ाकिर मुसा के समर्थकों और परंपरागत लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन कैडरों के बीच झंडे की लड़ाई है. आरिफ नबी के जनाजे के दौरान ज़ाकिर मुसा के समर्थकों ने अपना नाम चिल्लाया और उसे काले झंडे में लपेटा था. लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के कैडर जिनकी वफादारी अभी भी पाकिस्तान के साथ हैं, अब हर आतंकी के जनाजे में मौजूद रहते हैं. ज़ाकिर मुसा के समर्थक अक्सर झंडे की लड़ाई में पीट दिए जाते हैं. लेकिन तब भी वह कोशिश करने से पीछे नहीं हटते.

कश्मीर में पिछले तीन सालों से आतंकियों के जनाजे को कवर करने वाले एक स्वतंत्र फोटो जर्नलिस्ट शहरीर ने बताया,''यह ज्यादातर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के प्रयास से किया जाता है." अभी तक टीवी चैनलों द्वारा श्रीनगर में काले झंडे फहराने वाले लोगों को दिखाया जाता था, अब इन आतंकियों के शव को काले झंडे में लपेटा हुआ दिखाया जाता है. इससे उन्हें बढ़ावा मिलता है."

कई सारे बच्चे भी अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए इकट्ठे हुए हैं. उनमें से दो बच्चों ने हमसे बात की, उन्होंने कहा कि वे अय्यूब को नहीं जानते थे. इस जनाजे में शामिल होने वो क्यों आएं हैं, उसके जवाब में उन्होंने कहा, "मैं बुरहान को जानता हूं. अय्यूब मुजाहिद था. सेना ने उसे मार दिया." बातचीत आगे बढ़ने से पहले ही उनकी मां ने गुस्से में उन्हें वापस जाने को कह दिया.

लेहारी के शरीर के बगल में बुरहान के पोस्टर को देखा जा सकता है. यह देखकर अजीब लग रहा है कि लश्कर के आतंकवादी की जनाजे पर हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर की तस्वीर रखी गई है. इस पर गांव के लोगों ने बताया, "हमारे पास हर बार नए पोस्टर प्रकाशित करने का समय और साधन नहीं है. हमें जो मिला, हमने डाल दिया."

अब लगभग सुबह के 8:30 बज गए हैं. सूरज चढ़ने के साथ-साथ सैंकड़ों लोग मैदान में जमा हो गए. हुर्रियत समूह के एक प्रवक्ता मंच पर आकर एसएएस गिलानी की प्रशंसा में नारेबाजी शुरू कर देते हैं. प्रवक्ता के बहुत उत्तेजित होने पर भीड़ हल्की प्रतिक्रिया देती है.

किसी आतंकी के जनाजे का इस्तेमाल अलगाववादी खुद को वजूद में रखने के लिए भी करते हैं. जाकिर मुसा की ओर से धमकी मिलने के बाद हुर्रियत नेताओं को जनाजे के दौरान विरोध का सामना भी करना पड़ता है.

हुर्रियत नेता के बाद दूसरे स्पीकर आगे आकर बोलें, "सोचने की जरूरत है कि यह व्यक्ति हमारे लिए बंदूक उठाने के लिए मजबूर क्यों हुआ. यह हमारे लिए मर गया. हमें कारणों को स्वीकार करने की आवश्यकता है. चलिए हम सब लड़ते रहने की शपथ लेते हैं..."

एक-एक करके स्पीकर के बाद स्पीकर दर्शकों के सामने आग उगलते हुए नजर आ रहे हैं और लोगों को उनके पुरखों के बलिदानों का याद दिला रहे हैं. भीड़ अपने डर को छिपाते हुए पूरे जोश में जवाब देती है.

जनाजे को कवर कर रहे एक और युवा पत्रकार ने बताया, "आतंकियों के जनाजे दो कारणों के लिए जरूरी माने जाते हैं. पहली बात, पुलिस के जासूसों के भय से कहीं और ना कही जा सकने वाली बात भी यहां कही जा सकती हैं. आप यहां लोगों को जिहाद के लिए तैयार कर सकते हैं, लोगों को बंदूक उठाने के लिए उकसा सकते हैं, उग्रवादियों का गुणगान कर सकते हैं, भारत के खिलाफ लोगों को भड़का सकते हैं और कोई भी आपके शब्दों को गलत नहीं ठहराएगा."

दूसरा कारण यह है कि इस तरह के कार्यक्रम के जरिये आतंकी आसानी से लोगों तक पहुंच पाते हैं. जनाजा ही इकलौती ऐसी जगह है जिनमें आतंकी अपने समर्थकों से सीधे बात कर पाते हैं और नए आतंकी पैदा कर सकते हैं.

हिंसक प्रतिक्रिया से बचने के लिए पुलिस इन कार्यक्रमों में शामिल नहीं होती. जनाजे में आतंकियों को सलामी देते हुए हवा में गोलीबारी की जाती है.

