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दिल्‍ली के लोगों ने पिछले 829 दिन में सिर्फ 2 दिन ली साफ हवा में सांस

News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 1:33 PM IST
दिल्‍ली के लोगों ने पिछले 829 दिन में सिर्फ 2 दिन ली साफ हवा में सांस
दिल्‍ली में कभी हवा बहुत साफ नहीं रही है. ऐसे में हर दिन जब आप सांस ले रहे हैं तो धीमे-धीमे अपना जीवन कम कर रहे हैं.

राष्‍ट्रीय राजधानी (National Capital) में 31 जुलाई, 2017 और 18 अगस्‍त, 2019 को ही वायु गुणवत्‍ता सूचकांक (AQI) 50 से नीचे रहा. दोनों ही दिन रुक-रुक कर हुई बारिश (Intermittent Rains) और तेज हवाओं (Strong Winds) ने प्रदूषण (Pollution) के स्‍तर को घटा दिया था.

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  • Last Updated: November 7, 2019, 1:33 PM IST
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अनिरुद्ध घोषाल

नई दिल्‍ली. राष्‍ट्रीय राजधानी (National Capital) और आसपास के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को स्‍मॉग (Smog) से कुछ राहत मिल गई है. दिल्‍ली-एनसीआर (Delhi-NCR) का आसमान फिर नीला हो गया है. हालांकि, विशेषज्ञों और अधिकारियों का कहना है कि इस राहत को बनाए रखने की बहुत जरूरत है. दिल्‍ली के लोगों ने बीते 829 दिन में महज दो दिन ही साफ हवा (Clean Air) में सांस ली है. इसमें 31 जुलाई, 2017 को वायु गुणवत्‍ता सूचकांक (AQI) 47 पर था. वहीं, इस साल 18 अगस्‍त को एक्‍यूआई 49 पर था. यानी जुलाई 2017 से अब तक दिल्‍ली में सिर्फ दो दिन ही खुलकर सांस लेने लायक हवा थी. बता दें कि दोनों ही दिन रुक-रुक कर हुई बारिश (Intermittent Rains) और तेज हवाओं (Strong Winds) के कारण प्रदूषण (Pollution) का स्‍तर नीचे आया था. इसमें लोगों का कोई योगदान नहीं था.

दिल्‍ली में बुधवार को एक्‍यूआई 219 था, जो खराब स्‍तर माना जाता है
दिल्‍ली में बुधवार को एक्‍यूआई 219 था, जो खराब (Poor) श्रेणी में आता है. इस स्‍तर पर सरकार ज्‍यादा देर तक बाहर नहीं रहने की सलाह देती है. जब एक्‍यूआई 51 से 100 के बीच रहता है तो इसे संतुष्टिजनक स्‍तर (Satisfactory Level) माना जाता है. इसमें सांस की तकलीफ के मरीजों को परेशानी होती है. पांच साल पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर (Prakash Javadekar) ने राष्‍ट्रीय वायु गुणवत्‍ता सूचकांक (NAQI) जारी करते हुए कहा था कि ये इंडेक्‍स सरकार के उस अभियान का हिस्‍सा है, जिसके तहत स्‍वच्‍छता संस्‍कृति (culture of cleanliness) को बढ़ावा दिया जाएगा. साथ ही वायु प्रदूषण को घटाने के लिए इंस्‍टीट्यूशनल और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चरल बदलाव किए जाएंगे. स्‍वच्‍छ वायु अभियान को जनआंदोलन बनाया जाएगा.

दिल्‍ली में वायु गुणवत्‍ता में सुधार के लिए कई कदम उठाए जा चुके हैं. हालांकि, अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है.


