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'अजित पवार ऐसे ही दावा नहीं कर रहे, उनके पास कुछ तकनीकी ताकत है'

Sudhir Jain | News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 11:44 AM IST
'अजित पवार ऐसे ही दावा नहीं कर रहे, उनके पास कुछ तकनीकी ताकत है'
महाराष्ट्र के डिप्टी CM पद की शपथ लेने के बाद अजित पवार का दावा है कि उनके पास जरूरी विधायकों का समर्थन है.

महाराष्ट्र का सियासी ड्रामा जारी है. सरकार बनाने की कवायद में सड़क से लेकर कोर्ट तक संग्राम है. सबके अलग-अलग दावे हैं. लेकिन सवाल ये है कि अजित पवार विधायकों के समर्थन का जो दावा कर रहे हैं, उसका आधार क्या है?

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  • Last Updated: November 25, 2019, 11:44 AM IST
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सत्ता की राजनीति में आजकल चमत्कार बहुत होने लगे हैं. महाराष्ट्र इसकी मिसाल है. और जब से राजनीति सिर्फ सत्ता की पर्याय बन गई है तब से सत्ता की राजनीति में कुन्नी सी संभावना भी सौ फीसद आकार ले सकती है. लेकिन पता नहीं महाराष्ट में दूर की संभावनाओं पर बात क्यों नहीं हो रही है. एक शाम जब मीडिया को लग रहा था कि अब तो एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना सरकार बना ही ले जाएंगे उसके कुछ घंटे बाद ही सुबह सबेरे भाजपा और अजित पवार का शपथ ग्रहण समारोह हो गया. इसकी संभावना कोई नहीं जता पाया था. हर पल राजनीति पर कान धरे रखने वाली जासूसी पत्रकारिता के लिए तो यह डूब मरने जैसी बात थी. बहरहाल, मौजूदा पत्रकारिता को इस शर्मिंदगी से फौरन ही सबक लेना चाहिए. कम से कम महाराष्ट के बाकी बचे रहस्यों पर अनुमान या अटकलें लगाने से बचना नहीं चाहिए.

यह मामूली अटकल है कि भाजपा अजित पवार की सरकार विश्वासमत हासिल नहीं कर पाएगी. यह भी संभावना नकारी नहीं जा सकती कि वे किसी हुनर से विश्वासमत हासिल कर लेंगे. कोई यह भी अटकल लगा सकता है कि एनसीपी शिवसेना और कांग्रेस विश्वासमत को परास्त कर देगी और उसके बाद उनकी सरकार बन जाएगी. लगाने को यह अटकल भी लगाई जा सकती है कि फिर से राष्ट्रपति शासन लगने के आसार बनेंगे. बहुत दूर की सोचें तो हजार में एक सूरत यह भी बन सकती है कि एक बार 44 विधायकों वाली कांग्रेस को भी सरकार बनाने का न्योता देने की रस्म निभानी पड़े. लेकिन यह अटकल अभी बिल्कुल भी नहीं लगाई जा पा रही है कि भाजपा अगर विश्वास मत में नाकाम रहने के बाद भी सत्ता में बनी रह सकती है तो वह किस सूरत में संभव है.

सोमवार सबेरे तक की स्थिति के मुताबिक सबकी नज़र सुप्रीमकोर्ट पर है. सब जानते हैं कि कोर्ट कचहरियां सोचने समझने में जल्दबाजी नहीं करतीं. और यह भी सब जानते हैं कि राजनीतिक सदन खुद को संप्रभु मान कर चलते हैं. खुद अदालतें भी अपनी सीमा जानती हैं. आमतौर पर विधायिका के काम में दखल देने से वे बचती हैं. उधर राजभवन हों या सदन के अध्यक्ष, उनके पास स्वविवेक से फैसले लेने की खूब गुंजाइश रहती है. और ऐसी ज्यादा से ज्यादा गुंजाइश पैदा करने से कोई नहीं चूकता. और इसीलिए स्वविवेक या अंतरात्मा का नुक्ता है जो किसी राजनीतिक अटकल लगाने में हमेशा आड़े आता है.


