बरिमा फायरवर्क्स: एक महिला के परिश्रम का फल

अन्‍नपूर्णा दास.
अन्‍नपूर्णा दास.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 8, 2020, 1:33 PM IST
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अरका देव
कोलकाता. जिस किसी ने भी काली पूजा और दिवाली में पटाखे चलाए होंगे, वो बरिमा फायरवर्क्स के ट्रेडमार्क नाम से परिचित जरूर होगा. बरिमा फायरवर्क्स हावड़ा का अपना घरेलू ब्रांड है. लेकिन बहुत लोग नहीं जानते होंगे कि इस ब्रांड को यह नाम कैसे मिला.

बरिमा का असली नाम अन्नपूर्णा दास है, जो फरीदपुर में पैदा हुईं. इस कहानी की शुरुआत तब हुई जब 1947 में बंटवारे के बाद बरिमा को फरीदपुर में अपना गांव छोड़कर भागना पड़ा और आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ा. गांव छोड़ने के बाद बरिमा को अपने छह वर्ष के बेटे के साथ दक्षिण दिनाजपुर में गंगारामपुर के रिफ्यूजी कैंप में शरण लेनी पड़ी. 1948 के साल में दंगा पीड़ित अन्नपूर्णा अपने तीन बच्चों के साथ पूर्वी पाकिस्तान से शहर पहुंचीं. गरीबी से लड़ते हुए उन्होंने बाजार में सब्जी बेचने का काम शुरू किया. अपनी कमाई के पैसों से उन्होंने एक बीड़ी फैक्ट्री की शुरुआत की.

साल 1952 में बरिमा बेलूर में शिफ्ट हो गईं और एक छोटी सी दुकान खरीदी. इस दुकान में उन्होंने टॉफियां और खिलौने बेचने की शुरुआत की. इसके साथ कुछ विशेष मौकों पर बिकने वाली सामग्री जैसे सरस्वती पूजा के लिए मूर्तियां, विश्वकर्मा पूजा के लिए पतंगें और काली पूजा के लिए पटाखे भी बेचना शुरू कर दिया. मन में कुछ स्वतंत्र रूप करने की चाह लिए बरिमा ने बंकरा के एक कारीगर से पटाखे बनाना सीखा. इसके बाद बरिमा के बनाए चॉकलेट बम इतने प्रसिद्ध हो गए कि उन्होंने फिर मुड़कर पीछे नहीं देखा. जल्दी ही उनका व्यापार चमकने लगा और उन्होंने डानकुनी, तालबंधा और पटाखों के केंद्र के रूप में मशहूर शिवकाशी में भी फैक्ट्री स्थापित कर दी.
बेलूर के पेयरी मोहन मुख़र्जी रोड पर स्थित उनके घर जहां बरिमा या अन्नपूर्णा दास रहती हैं और काम करती हैं वहां काफी चहल पहल है. जहां भी देखिये केवल हर तरीके के पटाखे और उनके रंग बिरंगे पैकेट नजर आते हैं. लोगों के पसंदीदा फुलझड़ियां, रॉकेट्स, अनार और चकरी और उनके नए नए प्रकार देखने को मिलते हैं. ये इतने प्रसिद्ध हैं कि पटाखों से सजी अलमारियां मिनटों में खाली हो जाती हैं.



हर साल हावड़ा, हुगली, उत्तर और दक्षिण 24 -परगना और कोलकाता के व्यापारी बड़ी मात्रा में पटाखे खरीदने के लिए इस घर के आंगन के चक्कर लगाते हैं. 1997 में उन पटाखों पर जो जलाने के स्थान से पांच मीटर दूरी पर 90 डेसीबल से ज्यादा शोर करते थे, पर प्रतिबंध लगा दिया गया तब बिजनेस को नुकसान पहुंचा. तीन साल के बाद जब सेंट्रल नॉइज रूल के द्वारा जलाने के स्थान से चार मीटर दूरी पर 125 डेसीबल से अधिक शोर करने वाले पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया. बरिमा ट्रेडमार्क के बनाए चॉकलेट बम फिर से दुकानों की अलमारियों से गायब होने लगे.
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