सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के मामलों की सुनवाई में इकलौती महिला जज को ही जगह नहीं

एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट के चार जज मुख्य न्यायाधीश दीपक मिसरा के खिलाफ खुलकर मीडिया के सामने आए हैं. कोर्ट के चारों वरिष्ठतम जजों ने महत्वपूर्ण केसों का जजों के बीच बंटवारे को लेकर नाराजगी जाहिर की. वहीं एक और घटना शीर्ष कोर्ट को परेशानी में डाल सकती है.

News18Hindi
Updated: January 14, 2018, 5:45 PM IST
सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के मामलों की सुनवाई में इकलौती महिला जज को ही जगह नहीं
सुप्रीम कोर्ट
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Updated: January 14, 2018, 5:45 PM IST
उत्‍कर्ष आनंद

एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट के चार जज मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ खुलकर मीडिया के सामने आए हैं. कोर्ट के चारों वरिष्ठतम जजों ने महत्वपूर्ण केसों के जजों के बीच बंटवारे को लेकर नाराजगी जाहिर की. वहीं एक और घटना शीर्ष कोर्ट को परेशानी में डाल सकती है.

शनिवार दोपहर सुप्रीम कोर्ट के चारों जजों का सीजेआई पर आरोप को लेकर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने आठ संविधान खंडपीठों को अधिसूचित किया जिस पर 17 जनवरी से सुनवाई की जाएगी. इन मामलों में महिलाओं से जुड़े मुद्दे जैसे केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का पीरियड्स के दौरान प्रवेश, महिलाओं का व्याभिचार से जुड़ा मामला भी शामिल है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज इन केसों की सुनवाई का हिस्सा नहीं हैं.

25 जजों में से जस्टिस आर भानुमति ही फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में एकमात्र महिला जज हैं. लेकिन वह भी उस पांच सदस्यीय बेंच में शामिल नहीं हैं जो महिलाओं के अधिकारों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर फैसला करेगा.

अब इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि जस्टिस भानुमति पिछले संवैधानिक बेंच से बाहर थीं जो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर के आदेश पर बनाया गया था. इस बेंच के सामने सुनवाई के लिए ट्रिपल तलाक और राइट टू प्राइवेसी जैसे मुद्दे थे. यहां तक कि राइट टू प्राइवेसी की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच ने की थी, लेकिन जस्टिस भानुमति इस बेंच का हिस्सा भी नहीं थीं.

सबरीमाला-व्याभिचार जैसे मामलों की सुनवाई में नहीं शामिल एकमात्र महिला जज 
इसी तरह अब सबरीमाला और व्याभिचार जैसे मामले की सुनवाई में भी वो शामिल नहीं हैं. पारसियों के अग्नि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और समलैंगिकता जैसे मुद्दों में भी उन्हें शामिल नहीं किया गया है.
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शुक्रवार दोपहर सुप्रीम चोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मुख्य न्यायाधीश के आदेश और शीर्ष अदालत में विभिन्न बेंचों को मामले आवंटित करने के तरीके पर सवाल उठाया था.

कोर्ट रजिस्ट्री की एक अधिसूचना के अनुसार आठ केसों के लिस्ट की शुरुआत आधार मामले और बाकी के संवैधानिक बेंचों के मामलो को एक ही बेंच को सूचीबद्ध किया गया है. आधार मामले की संवैधानिक बेंच द्वारा आखिरी बार सुनवाई 15 दिसंबर को की गई थी. कोई भी इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकता कि सभी आठ मामलों की सुनवाई एक ही संवैधानिक पीठ द्वारा की गई.

आधार मामले में संवैधानिक खंडपीठ की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा कर रहे हैं. इस पीठ में जस्टिस एके सीकरी, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और अशोक भूषण शामिल हैं. इन्हीं जजों की बेंच देश और महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आठ मामलों की भी सुनवाई कर रही है और इस बेंच में सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज भी शामिल नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट में लैंगिक विविधता की कमी
संभवत: सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट लिंग, जाति और वर्ग का ध्यान रखे बिना ही संवैधानिक बेंचों को दिए जा रहे हैं. शीर्ष कोर्ट में बाकी जजों की तरह महिला जज भी एक ही कानूनी और संवैधानिक सिद्धांत का पालन करती हैं. उनके पास लैंगिक मुद्दे पर भी फैसला लेने का अधिकार नहीं है.

अब इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि ऐसी संस्था जो हमेशा लैंगिक अधिकारों को बरकरार रखती है, जो हमेशा समानता और महिलाओं के अधिकारों के लिए खड़ी होती है वहां ही संवैधानिक बेंचों में लैंगिक विविधता की कमी देखने को मिल रही है. यहां तक कि महिलाओं के जुड़े मुद्दों में भी यहीं देखने को मिल रहा है.

ये भी बेहद दिलचस्प है कि अभी तीन दिन पहले ही एक और महिला जज को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई है, वहीं सुप्रीम कोर्ट महिलाओं से जुड़े मुद्दे में ही एक महिला जज को शामिल करने में नाकाम रहा है.

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