स्मृति शेष: आपकी कमी खलेगी, जेटली साहब!

(PTI Photo/Kamal Singh)
(PTI Photo/Kamal Singh)

बीजेपी (BJP) के तरकश में स्वर्गीय अरुण जेटली (Arun Jaitley) ब्रह्मास्त्र की तरह थे, अनौपचारिक बातचीत में रिपोर्टरों को खबर देने वाले जेटली पार्टी प्रवक्ताओं को भी ब्रीफ करते रहे

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 25, 2019, 1:56 PM IST
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मैं ख़ुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि एक पत्रकार के रूप में मुझे बीजेपी (Bjp) को कवर करने का मौक़ा मिला और वह भी उस समय में जब यह पार्टी सत्ता में आने के लिए संघर्ष कर रही थी. इसके नेतागण मीडिया से मैत्री-भाव रखनेवाले थे, उन तक पहुंच आसान थी और हमें उनकी योग्यता को समझने-परखने का मौक़ा मिलता था.

बीजेपी के तरकश में स्वर्गीय अरुण जेटली (Arun Jaitley) ब्रह्मास्त्र की तरह थे. एक बहुत ही विलक्षण विद्वान, क़ानून के महान ज्ञाता और सधी बात बोलने वाले अरुण जेटली ऐसे व्यक्ति थे जिनको उनकी पार्टी किसी भी विषय पर प्रेस को संबोधित करने के लिए अधिकृत कर सकती थी. वे सदा मुस्कुराते हुए प्रश्नों का तर्कपूर्ण और ठोस जवाब दिया करते थे.

मध्यवर्ग में अपनी पैठ बनाने की जद्दोजहद कर रही पार्टी के लिए अंग्रेज़ी भाषा पर उनकी बेहद ख़ूबसूरत पकड़ पार्टी के लिए वरदान की तरह थी. उन्हीं जैसे नेताओं के बल पर बीजेपी मध्यवर्ग में अपनी गहरी पैठ बना पाई. एक ऐसा भी समय था जब वे मध्यवर्ग के आइकॉन बन गए थे.



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पाँच महासचिव आडवाणी के महाराथी

पार्टी के पाँच महासचिव थे जो एलके आडवाणी (Lal Krishna Advani)के मुख्य महारथी थे. अरुण जेटली, केएन गोविंदाचार्य, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज और एम वेंकैया नायडू. जेटली, निस्संदेह एक बहुत ही शिष्ट भद्र व्यक्ति थे जिन पर क़ानूनी मामलों, संवैधानिक लड़ाईयों और मीडिया रणनीति के बारे में भरोसा किया जा सकता था.

निजी जीवन में वे एक बहुत ही उच्च नैतिक आदर्श का पालन करते थे. पार्टी की ओर से कहीं दौरे पर जाने या चुनाव अभियान के दौरान वह पार्टी के पैसे पर निर्भर नहीं रहते थे और हमेशा अपनी व्यवस्था तैयार रखते थे. वे कहा करते थे कि पार्टी अपने उन कार्यालयीय कार्यकर्ताओं का ख़याल रखे जो इतने सक्षम नहीं हैं. पार्टी की उनकी सेवा विचारधारा पर आधारित थी जिसका उद्देश्य एक मज़बूत राष्ट्र का निर्माण था. उनका सरकारी निवास 9, अशोक रोड प्रचारकों का निवास बन गया था. जब नरेंद्र मोदी दिल्ली में रहते थे, तो जेटली ने उन्हें अपने सरकारी निवास का एक हिस्सा स्वतंत्र रूप से प्रयोग के लिए दे दिया था.



लुटियन की दिल्ली को जेटली ने अपनी उपस्थिति से महिमामंडित किया. लुटियन के सत्ताधारी इलीट में भारत के लिए जो घमंड और तिरस्कार था उस पर वे गंभीरता से सवाल उठाते थे. वे ऐसे लोगों के घमंड पर हमेशा ही हँसते हुए कहते थे कि इन्हें नहीं पता कि एक दूसरा भारत भी है. यही एक बात ऐसी थी जिसने उनको शेष नेताओं से अलग पहचान दी. वे ग़रीबों से हमदर्दी और उनकी समस्याओं की समझ रखनेवाले नेताओं में शुमार थे.

चूँकि वे दिल्ली में पले-बढ़े, दिल्ली की अदालतों में क़ानून की प्रैक्टिस की और फिर दिल्ली की राजनीति में पदार्पण किया, यह स्वाभाविक ही था कि वह दिल्ली की नब्ज़ को अच्छी तरह पहचानते थे. दिल्ली का शायद ही कोई ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति होगा जिसके पास अरुण जेटली के बारे में बताने को एक-दो आख्यान नहीं होगा. वे इस शहर के लोगों, यहाँ के चप्पे-चप्पे और उन मशहूर स्थानों से परिचित थे जहाँ लज़ीज़ खाने परोसे जाते थे.

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दोस्तों को उनपर भरोसा था

उनके दोस्तों को उनपर भरोसा था और उन्होंने उन्हें कभी भी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया. सबका ख़याल रखने और अपने मानवीय स्वभाव और योग्यता के कारण वे सबके चहेते थे. मुझे ऐसा कोई वाक़या याद नहीं है कि मीडिया के किसी मित्र ने उनसे कोई मदद माँगी और उन्होंने कोई बहाना बनाया हो. दिल्ली के प्रतिष्ठित स्कूलों में बच्चों का नामांकन का मामला हो या एम्स में किसी की इलाज के लिए पैरवी का, वे हमेशा ही मदद के लिए तैयार रहते थे.

मीडियाकर्मियों से बातचीत करने में उनको मज़ा आता था और उनकी ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत को लोग काफ़ी ध्यान से सुनते थे. वे कभी भी अनावश्यक रूप से मुद्दों या बहस से बचते नहीं थे और कई बार बात-बात में ही किसी बड़ी ख़बर का संकेत दे देते थे. रिपोर्टर के रूप में हम सब उनकी अनौपचारिक बातचीत की बाट जोहते जिनसे हमें ख़बरें मिलतीं और जो बीजेपी कि भलाई को आगे बढ़ाने वाला होता.



हर दिन 11 बजे यह कार्यक्रम होता था

उनसे मेरी अंतिम बातचीत उस समय हुई जब वे लोकसभा के हाल के चुनावों के दौरान पार्टी प्रवक्ता के रूप में हम लोगों को ब्रीफ़ किया करते और मीडिया का सामना करने के लिए हमें तैयार करते. दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर पार्टी कार्यालय में या फिर अपने आवास पर हर दिन 11 बजे यह कार्यक्रम होता था.

वे बहुत ही प्रखर थे और हमें बताते कि किसी विशेष बात पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए या नहीं. हम लोग इसे जेटली की पाठशाला कहा करते थे. कई बार वे हमें अख़बार नहीं पढ़ने या किसी मुद्दे पर उनके ब्लॉग को नहीं पढ़ने के लिए डाँटते भी थे. समस्या यह है कि आपलोग तैयारी नहीं करते हो, वे कहा करते थे और फिर मुद्दों को समझाने बैठ जाते.

पर अफ़सोस कि अब वे हमारे बीच नहीं रहे. हमें यह हमेशा ही लगता था कि वे ठीक हो जाएँगे और हमें उनसे बातचीत का दुबारा मौक़ा मिलेगा. पर भाग्य को यह मंज़ूर नहीं था. आप हमें बेहद याद आएँगे जेटली जी.

(सुदेश वर्मा, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. इससे पहले वे दो दशक तक एक पत्रकार के रूप में बीजेपी को कवर कर चुके हैं.)

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