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जानिए मेरठ के इस गांव में सिर्फ कुछ लोगों को मिलती है दशहरा मनाने की छूट

जानिए मेरठ के इस गांव में सिर्फ कुछ लोगों को मिलती है दशहरा मनाने की छूट

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इस पीपल के पेड़ पर दी गई थी 9 क्रांतिकारियों को फांसी

ग्रामीण व इतिहासकारों की मानें तो फिरंगियों ने जब 1857 मेरठ गांव पर हमला किया था.तब विद्रोह के अपराध में 9 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. जिसके बाद सभी 9 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई थी.इतना ही नहीं फांसी पर लटकाने के लिए अंग्रेजों ने विजयदशमी के पावन पर्व को चुना था. जिन लोगों को फांसी की सजा फांसी दी गई थी.

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    मेरठ:-एक ओर देश में जहां दशहरा पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है तो वही दूसरी ओर कई ऐसे स्थान भी है जहां पर दशहरा पर्व नहीं मनाया जाता. कुछ ऐसी ही एक गांव आपको पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी देखने को मिलेगा. मेरठ से 20 किलोमीटर दूर तीरथ नगरी गगोल गांव में दशहरा पर्व नहीं मनाया जाता. गांव वासियों की माने तो जिस समय देश को आजाद कराने के लिए मेरठ (Meerut)से आजादी  (independence)की क्रांति (Revolution)की ज्वाला उत्पन्न हुई थी. उस ज्वाला में गगोल( Gagol) के बुजुर्गों ने भी अहम योगदान निभाया था. जिसे अंग्रेजों की हुकूमत हिल गई थी. इसी वजह से अंग्रेजों ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी. गांव के ही एक पीपल के पेड़ पर उनको फांसी दे दी गई थी.तभी से गांव में दशहरा पर्व नहीं मनाया जाता.
    इन बुजुर्गों को मिली थी फांसी 
    ग्रामीण व इतिहासकारों की मानें तो फिरंगियों  ने जब 1857 मेरठ गांव पर हमला किया था.तब विद्रोह के अपराध में 9 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. जिसके बाद सभी 9 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई थी.इतना ही नहीं फांसी पर लटकाने के लिए अंग्रेजों ने विजयदशमी के पावन पर्व को चुना था. जिन लोगों को फांसी की सजा फांसी दी गई थी. उनमें रम्मन सिंह, रामसहाय, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, घसीटा सिंह, शिब्बत सिंह बैरम और दरबा सिंह शामिल थे.
    इन लोगों को मिलती है दशहरा मनाने की छूट
    हमारे देश की परंपरा है कि अगर किसी पर्व को उठाना हो तो उस दिन कोई बड़ी खुशी होनी चाहिए. तभी हम उस पर को उठा सकते हैं. इसी तरीके से गंगोल गांव में भी अगर किसी के दशहरे के दिन बेटा जन्म लेता है. तभी उस घर में दशहरे का पर्व मनाया जा सकता है.

    Tags: Meerut news

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