हर दिन सांस लेने के साथ धीमे-धीमे अपना जीवन घटा रहे हैं लोग
दिल्‍ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (Delhi Pollution Control Committee) के एक अधिकारी ने News18 को बताया कि वायु गुणवत्‍ता (Air Quality) में सुधार के लिए कई कदम उठाए जा चुके हैं. इससे वायु गुणवत्‍ता में बदलाव भी आया है. बावजूद इसके अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है. दिल्‍ली में कभी हवा बहुत साफ नहीं रही है. ऐसे में हर दिन जब आप सांस ले रहे (Breathing) हैं तो आप धीमे-धीमे अपना जीवन कम कर रहे हैं. जनवरी, 2019 में तत्‍कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री (Union Environment Minister) और मौजूदा स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री (Union Minister for Health) ने संसद में कहा था कि वायु प्रदूषण और मौतों के बीच सीधा संबंध तय करने के लिए पूरे देश के एकीकृत आंकड़े (Conclusive Data) उपलब्‍ध नहीं हैं.
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वायु प्रदूषण स्‍वीकार्य स्‍तर पर रहने से बढ़ सकता है औसत जीवन
स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के संसद (Parliament) में दिए बयान से एक महीने पहले ही 'द इंपेक्‍ट ऑफ एयर पॉल्‍यूशन ऑन डेथ्‍स, डिजीज बर्डन एंड लाइफ एक्‍सपेक्‍टेंसी अक्रॉस द स्‍टेट ऑफ इंडिया: द ग्‍लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्‍टडी 2017' नाम से एक शोध (Study) प्रकाशित हुआ था. इसकी फंडिंग इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने की थी, जो केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय (Health Ministry) के अधीन है. इसमें बताया गया था कि हर आठ में एक मौत वायु प्रदूषण के कारण हो रही है. अगर वायु प्रदूषण स्‍वीकार्य स्‍तर (Acceptable Level) पर रहता है तो देश में औसत जीवन में 1.7 साल की बढ़ोतरी हो सकती है. इस समय दिल्‍ली और आसपास के शहरों में हवा बहुत घातक है.

लोगों का यह सोचना गलत है कि पराली जलाने के समय में ही प्रदूषण होता है.


'लोग सोचते हैं सिर्फ पराली जलाने के समय होता है वायु प्रदूषण'
अधिकारी ने कहा, 'लोगों का मानना है कि पराली जलाने (Stubble Burning) के दौरान वायु प्रदूषण होता है और बाकी समय सब ठीक रहता है. दरअसल लोगों की यही सोच सबसे बड़ी समस्‍या है. असल में ऐसा नहीं है. दिल्‍ली-एनसीआर में पूरे साल हवा की स्थिति खुलकर सांस लेने वाली नहीं रहती है. स्‍मॉग का समय सबसे खराब होता है, लेकिन यह इकट्ठा हुआ प्रदूषण है जो वापस लोगों तक पहुच जाता है. आईआईटी दिल्‍ली (IIT Delhi) के सेंटर फॉर एटमॉस्फिरिक साइंसेज (CAS) के 2007 में किए गए एक अध्‍ययन के मुताबिक, वाहनों की बढ़ती संख्‍या के कारण प्रदूषण करने वाले तत्‍वों का उत्‍सर्जन (Emission) बढ़ सकता है. लिहाजा, दिल्‍ली में वाणिज्यिक डीजल वाहनों पर रोक लगाई जानी चाहिए.

वायु प्रदूषण से लड़ाई में नदारद रही है जन स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली
आईआईटी दिल्‍ली के शोध के 12 साल बाद यानी 2019 में भू-विज्ञान मंत्रालय (Earth Science Ministry) के अधीन इंस्‍टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (IITM) की आई रिपोर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 2007 से अब तक मामूली बदलाव किए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, वाहनों से होने वाले उत्‍सर्जन में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. दिल्‍ली में वाहनों से होने वाले पीएम 2.5 (PM 2.5) के उत्‍सर्जन में 2010 के 25 फीसदी से 2018 के 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है. वायु प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में हमारी जन स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली (Public Health System) नदारद रही है. दिल्‍ली की आप सरकार इसको लेकर काफी जागरूक है. वहीं, जल्‍द ही दिल्‍ली में 4000 नई बसें भी उतारी जानी वाली हैं.

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First published: November 7, 2019, 1:33 PM IST
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