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मोदी सरकार 2.0 में चीन-पाकिस्तान को साधने में अहम होगा डोभाल और जयशंकर का रोल

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में चीन और पाकिस्तान को साधने में अजीत डोभाल और एस जयशंकर की महत्वपूर्ण भूमिका होगी

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में चीन और पाकिस्तान को साधने में अजीत डोभाल और एस जयशंकर की महत्वपूर्ण भूमिका होगी

पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर बालाकोट एयर-स्ट्राइक ने साफ कर दिया कि यह देश आतंक को बर्दाश्त नहीं करेगा. पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करने पर भी डोभाल-जयशंकर की जोड़ी को कामयाबी मिली.

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केंद्र में फिर एक बार मोदी सरकार के आते ही विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने वाली जोड़ी वापस लौट आई है, लेकिन एक अलग किरदार में. पिछली मोदी सरकार में NSA अजीत डोभाल और उस समय के विदेश सचिव एस जयशंकर की सुपरहिट जोड़ी ने भारत को न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नया मुकाम दिया, बल्कि जटिल चुनौतियों से निपटने में भी कामयाब रहे.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में पाकिस्तान समर्थित आतंक का भी मुंहतोड़ जवाब दिया गया. पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर बालाकोट एयर-स्ट्राइक ने साफ कर दिया कि यह देश आतंक को बर्दाश्त नहीं करेगा. पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करने पर भी डोभाल-जयशंकर की जोड़ी को कामयाबी मिली.

चीन के साथ 74 दिनों तक चलने वाले डोकलाम विवाद को हल करने में भी इस जोड़ी को बड़ी कामयाबी मिली. विवाद हल करने के लिए जयशंकर न सिर्फ अन्य देशों के विदेश मंत्रियों से चर्चा करते हैं, बल्कि सीधे NSA और राष्ट्राध्यक्षयों से मिलकर भारत के हितों की बात करते हैं.

वहीं UPA सरकार के रहते लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी में भी चीन ने घुसपैठ कर डेरा जमा लिया था, उस वक़्त भी एस जयशंकर ने बतौर भारतीय राजदूत चीन से सीधे संपर्क कर इस विवाद को हल करने में अहम भूमिका निभाई थी.



मोदी सरकार सत्ता में लौटी तो अजीत डोभाल को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर फिर NSA बनाया गया, वहीं एस जयशंकर इस बार विदेश मंत्री की भूमिका में लौटे हैं, लेकिन आज भी इस जोड़ी के लिए चुनौतियां बरकरार है. अगले पांच सालों में भी पाकिस्तान और चीन पर मोदी सरकार की खास नजर रहेगी.

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पाकिस्तान सबसे बड़ी चुनौती

जानकर मानते हैं कि पाक समर्थित आतंकवाद अगले पांच सालों में भी सबसे बड़ी चुनौती रह सकता है. पुलवामा हमले के बाद भारत की जवाबी कार्रवाई से यह संदेश भी गया कि भारत ऐसे हर आतंकी हमलों का कड़ा जवाब देने को तैयार है. पुलवामा हमले के बाद भारत-पाक संबंधों में गिरावट आई है. पीएम मोदी के शपथग्रहण में इमरान खान को न्यौता नहीं भेजा गया, वहीं एससीओ में आमने-सामने होने पर भी मोदी-इमरान को औपचारिक मुकालात नहीं हुई, वहीं किर्गिस्तान जाने के लिए भी पीएम के विमान ने पाकिस्तान के एयरस्पेस का इस्तेमाल नहीं किया.

फिलहाल पाकिस्तान आर्थिक मंदी से जूझ रहा है, जिससे इमरान खान सरकार इससे निपटने की हर कोशिश कर रही है. पाकिस्तान पर लगातार FATF का भी दबाव बढ़ रहा है. पश्तून इलाकों में अशांति भी एक बड़ी चुनौती है. पाक सरकार ने हाल ही में फैज हमीद को ISI चीफ नियुक्त किया. 2017 के फैजाबाद धरने को खत्म करने में हमीद का बड़ा किरदार रहा है. आंतरिक सुरक्षा में भी हमीद को माहिर माना जाता है. खुफिया विभाग के मुखिया हमीद भी शुरुआत में आंतरिक मामलों पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं.

लेकिन इस समय पाकिस्तान भारत से टकराव नहीं चाहेगा. एक और हमला कर पाकिस्तान भारत को जवाबी हमले का मौका नहीं देना चाहेगा. शायद यही वजह है कि हाल ही में पाक ने भारत को कश्मीर में आतंकी हमले से जुड़ा अलर्ट दिया, लेकिन जैसे ही पाक इस मंदी से बाहर आएगा, नए ISI मुखिया का ध्यान वापस भारत की और जा सकता है. ऐसे में डोभाल-जयशंकर की जोड़ी को पाकिस्तान पर लगातार दबाव बनाना पड़ेगा.



चीन से नजदीकियां जरूरी

चीन और भारत के संबंध हाल ही में बेहतर हुए हैं. आतंकी मसूद अजहर को UN सुरक्षा परिषद द्वारा आतंकी घोषित करने में इस बार चीन ने सहयोग किया. इस कदम से भारत-चीन के संबंधों को नया बल मिला है. वहीं सीमा विवाद अगले पांच सालों में भी सबसे बड़ा मुद्दा रह सकता है. सीमा विवाद ने ही डोकलाम और दौलत बेग ओल्डी जैसे विवादों को जन्म दिया. ऐसे में स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर पर बातचीत जारी रहेगी.

वहीं वन बेल्ट वन रोड़ पर चीन भारत को साथ लाना चाहता है, लेकिन जब तक भारत के हितों का ख्याल नहीं रखा जाएगा, तब तक भारत इस प्रोजेक्ट का समर्थन नहीं करेगा. अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड-वॉर के बीच चीन भी भारत से अच्छे व्यापारिक संबंध चाहता है.

वहीं वुहान में पीएम मोदी-शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक मुलाकात ने नई दोस्ती की शुरुआत की है, जिसे 'वुहान स्पिरिट' के नाम दिया गया है. इस दोस्ती को जारी रखते हुए चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग भारत आएंगे और इस बार बनारस में दोनों राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात होगी.

ऐसे में डोभाल-जयशंकर की जोड़ी को चीन से साथ रिश्तों को और मजबूत करने के लिए और ठोस कदम उठाने होंगे.

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