मलयाली एक्टर तुलसी ने सबरीमाला टिप्पणी पर मांगी माफी, कहा- मैने 'गहरी भक्ती' में कहा था

कोल्लम तुलसी ने एएनआई से कहा, 'भगवान अयप्पा के प्रति मेरी गहरी भक्ति के कारण मैंने ऐसा कह दिया. बाद में एहसास हुआ कि बतौर सेलिब्रिटी मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए. मैं इसके लिए माफी मांगता हूं.'

News18Hindi
Updated: October 13, 2018, 7:04 PM IST
मलयाली एक्टर तुलसी ने सबरीमाला टिप्पणी पर मांगी माफी, कहा- मैने 'गहरी भक्ती' में कहा था
मलयालम एक्टर कोल्लम तुलसी (Twitter/ANI)
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Updated: October 13, 2018, 7:04 PM IST
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर उनके दो टुकड़े करने की धमकी देने मलयालम एक्टर कोल्लम तुलसी ने माफी मांगी है. उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा की 'गहरी भक्ति' के कारण मैने ऐसा बयान दे दिया था.

कोल्लम तुलसी ने एएनआई से कहा, 'भगवान अयप्पा के प्रति मेरी गहरी भक्ति के कारण मैंने ऐसा कह दिया. बाद में एहसास हुआ कि बतौर सेलिब्रिटी मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए. मैं इसके लिए माफी मांगता हूं.'

बता दें कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज़ मलयालम एक्टर कोल्लम तुलसी ने शुक्रवार को कहा था कि सबरीमाला में आने वाली महिलाओं के दो टुकड़े कर देने चाहिए, एक टुकड़ा दिल्ली भेज देना चाहिए, जबकि दूसरे को मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर फेंकना चाहिए.'

एक्टर तुलसी ने ये बातें कोच्चि में एक रैली में कही थी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बीजेपी की ओर से यह रैली आयोजित की गई थी. कोल्लम तुलसी ने कहा कि कोर्ट ने भले ही सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में एंट्री की परमिशन दी है, लेकिन मंदिर के पुराने भक्त बिल्कुल नहीं चाहते कि मंदिर की परंपरा तोड़ी जाए.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को अपने आदेश में सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की इजाजत दे दी है. इसके पहले 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने की इजाजत नहीं थी.

फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा था, 'महिलाएं समाज में बराबर की हिस्सेदार हैं. पुरानी मान्यताएं और पितृसत्तात्मक सोच आड़े नहीं आनी चाहिए. समाज को अपनी सोच बदलनी पड़ेगी.'

बता दें कि केरल के पत्थनमथिट्टा जिले में पश्चिमी घाट की एक पहाड़ी पर सबरीमाला मंदिर बना है. महिलाओं के प्रवेश को लेकर इसके प्रबंधन का कहना था कि पीरिएड्स होने की वजह से 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाएं अपनी व्यक्तिगत शुद्धता (मासिक धर्म) बनाए नहीं रख सकती हैं, यही कारण है कि इस वर्ग की महिलाओं का प्रवेश मंदिर में वर्जित था. हालांकि, कोर्ट ने 53 साल पुरानी परंपरा को खत्म कर दिया है.
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