अमेरिकी फौज की वापसी के बीच अफगान और पाक तालिबान ने दिए साथ आने के संकेतः सूत्र

TTP की एडवाइजरी कमेटी तहरीक ए शूरा की कई बैठकों के बाद ये अप्रूवल दिया गया है.

TTP के अफगान तालिबान से हाथ मिलाने के संकेत इस साल मार्च से ही मिलने लगे थे जब अफगानिस्तान के खोस्त प्रोविंस में तालिबान ने अफगान फोर्सेज के खिलाफ एम्बुश लगाया था.

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नई दिल्ली. अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से घर वापसी की कवायद के बीच खबर है अफगान और पाक तालिबान (TTP) हाथ मिला सकते हैं. खुफिया सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के मुताबिक, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने अफगान तालिबान से तालमेल के लिए  अफगान तालिबान की तर्ज़ पर अपने संगठन को री मॉडल किया है. सूत्रों के मुताबिक TTP की एडवाइजरी कमेटी तहरीक ए शूरा की कई बैठकों के बाद ये अप्रूवल दिया गया है.

इस अप्रूवल के बाद कई पुराने कमांडरों की जगह नए कमांडरों को अलग-अलग इलाके की कमान दी गयी है. मसलन पेशावर का गवर्नर मुकर्रम खोरासनी को नियुक्त किया गया है, जो कि तहरीक ए तालिबान के चीफ कमांडर उमर खालिद खोरासनी का करीबी और हिज़्ब उल अहरार संगठन का हेड है.

इसी तरह तहरीक ए तालिबान के सह प्रमुख मौलवी फक़ीर मोहम्मद के बेहद करीबी माने जाने वाले और हाल ही में बगराम जेल से रिहा किए गए शाहिद उमर को बजौर और मलकन्द का गवर्नर नियुक्त किया गया है. स्वात के मुफ़्ती बुर्जन को नार्थ वज़ीरिस्तान के मर्दान इलाके का कमांडर नियुक्त किया गया है. उस्ताद अलीम खान को बन्नू डिवीज़न का कमांडर जबकि साउथ वज़ीरिस्तान के अबू यासिर को डेरा इस्माईल खान डिवीज़न का गवर्नर नियुक्त किया गया है.

उमर खालिद ने इस शर्त पर ही वापसी
इसके अलावा वेलफेयर, मिलिट्री और इंटेलीजेंस से जुड़ी कई नियुक्तियां की गई हैं. TTP से अलग होकर जमात उल अहरार बनाने वाले उमर खालिद खोरासनी ने इसी शर्त पर वापसी की थी कि TTP का ऑर्गनिज़ाशनल खाका अफ़ग़ान तालिबान की तर्ज़ पर ही बनाया जाएगा. उमर खालिद से अफ़ग़ान तालिबान के अच्छे रिश्ते है.

दरअसल, TTP के अफगान तालिबान से हाथ मिलाने के संकेत इस साल मार्च से ही मिलने लगे थे जब अफगानिस्तान के खोस्त प्रोविंस में तालिबान ने अफगान फोर्सेज के खिलाफ एम्बुश लगाया था. अफगानिस्तान में ये कोई नई बात नही है,लेकिन खास बात ये थी कि इसमे TTP के लड़ाकों के शामिल होने की बात सामने आई थी. हालांकि इसकी जिम्मेदारी अफ़ग़ान तालिबान ने ली थी.

पिछले साल की UN रिपोर्ट में भी इस बात का जिक्र आया था कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान के 6000 लड़ाके हैं, जिनमे ज़्यादातर TTP के हैं. ये न सिर्फ अफ़ग़ान तालिबान के लिए लड़ते है, बल्कि अफगानिस्तान की सीमा पारकर पाकिस्तानी सेना पर भी हमला करते हैं. दरअसल TTP सालों से पाकिस्तान की सेना के लिए नासूर बना हुआ है.उसके हमले में पाकिस्तान सेना के सैकड़ों जवान मारे जा चुके हैं.

जबकि अफगान तालिबान के पाक सेना से अच्छे रिश्ते हैं. अफगान तालिबान और TTP एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं तो ये दोनों के लिए ही फायदेमंद है.अफगानिस्तान पाकिस्तान सीमा पर कई इलाकों में TTP का दबदबा है.अफगान तालिबान उसका इस्तेमाल कर इन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है और अगर अफगान तालिबान सत्ता पर किसी तरह से क़ाबिज़ हो जाता है तो इसमे TTP को भी भागीदारी मिल सकती है.

ऐसे में अमेरिकी फौज के अफ़ग़ानिस्तान से  हटने के बाद TTP और अफगान तालिबान के गठजोड़ से क्या नए समीकरण बनते है ये देखना दिलचस्प होगा. फिलहाल अफ़ग़ान तालिबान अफगानिस्तान के 34 प्रोविंस में से 26 में  हिंसक कार्रवाई के ज़रिए आतंक और बर्बरता की नई इबारत लिख रहा है.अफगानिस्तान के कुल 340 ज़िलों में 120 में तालिबान का पूरा कंट्रोल है.इनमें से 1मई के बाद से अब तक 44 ज़िलों पर तालिबान कब्ज़ा कर चुका है.

जहां तक भारत का सवाल है जानकार मानते है कि अमेरिकी फौज की वापसी के बाद भारत के  लिए अफगानिस्तान में बेहद मुश्किल वक़्त आने वाला है. भारत का वहां बड़ा निवेश है. अफगानिस्तान से 50फीसदी अमेरिकी फौज वापस लौट चुकी है.11 सिंतबर तक पूरी अमेरिकी फौज  अफगानिस्तान से लौट जायेगी. ऐसे में तालिबान बेलगाम हो जायेगा .उधर  भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए पाकिस्तान भी  तालिबान को लगातार भड़काता रहता है. ऐसे में तालिबान अफगानिस्तान में बड़े भारतीय निवेश को गंभीर चोट पहुंचा सकता है.

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