असल में इस प्रक्रिया से आतंकवादियों के ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यूएस) खुश नहीं होते. उनमें से एक ने हमसे बातचीत के दौरान कहा,"उन्हें पता ही नहीं कि इन गोलियों को पाने के लिए हम कितना मुश्किल काम करते हैं और फिर ये सिर्फ जनता को खुश करने के लिए उन्हें बर्बाद कर देते हैं."

मैंने कुछ दिनों बाद घाटी के एक अलग हिस्से में 14 वर्षीय आतंकी के परिवार से मुलाकात की, जिसे इस बारे में कोई अंदाजा नहीं था कि उनके बच्चे ने अपने स्कूल और परिवार को आतंकी गुट में शामिल होने के लिए क्यों छोड़ दिया. उसके दोस्तों ने बाद में बताया कि वह हमेशा आतंकी के जनाजे में शामिल होता था और बुरहान वानी और दाऊद शेख के जनाजे में शामिल हुआ था.

जनाजे में आतंकियों के आने की घोषणा आमतौर पर सार्वजनिक घोषणाओं से पहले होती हैं जिसमें लोगों को "मेहमान आने वाले हैं" कहकर रास्ता बनाने के लिए कहा जाता है.

फोटोजर्नलिस्ट शरियर ने बताया,"एक बार अंतिम संस्कार में एक बूढ़े आदमी ने मुझसे पूछा कि इस कैमरे के बजाय मेरे हाथ में एके47, क्यों नहीं है. मैंने उन्हें बताया कि गोलियों को सिर्फ 1 किमी दूर तक सुना जा सकता है, लेकिन तस्वीरें हजारों किलोमीटर की यात्रा तय करती हैं."

अब लगभग 9.15 बजे हैं, और मंच के सामने 7000 लोग इकट्ठे हुए हैं. गंभीर प्रतिबंधों के बावजूद वो यहां तक ​​पहुंचे हैं. यहां आने के लिए पुलिस चौकियों से बचते हुए पहाड़ियों पर चढ़कर और खेतों के बीच चलकर आना पड़ता है.

लेलहारी के एक स्थानीय निवासी कहता हैं, "देखो, उसे क्या रुखसत मिली है. इसे जनाजा कहते हैं. इसने हमारी तहरीक [आंदोलन] को आगे बढ़ाया है. हर कोई इसे सम्मान के साथ सलाम करेगा.

एक स्थानीय लड़के का कहना है कि अय्यूब ने कहा था कि वह चाहता है कि या तो उसे जेल मिले या फिर हुर्रियत नेता मसरत आलम या उसका भाई उसके जनाजे को रुखसत करे. जैसे ही दुआ पढ़ी गई, हजारों लोग शव की ओर बढ़ चले, जिसे दूसरे आतंकियों की तरह जमीन में दफनाया जा रहा है.

कश्मीर में आतंकियों के रूखसती का तरीका काफी अलग-अलग है. दक्षिण में जहां उन्हें दफनाया जाता है वहीं उत्तर में मृत आतंकियों के शव एक स्थान पर रखे जाते हैं,जहां से गांव के सभी लोग देख पाते हैं.

क्या लोगों के ऊपर किसी तरह का दबाव है कि स्थानीय लोगों इनके जनाजे में भाग लेते हैं?

इसके जवाब में स्वतंत्र जर्नलिस्ट ने कहा,"यदि आप उत्तर में रहते हैं और अगर आतंकी का शरीर आपके घर के सामने गुजर रहा है, तो आपको बाहर आना होगा. और दक्षिण में यदि आपके कुछ दोस्त जनाजे में जाते हैं तो वो नहीं जाने वालों को ताना मारते हैं. जिसके बाद हर कोई जाने को मजबूर हो जाता है. तो हाँ, एक तरह से इन जनाजे में शामिल होने को लेकर कुछ सामाजिक दबाव भी होते हैं."

सैंकड़ों लोग कब्रिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं जहां अयूब को दफनाया जाना है. महिलाओं ने अपने नारों की आवाज को बढ़ा दी है. बच्चे कब्रिस्तान के दरवाजे को फांदने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन केवल मुट्ठी भर लोगों को ही अंदर जाने कि इजाजत है.

मैदान में, लोग अभी भी ट्रैक्टर में आ रहे हैं. जनाजा जल्दी खत्म होने के कारण लोगों मे बहस भी हो रही है. समारोह के पूरा होने के बाद भी कोई भी वापस लौटने की जल्दी में नहीं है. कुछ लोग अयूब लीलहारी के जनाजे में भाग लेने के लिए 100 किलोमीटर से अधिक यात्रा करके आए हैं. गपशप पुलिस के मुखबिरों के बारे में होती है तो चर्चा 'हालत' और 'मस्ला-ए-कश्मीर' के बारे में होती है. अभी भी सुबह के 10:30 बजे है और हम शहरों की हलचल से दूर एक दूरदराज के गांव में हैं. और दिन अभी शुरू हुआ है.

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First published: September 17, 2017
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