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महा-दंगल: अजित और शरद पवार के सियासी दांवपेच में उलझकर रह गए हैं कई सवाल

News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 2:00 PM IST
महा-दंगल: अजित और शरद पवार के सियासी दांवपेच में उलझकर रह गए हैं कई सवाल
एनसीपी प्रमुख शरद पवार का सरकार बनाने के लिए खींचा गया लंबा वक्‍त और अजित पवार के बीजेपी के साथ जाने से महाराष्‍ट्र की सियासत में कई सवाल उलझ गए हैं.

महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के बागी नेता अजित पवार (Ajit Pawar) के समर्थन से बीजेपी (BJP) की सरकार बनने और एनसीपी प्रमुख शरद पवार (Sharad pawar) के ऊहापोह की स्थिति में रहने को लेकर कई सवाल हैं...

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  • Last Updated: November 25, 2019, 2:00 PM IST
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धवल कुलकर्णी

मुंबई. महाराष्‍ट्र (Maharashtra) की सियासत में चौंकाने वाली करवट लेकर बीजेपी के पाले में जा बैठने वाले एनसीपी (NCP) के बागी नेता अजित अनंतराव पवार (Ajit Anantrao Pawar) को तेजतर्रार नेता के तौर पर जाना जाता है. वह अकसर भावनाओं में बहकर आवेश में आ जाते हैं. लेकिन, उनके जानने वालों का कहना है कि इस बार उन्‍होंने सोच-समझकर और योजना बनाकर एनसीपी और चाचा शरद पवार (Sharad Pawar) से बगावत की है. अजित पवार ने शनिवार सुबह महाराष्‍ट्र के उपमुख्‍यमंत्री और बीजेपी (BJP) के देवेंद्र फडणवीस ने मुख्‍यमंत्री के तौर पर शपथ ली. इससे पहले शनिवार तड़के महाराष्‍ट्र से राष्‍ट्रपति शासन हटा दिया गया था.

उद्धव ठाकरे को मुख्‍यमंत्री बनाने पर बन गई थी सहमति
इससे एक रात पहले यानी शुक्रवार रात को ही एनसीपी और कांग्रेस (Congress) ने विचारधारा के स्‍तर पर विरोधी पार्टी शिवसेना (Shiv Sena) के साथ सरकार बनाने की करीब-करीब सहमति दे ही दी थी. यहां तक कि शरद पवार ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को मुख्‍यमंत्री बनाने की घोषणा भी कर दी थी. बीजेपी के साथ तीन दशक का साथ छोड़कर शिवसेना ठाकरे परिवार से किसी व्‍यक्ति को सीधे सत्‍ता में लाने की योजना बना रही थी. इससे पहले तक ठाकरे परिवार का सत्‍ता में दखल तो रहा है, लेकिन परिवार का कोई सदस्‍य सीधे सत्‍ता में शामिल नहीं हुआ था.

अजित को गठबंधन में भी मिलने वाला डिप्‍टी सीएम का पद
ज्‍यादातर लोगों को लगा कि शनिवार सुबह के घटनाक्रम में शरद पवार की सहमति (Consent) भी थी. इस भ्रम को तोड़ने के लिए शरद पवार ने एनसीपी नेताओं और विधायकों की मीडिया के सामने परेड करवाई. वह यही समझाने की कोशिश करते रहे कि अजीत पवार ने व्‍यक्तिगत तौर पर यह फैसला लिया है. बावजूद इसके कई ऐसे सवाल हैं, जिनका अब तक जवाब नहीं मिल पा रहा है. सबसे बड़ा सवाल तो यही कि जब अजित पवार को शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन (Alliance) में भी उपमुख्‍यमंत्री का पद मिलने वाला था तो उन्‍होंने बीजेपी के साथ जाने का फैसला क्‍यों किया.

शरद पवार को अगर महाराष्‍ट्र में सरकार बनानी थी तो शिवसेना को शुक्रवार की बैठक के दौरान ही समर्थन पत्र क्‍यों नहीं दिया गया?

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शरद पवार ने पहले ही शिवसेना को क्‍यों नहीं सौंपा समर्थन पत्र
बड़ा सवाल यह भी कि शरद पवार ने शिवसेना को समर्थन पत्र देने पर कदम पीछे क्‍यों हटाए. जब सरकार बनानी थी तो शिवसेना को शुक्रवार की बैठक के दौरान ही समर्थन पत्र क्‍यों नहीं दिया गया. इसके अलावा उन्‍होंने भ्रम पैदा करने वाले बयान दिए, जबकि तीनों पक्ष समझौता करने की कोशिश कर रहे थे. एनसीपी ने पूरी प्रक्रिया को इतना क्‍यों उलझाया कि राष्‍ट्रपति शासन लगाने की नौबत आ गई. क्‍या यह महज संयोग है कि जब शिवसेना ने सत्‍ता में शामिल होने के लिए आवाज उठाई तभी उन्‍हें सबसे ज्‍यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है. फिलहाल महाराष्‍ट्र में एनसीपी और बीजेपी एकदूसरे को प्रभावित कर सबसे ज्‍यादा फायदा पाने की स्थिति में हैं.

योजना नाकाम होने पर सबसे ज्‍यादा नुकसान में रहेगी कांग्रेस
कांग्रेस ने महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने के मामले में बहुत सोच-समझकर धीमे और सधे हुए कदमों के साथ शिवसेना की ओर कदम बढ़ाए. काफी मथापच्‍ची के बाद कांग्रेस वैचारिक तौर पर कट्टर विरोधी शिवसेना का साथ देने को तैयार भी हो गई थी. सरकार बनाने की योजना नाकाम होने पर सबसे ज्‍यादा नुकसान में कांग्रेस ही है. साथ ही उसे महाराष्‍ट्र में एनसीपी से ही कई विधानसभा क्षेत्रों में सीधी चुनौती मिलती है. ये और इन जैसे कई सवालों का जवाब फ्लोर टेस्‍ट से पहले राज्‍य में धीरे-धीरे बनने-बिगड़ने वाले समीकरणों के साथ मिल पाएगा.

अजित के लिए फायदे का सौदा ही साबित होगा बीजेपी का साथ
अजित पवार को भरोसा है कि उन्‍होंने सियासत की बिसात पर सौ टका खरी चाल चली है. लोगों का कहना है कि अगर अजित शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार में उपमुख्‍यमंत्री बन भी जाते तो भी उनके लिए तीनों दलों के हितों के साथ सामंजस्‍य बैठा पाना आसान नहीं होता. इसी कारण अजित पवार को बीजेपी के साथ जाने में बेहतरी नजर आई होगी. अगर अजित पवार का दांव फ्लोर टेस्‍ट के बाद गलत साबित हो जाता है तो भी वह सिंचाई विभाग में भ्रष्‍टाचार के बीजेपी के आरोपों से बच जाएंगे. अजित पवार के इस कदम से पहले ही एनसीपी का एक धड़ा प्रवर्तन निदेशालय जैसी केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से बचने के लिए बीजेपी के साथ जाने के पक्ष में नजर आ रहा था.

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. साथ ही 'The Cousins Thackeray: Uddhav, Raj and the Shadow of their Senas' के लेखक भी हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: November 25, 2019, 1:44 PM IST
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