फिर भी महाराष्ट में तेजी से घूमता घटनाचक्र एक रहस्य पैदा कर रहा है. खासतौर पर यह रहस्य कि फड़नवीस विश्वास मत किस हुनर से हासिल कर सकते हैं. यह रहस्य एक अबूझ पहली है. क्योंकि भाजपा के पास अपने 105 विधायक हैं. और अब तक के राजनीतिक बयानों और टीवी चैनलों के फुटेज को देखें तो अजित पवार के पास चार छह या हद से हद दस बारह विधायक होने का अनुमान ही लग पा रहा है. थोड़ी देर के लिए 19 निर्दलीय विधायकों में खींचतानकर 15 का आंकड़ा भी भाजपा के पक्ष में जाने को मान लें तब भी 145 का गणित बैठता नहीं दिखता. हालांकि शपथ ले चुकी सरकार अपने पास 170 विधायकों के समर्थन का दावा कर रही है. लेकिन ये 170 का आंकड़ा बहुत ही बड़ा रहस्य या चमत्कार लग रहा है. बल्कि आज दिन तक 145 तक पहुंचना भी दूर की संभावना नजर आती है. लेकिन फिर भी आखिर में भाजपा अजित पवार की सरकार ही बनने की कोई और सूरत निकाली जाए तो वह नायाब सूरत ही होगी. यह संभावना कितनी भी दुर्लभ या दुर्बल हो लेकिन एक दूर की संभावना तो जताई ही जा सकती है.

अजित पवार, NCP अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे हैं और राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं.


वह अटकल ये है कि किसी तरह तीस चालीस विधायक अयोग्य घोषित हो जाएं. तब विधानसभा में सक्षम विधायकों की संख्या 288 से घटकर कोई ढाई सौ रह जाएगी. यानी सरकार बनाने के लिए सवा सौ का आंकड़ा ही काफी होगा. सारा जोर लगाकर इतनी हैसियत तो भाजपा और अजित बना ही सकते हैं. बस उसकी शर्त यह है कि तीस चालीस विधायक किसी तरह अयोग्य घोषित हो जाएं. हालांकि इसके साथ एक और शर्त नत्थी है कि अयोग्य घोषित किए जाने वाले विधायक सिर्फ एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस के ही होने चाहिए. फर्ज कीजिए अजित पवार किसी तरह भाजपा के रसूख की मदद से खुद को एनसीपी का सर्वेसर्वा साबित करने में सफल हो जाते हैं. और अगर वे मुख्य सचेतक भी अपना बनवाने में सफल हो जाते हैं. साथ ही विश्वासमत की घटना के पहले विधानसभा अध्यक्ष भी अपना बनवा पाते हैं तो यह चमत्कार पैदा किया जा सकता हैं कि जो एनसीपी विधायक अजित पवार और भाजपा के विरोध में वोट दें उन पर व्हिप के उल्लंघन की तोहमत लगाकर अयोग्य करार दिलवा दिया जाए. इस अटकल का आधार या संकेत यह है कि अजित पवार अभी भी खुद को एनसीपी का नेता बताते चल रहे हैं. यानी उनका पूरा जोर किसी तरह मुख्य सचेतक पद हासिल करने पर लग सकता है. बहरहाल, वो बाद की बात होगी कि थोक में एनसीपी विघायकों को अयोग्य करार दिए जाने की कार्रवाई कानूनी तौर पर नाजायज होगी या नहीं. अगर कानूनी पचड़ा पड़ता है सो उसके सुलटने में वक्त लगता है. तब तक तो सदन में बाकी बचे कथित योग्य सदस्यों की संख्या के आधार पर भाजपा और अजित पवार सत्ता पकड़े भी रह सकते हैं. बेशक यह स्थिति निपट काल्पनिक है. इसकी संभावना भले ही अतिन्यून हों लेकिन जब अटकलबाजों की अटकलें बुरी तरह से गलत साबित हो रही हों तो हर संभावना और हर सूरत को दर्ज कराते चलने में हर्ज क्या है?

वैसे व्हिप उल्लंघन की तोहमत से बचने का भी है तरीका है. दलबदल कानून दो तिहाई विधायकों की सूरत में लागू नहीं होता. कानूनन तिहाई विधायक पार्टी से टूटकर नया वैध समूह बना सकते हैं. लेकिन महाराष्ट मामले में मुख्य एनसीपी यह पहल क्यों करने लगी. उसने अजित पवार को विधायक दल के नेता पद से हटा दिया है. लेकिन इस मुश्किल की तरफ उसका ध्यान नहीं है कि पोलिटी यानी राजव्यवस्था के सारे अंग एक साथ जोर लगा दें तो दलबदल कानून की व्याख्या पर बहस भी छिड़ सकती है. जिस तरह कचहरियों में वक्त लग जाता है उसी तरह कानून की व्यख्या भी बहुत समय लेती है. कई स्थितियां ऐसी भी हैं जिनमें वक्त का गुजरते रहना ही जीत मानी जाती है. दूर की संभावनाओं में एक विलंब की रणनीति भी है.

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First published: November 25, 2019, 11:39 AM IST
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