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Afghanistan Crisis: तालिबान पर क्या हो अगला कदम? अजित डोभाल के साथ मंथन करेंगे रूसी NSA और CIA चीफ

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर पाकिस्तान की कठपुतली होने के आरोप लग रहे हैं. (फाइल फोटो)

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर पाकिस्तान की कठपुतली होने के आरोप लग रहे हैं. (फाइल फोटो)

Afghanistan: US CIA Chief William J. Burns के दौरे के बारे में पूछे जाने पर भारतीय विदेश मंत्रालय और अमेरिकी दूतावास ने टिप्पणी से इनकार कर दिया.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. अफगानिस्तान (Afghanistan) में घट रहे घटनाक्रम को लेकर भारत, वॉशिंगटन (Washington) और मॉस्को (Moscow) के साथ करीबी संपर्क बनाए हुए है. आधिकारिक सूत्रों के हवाले से द हिंदू ने लिखा है कि इस सप्ताह दिल्ली में दो उच्च स्तरीय इंटेलिजेंस प्रतिनिधिमंडल अपने भारतीय समकक्षों के साथ बैठक करेंगे. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के प्रमुख विलियम बर्न्स (William J. Burns) की अगुवाई में इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल भारत और पाकिस्तान का दौरा करेगा. अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल (Ajit Doval) के साथ बैठक की, जिसमें अफगानिस्तान से लोगों की निकासी के साथ तालिबान सरकार (Taliban Government) को लेकर काफी अहम चर्चा हुई.

    वहीं बुधवार को रूस (Russia) के सिक्योरिटी काउंसिल जनरल (पढ़ें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) निकोलाई पत्ररूशेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) से मिलेंगे. इसके अलावा उनकी मुलाकात राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ होगी. द हिंदू के मुताबिक बर्न्स के दौरे के बारे में पूछे जाने पर भारतीय विदेश मंत्रालय और अमेरिकी दूतावास ने टिप्पणी से इनकार कर दिया.

    अमेरिकी और रूसी अधिकारियों के साथ साउथ ब्लॉक की बैठकें उस वक्त हो रही हैं, जब तालिबान ने मोहम्मद हसन अखुंद की अगुवाई में अंतरिम सरकार का ऐलान कर दिया है. अब्दुल गनी बरादर (Abdul Ghani Baradar) अफगानिस्तान की उप प्रधानमंत्री होंगे. ये बैठकें इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एससीओ और क्वाड समूह की बैठकों में शामिल होंगे, जहां अमेरिका और रूस महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते हैं, और दोनों देशों के आने वाले दिनों में अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर नजर रखने की उम्मीद है.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16 सितंबर को एससीओ मीटिंग में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल होंगे. वहीं 24 सितंबर को क्वाड की मीटिंग में शामिल होने के लिए अमेरिका का दौरा करेंगे. इससे पहले गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स देशों के वर्चुअल समिट की मेजबानी करेंगे, जिसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल होंगे. इस समिट में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल सुरक्षा मुद्दों पर एक प्रजेंटेशन भी देंगे.

    ध्यान रहे कि जनरल पत्ररूशेव रूसी सिक्योरिटी काउंसिल के सबसे बड़े अधिकारी हैं और इस पद पर 2008 से बने हुए हैं. इससे पहले वे रूस की इंटेलिजेंस एजेंसी एफएसबी के प्रमुख भी रह चुके थे. जनरल पत्ररूशेव का ये दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच 24 अगस्त को हुई फोन पर बातचीत के बाद हो रहा है. दोनों नेताओं ने काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान की स्थिति पर चर्चा की थी.

    विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई थी कि दोनों रणनीतिक सहयोगियों को साथ मिलकर काम करना चाहिए और
    वरिष्ठ अधिकारियों को अफगानिस्तान के मुद्दे पर संपर्क बनाए रखने को कहा था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पत्ररूशेव के दौरे से भारत और रूस को अफगानिस्तान में बदलती परिस्थितियों पर एक दूसरे के विचार जानने और समझने में मदद मिलेगी.

    अमेरिका और रूस में टकराव
    रूसी अधिकारी का ये दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल के दिनों में मास्को और वॉशिंगटन के बीच अफगानिस्तान के मुद्दे पर टकराव बढ़ता गया है. पिछले दो साल से अमेरिका और रूस ट्रायको मैकेनिज्म (इसमें चीन और पाकिस्तान भी हैं) के जरिए संपर्क में हैं, फिर भी दोनों देशों के अफगानिस्तान पर विचार बिल्कुल उलट हैं. पिछले हफ्ते रूस ने अमेरिका की अगुवाई वाले पश्चिमी देशों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2593 के माध्यम से जल्दबाजी करने का आरोप लगाया, जिसकी अध्यक्षता भारत ने की थी, साथ ही इराक और सीरिया स्थित इस्लामिक स्टेट और ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से व्याप्त खतरों के प्रति अमेरिका द्वारा ध्यान न दिए जाने का आरोप लगाया था. रूस और चीन का मानना है कि ये दोनों संगठन सेंट्रल एशिया की सुरक्षा के लिए खतरा हैं.

    वहीं रूस का कहना था कि अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के रिजर्व को फ्रीज करने से काबुल में मानवीय संकट खड़ा हो जाएगा. रूस ने काबुल से पढ़े लिखे और क्वालिफाइड अफगान नागरिकों को अमेरिका द्वारा निकालने पर भी आपत्ति जताई गई थी, मास्को ने कहा था कि इससे देश में ‘ब्रेन ड्रेन’ का संकट खड़ा हो जाएगा. बता दें कि रूस उन छह देशों में शामिल है, जिन्होंने काबुल में अपना दूतावास बनाए रखा है. मास्को का संकेत साफ है कि वे तालिबान सरकार के साथ औपचारिक तौर पर बातचीत और संपर्क के लिए तैयार हैं. वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अपना दूतावास दोहा स्थानांतरित कर दिया है.

    वेट एंड वॉच की स्थिति में भारत
    अमेरिका ने जहां काबुल से 1 लाख से ज्यादा लोगों को निकालने का दावा किया है, वहीं सीआईए प्रमुख द्वारा भारत के साथ कुछ अफगान नागरिकों को नई दिल्ली स्थानांतरित किए जाने पर चर्चा हो सकती है. हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करेगा या नहीं. अफगानिस्तान से लोगों को निकालने के मामले में भारत का मूलतः ध्यान अपने नागरिकों पर ही केंद्रित रहा है. भारत ने सिर्फ 565 लोगों का रेस्क्यू किया है और इसमें सिर्फ 112 अफगान नागरिक शामिल हैं, जबकि कुछ दर्जन लोगों ने ही ई-वीजा के जरिए भारत के लिए आवेदन किया है.

    सीआईए प्रमुख इससे पहले न्यूक्लियर डील के समय भारत का दौरा कर चुके हैं और अमेरिका के उन सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने पिछले कुछ महीनों में नई दिल्ली का दौरा किया था. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक बर्न्स 23 अगस्त को काबुल के दौरे पर गए थे और तालिबान के डिप्टी लीडर अब्दुल गनी बरादर के साथ मुलाकात की थी. अमेरिकी अधिकारियों ने इस खबर को खारिज नहीं किया था.

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