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चाचा शरद जैसा कारनामा करने की फिराक में थे अजित पवार, उलटे पड़ गए पासे 

News18Hindi
Updated: November 26, 2019, 10:14 PM IST
चाचा शरद जैसा कारनामा करने की फिराक में थे अजित पवार, उलटे पड़ गए पासे 
चाचा शरद पवार जहां बड़े सियासी उलटफेर में माहिर माने जाते हैं. वहीं, भतीजे अजित पवार को पहले ही दांव में मात का स्‍वाद चखना पड़ा.

एनसीपी प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) ने 41 साल पहले अपनी पार्टी कांग्रेस (एस) के विधायकों को तोड़कर तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री वसंत दादा पाटील (Vasant Dada Patil) की सरकार गिरा दी थी. इसके बाद विरोधी दल जनता पार्टी (Janata Party) के साथ मिलकर सरकार बना ली थी.

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  • Last Updated: November 26, 2019, 10:14 PM IST
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नई दिल्‍ली. महाराष्‍ट्र में बार-बार करवट बदलने के बाद अब सियासी ऊंट एक ठौर बैठता दिख रहा है. उम्‍मीद है कि कल यानी बुधवार को शिवसेना प्रमुख उद्धव एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से सीएम की कुर्सी पर बैठने वाले पहले ठाकरे बन जाएंगे. पिछले कुछ दिन महाराष्‍ट्र (Maharashtra) की सियासत में बड़ी उठापटक और उलटफेर वाले रहे.

पहले तो कांग्रेस (Congress) ने विचारधारा के स्‍तर पर विरोधी शिवसेना (Shiv Sena) को समर्थन देने पर सहमति जताई और एनसीपी (NCP) प्रमुख शरद पवार (Sharad) ने शुक्रवार रात उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को सीएम बनाने की घोषणा कर दी. अगली सुबह चौंकाने वाली थी. शनिवार अलसुबह बीजेपी ने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी एनसीपी के अजित पवार के समर्थन से बड़ा उलटफेर कर दिया. राज्‍यपाल भगत सिंह कोश्‍यारी (Bhagat Singh Koshyari) ने देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) को सीएम और एनसीपी के अजित पवार को डिप्‍टी सीएम की शपथ दिला दी.

चाचा-भतीजे की सियासी चाल एक जैसी, नतीजे एकदूसरे के उलट
महाराष्‍ट्र में हुए पूरे घटनाक्रम में अजित पवार चाचा शरद पवार के नक्‍शेकदम पर चलते नजर आए. हालांकि, दोनों की सियासी चाल में बड़ा फर्क यह था कि शरद पवार 1978 में वसंत दादा पाटील की सरकार गिराकर खुद मुख्‍यमंत्री बनने में सफल रहे थे. वहीं, अजित पवार को चार दिन बाद ही डिप्‍टी सीएम (Deputy CM) के पद से इस्‍तीफा देना पड़ा.


हालात ऐसे रहे कि सीएम देवेंद्र फडणवीस ने भी बहुमत परीक्षण (Floor Test) से पहले ही हथियार डाल दिए और इस्‍तीफा राज्‍यपाल को सौंप दिया. दरअसल, आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) रायबरेली से हार गईं और जनता पार्टी की सरकार बनी. इस दौर में महाराष्‍ट्र में भी कांग्रेस को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. राज्‍य के तत्कालीन मुख्‍यमंत्री शंकर राव चह्वाण (Shankar Rao Chavan) ने हार की नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हुए पद से इस्‍तीफा दे दिया था. उनके बाद वसंतदादा पाटील महाराष्‍ट्र के सीएम बने.

शरद पवार 37 साल की उम्र में वसंत दादा पाटील की सरकार गिराकर महाराष्‍ट्र के सबसे कम उम्र के सीएम बने थे.

