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मुस्लिम पक्ष ने ASI की रिपोर्ट को किया खारिज, राम मंदिर होने के सबूतों को बताया अफवाह

News18Hindi
Updated: September 29, 2019, 3:41 PM IST
मुस्लिम पक्ष ने ASI की रिपोर्ट को किया खारिज, राम मंदिर होने के सबूतों को बताया अफवाह
अयोध्या विवाद मामले में मुस्लिम पक्षकार ने कोर्ट के सामने अपना नोट रखा है.

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ के सामने मुस्लिम पक्ष (Muslim side) की वकील मीनाक्षी अरोड़ा (Meenakshi Arora) ने इस बात को रखा कि इन किताबों और राजपत्रों में दर्ज किए गए विवरण खुद लेखकों के व्यक्तिगत अनुभव नहीं हैं, बल्कि मिथकों पर आधारित हैं.

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  • Last Updated: September 29, 2019, 3:41 PM IST
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नई दिल्ली. पुरातात्विक रिपोर्ट को खारिज करने के बाद अयोध्या विवाद (Ayodhya Dispute) मामले में मुस्लिम पक्ष (Muslim side) ने अब इतिहास के उन दावों को अफवाह और मिथक करार दिया, जिसमें बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) से पहले वहां हिंदू मंदिर (Hindu temple) होने की संभावनाओं के बारे में बताया गया है. इस मामले में मुस्लिम पक्षकारों की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की 2003 की रिपोर्ट पर भरोसा करना बहुत खतरनाक होगा, जिसमें मंदिर के अस्तित्व के बारे में बात की गई थी. उन्होंने कहा कि विवादित स्थल पर हिंदू धार्मिक संरचना की संभावना की बात करने वाली 18वीं और 19वीं शताब्दी की किताबों और राजपत्रों की कोई भी विश्वसनीयता पूरी तरह से भरोसा करने योग्य नहीं है.

मुस्लिम पक्ष की दलील
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ के सामने अरोड़ा ने इस बात का नोट रखा कि इन किताबों और राजपत्रों में दर्ज किए गए विवरण खुद लेखकों के व्यक्तिगत अनुभव नहीं हैं, बल्कि मिथकों पर आधारित हैं. इस नोट में जोड़ा गया है, "लेखकों में से कोई व्यक्तिगत रूप से साइट पर राम मंदिर या उसे मुसलमानों द्वारा ध्वस्त किए जाने के गवाह नहीं थे. बल्कि उनका लेखन मिथकों और कहानियों के आधार पर है, जो उन्होंने स्थानीय आबादी से सुना था, जो पूरी तरह से 'सबजेक्टिव' हैं और एएसआई की रिपोर्ट भी प्रत्यक्ष या पर्याप्त रूप से मंदिर होने के मजबूत सबूत का गठन नहीं करते."

इतिहास के वो दावे जिसमें है मंदिर का जिक्र

दरअसल, 17वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच के यात्रा वृत्तांत को सिविल सूट के समूह में रिकॉर्ड पर लाया गया था. जिसमें अयोध्या में भगवान राम की पूजा का उल्लेख है लेकिन वहां किसी भी मस्जिद के अस्तित्व के बारे में बात नहीं की गई है. ठीक इसी तरह 1740-1770 तक जेसुइट मिशनरी जोसेफ टेइफेंथेलर के यात्रा वृत्तांतों में भी भगवान राम की स्मृति में सरयू नदी के दक्षिणी किनारे पर निर्मित कई इमारतों और मंदिरों के बारे में बताया गया है. इस किताब में अयोध्या में भगवान राम के 'पालने' का भी उल्लेख है.

1838 से मोंटगोमरी मार्टिन सर्वेक्षण की रिपोर्ट 'इतिहास, प्राचीन वस्तुएं, इमारत की संरचना और पूर्वी भारत के आंकड़े' के मुताबिक, रामगढ़ का किला और राम जन्मभूमि मंदिर का पुनर्निर्माण राजा विक्रम द्वारा किया गया था, जिनकी वंशावली का संबंध राम के वंश से था. किले और मंदिर के विनाश के लिए स्थानीय हिंदुओं द्वारा बाबर के आक्रमण को जिम्मेदार ठहराया गया था. 1854 से ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्र के कुछ राजपत्रकारों ने ये भी उल्लेख किया था कि हिंदुओं का मानना ​​था कि सरयू नदी के तट रामायण के नायक, अयोध्या के राजा राम के दरबार का ही खंडहर हैं.

पीठ ने मामले में दलीलें पूरी करने के लिए 18 अक्टूबर की समयसीमा तय की है
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हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने अब अदालत के सामने अपने नोट को पेश किया कि ये सभी विश्वसनीय साक्ष्य नहीं हैं, बल्कि मिथकों पर आधारित हैं. इससे पहले उन्होंने तर्क दिया था कि पुरातत्व एक "सामाजिक विज्ञान" है, न कि पुष्टि करने योग्य निर्णायक सबूत. पांच जजों वाली बेंच जिसमें जस्टिस एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नज़ीर शामिल हैं, इन लोगों ने अब तक 33 दिनों तक मामले की सुनवाई की है. पीठ ने मामले में दलीलें पूरी करने के लिए 18 अक्टूबर की समयसीमा तय की है, ये देखते हुए कि सीजेआई गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो जाएंगे और फैसला उनके रिटायर होने से पहले आना चाहिए या मामले की सुनवाई फिर से होनी चाहिए. सुनवाई सोमवार को फिर से शुरू होगी, जब मुस्लिम पक्ष अपनी पेशी जारी रखेंगे.

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First published: September 29, 2019, 3:19 PM IST
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