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दो धड़ों में बंटी कांग्रेस को वसंत दादा ने एकजुट कर बनाई सरकार
ये कांग्रेस का बुरा दौर था. कांग्रेस अंदरूनी झगड़ों के टूट गई और कांग्रेस (एस) व कांग्रेस (आई) अस्तित्‍व में आईं. शरद पवार कांग्रेस (एस) में शामिल हो गए. महाराष्‍ट्र में 1978 में विधानसभा चुनाव हुए और दोनों कांग्रेस अलग-अलग मैदान में उतरीं. चुनाव नतीजों में कांग्रेस (एस) को 69 और कांग्रेस (आई) को 65 सीटों पर जीत मिली. जनता पार्टी ने अच्‍छा प्रदर्शन करते हुए राज्‍य की 99 सीटों पर कब्जा जमाया. हालांकि, तीनों ही पार्टियों में किसी के पास बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं था. वसंतदादा पाटील के प्रयासों से कांग्रेस के दोनों धड़े साथ आए और सरकार बनाई. स्‍वतंत्रता सेनानी वसंत दादा पाटील महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री बने. इसी बीच शरद पवार ने कांग्रेस (एस) के कुछ विधायकों को लेकर जनता पार्टी के साथ प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (PDF) बनाया और सरकार बना ली. शरद पवार महज 37 साल की उम्र में महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्‍यमंत्री बने.

इंदिरा गांधी की सत्‍ता में वापसी के साथ ही गिर गई पवार सरकार
पाटील भी कुछ समय बाद शरद पवार की पार्टी में शामिल हो गए. इंदिरा गांधी की सत्‍ता में वापसी के साथ फरवरी, 1980 में पवार सरकार गिर गई. बाद में शरद पवार भी कांग्रेस में शामिल हो गए. महाराष्ट्र की सियासत ने 41 साल बाद फिर करवट ली है. इस बार किरदार के साथ नतीजा भी बदला हुआ है. अजित पवार ने चाचा शरद पवार के नेतृत्‍व वाली एनसीपी को तोड़ा और बीजेपी (BJP) के साथ मिलकर सरकार बनाई. हालांकि, शरद पवार एक बार फिर सियासत के खेल में इक्‍कीस साबित हुए. अजित पवार ने जिन विधायकों के दम पर चाचा शरद से बगावत की उन्‍हें अपने खेमे में रोककर नहीं रख पाए. शरद पवार भतीजे के साथ गए विधायकों की वापसी कराने में सफल रहे और शपथ के चौथे ही दिन महाराष्‍ट्र के सीएम और डिप्‍टी सीएम को इस्‍तीफा देने पर मजबूर कर दिया.

अटल सरकार में डिप्‍टी पीएम की पेशकश और सोनिया गांधी के विदेश मूल के विरोध के बाद भी शरद पवार ने 1999 में महाराष्‍ट्र में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई.


अटल सरकार में डिप्‍टी पीएम के ऑफर के बाद भी दिया कांग्रेस का साथ
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधन के बाद शरद पवार 1991 में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल थे, जबकि पीएम पीवी नरसिम्हा राव को बनाया गया. नाराज शरद पवार अकसर कहते थे कि वह सोनिया गांधी की वजह से प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. उन्‍होंने कई मौकों पर कहा कि साल 1991 में 10 जनपथ के कुछ वफादारों ने सोनिया गांधी को मेरे बजाय पीवी नरसिंहराव को पीएम बनाने के लिए तैयार किया था. दरअसल, वह किसी ऐसे व्यक्ति को पीएम नहीं बनाना चाहती थीं, जिसके अपने स्वतंत्र विचार हों. इससे आठ साल बाद उन्‍होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए 1999 में एनसीपी का गठन किया. हालांकि, 1999 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद उन्‍होंने बीजेपी की अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) सरकार में उप-प्रधानमंत्री (Deputy PM) की पेशकश के बाद भी महाराष्‍ट्र में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली. विलासराव देशमुख महाराष्‍ट्र के सीएम बने.

फिर दिया सियासत में दखल तो साबित हुए 'किंग मेकर'
लोकसभा चुनाव 2004 के बाद पवार की एनसीपी कांग्रेस के नेतृत्‍व वाले यूपीए में शामिल हो गई. डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने. पवार को 22 मई 2004 को कृषि मंत्री बनाया गया. इसके बाद 29 मई, 2009 को उन्‍होंने कृषि के साथ सार्वजनिक वितरण मंत्री की जिम्‍मेदारी भी संभाली. उन्‍हें 29 नवंबर, 2005 को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का अध्‍यक्ष बनाया गया. वह 1 जुलाई, 2010 में अतंरराष्‍ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के अध्‍यक्ष बने. इसके बाद उन्‍होंने केंद्र में अपने सभी पदों से इस्‍तीफा दे दिया. उन्‍होंने इस बार महाराष्‍ट्र की सियासत में दखल दिया तो 'किंग मेकर' साबित हुए.

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First published: November 26, 2019, 9:27 PM IST
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