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आरुषि केस: 273 पेज के फैसले में CBI के सबूतों को HC ने नकारा

संदीप कुमार | News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 3:29 PM IST
आरुषि केस: 273 पेज के फैसले में CBI के सबूतों को HC ने नकारा
हेमराज और आरुषि
संदीप कुमार | News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 3:29 PM IST
आरुषि और हेमराज के कत्ल के आरोप में गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने जिन परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर राजेश और नूपुर तलवार को दोषी ठहराया, उन्हीं परिस्थितिजन्य सबूतों को इलाहाबाद ने पूरी तरह नकार दिया. ठोस सबूतों के अभाव में तलवार दंपति को बरी कर दिया. हाईकोर्ट ने राजेश और नुपुर तलवार को दोषी ठहराए जाने के गाजियाबाद की विशेष सीबीआई कोर्ट के फैसले पर गंभीर टिप्पणियां की है.

कोर्ट ने अपने 273 पेज के फैसले में कहा है कि गलत विश्लेषण के जरिए निचली अदालत पहले से ही मान बैठा था कि नपुर और राजेश तलवार ने ही इस घटना को अंजाम दिया है. नोएडा के जलवायु विहार के फ्लैट नंबर एल 32 में 15 और 16 मई 2008 की आधी रात आरुषि और हेमराज के साथ क्या हुआ उसका निजली अदालत के जज ने फिल्म डायरेक्टर की तरह काल्पनिक और रंगीन तरीके से वर्णन किया. हाईकोर्ट ने कहा कि तलवार दंपति पर लगाए गए आरोपों के बदले सीबीआई कोई भी सबूत पेश नहीं कर पाई.

आरुषि हेमराज हत्याकांड करीब साढ़े नौ साल बाद एक बार फिर ताजा हो गया है. इस हत्याकांड के बाद नोएडा पुलिस की जांच और फिर सीबीआई की दो तेज तर्रार टीमों की जांच को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया. चाहे वो इंटरनेट राउटर हो, या घर की छत की दीवार पर मिले खून से सने हथेली के निशान या फिर वो गोल्फ क्लब जिससे इस हत्याकांड को अंजाम देने के दावे किए गए थे. किसी से भी सीबीआई को ठोस सबूत नहीं मिले. यहां तक कि हत्या के बाद घर के अंदर डाइनिंग टेबल पर मीले शराब की बोतल पर आरुषि और हेमराज के खून के निशान तो मिले, लेकिन उसपर किसी के हाथ की निशान नहीं मिल पाए जिसे सीबीआई सबूत बना सके.

इस पूरे मामले मे सीबीआई ने करीब 53 सबूत दिए, लेकिन एक भी सबूत ये साबित नहीं कर पाया कि हत्या तलवार दंपति ने की. हालांकि, सीबीआई को जांच के बाद ही ये लग गया था कि वो उपलब्ध सबूतों के आधार पर तलवार दंपति को दोषी साबित नहीं कर सकती. यही वजह है कि तत्कालीन सीबीआई डायरेक्टर एपी सिंह ने जांच एजेंसी को चार्जशीट करने के बजाए क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा. कहने को तो सीबीआई ने कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, लेकिन उसका मजमून चार्जशीट की तरह ही था. सीबीआई ने गाजियाबाद की विशेष सीबीआई कोर्ट में पेश की क्लोजर रिपोर्ट में परिस्थिजन्य सबूतों के आधार पर पूरे घटनक्रम का सिलसिलेवार ढंग से जिक्र किया और इशारा किया कि तलवार दंपति ने ही इस घटना को अंजाम दिया है.

क्लोजर रिपोर्ट के अंत में सीबीआई ने ये लिखकर अपनी खाल बचा ली कि इस पूरे मामले में उसके पास कोई भी ठोस सबूत नहीं है, सिवाय परिस्थितिजन्य सबूतों के. निचली अदालत ने सीबीआई के उन परिस्थितिजन्य सबूतों को पर्याप्त मानते हुए उसे चार्जशीट में बदल दिया और तलवार दंपति के खिलाफ आरुषि और हेमराज हत्याकांड का ट्रायल शुरू कर दिया. निचली अदालत ने इन्हीं परिस्थितिजन्य सबूतों को आधार बताते हुए नपुर और राजेश तलवार को इस हत्याकांड को दोषी भी करार दे दिया. निचली अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद तलवार दंपति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में गुरुवार को उन्हें बरी कर दिया.
गुरुवार को दिये अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न सिर्फ निचली अदालत के फैसले पर कड़ी टिप्पणी की, बल्कि पूरी जांच को ही कटघरे में खड़ा कर दिया. आरुषि और हेमराज हत्याकांड में डॉ राजेश तलवार और नूपुर तलवार को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए हाईकोर्ट के जज ने अपने फैसले में कहा है कि निजली अदालत के जज ने गलत विश्लेषण के जरिये पहले ही मान लिया था कि डॉ. राजेश तलवार और नुपुर तलवार ने हत्या को अंजाम दिया है. जज ने अभियुक्तों को महज परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर दोषी करार दे दिया. जज ने इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रखा कि परिस्थितिजन्य सबूत सिर्फ मान लेने से और खुद की बनाई गई धारणा के आधार पर नहीं हो सकते.

निचली अदालत के जज ने मौजूदा साक्ष्यों और परिस्थितियों को हल्के ढंग से लिया और उसे गणित के कठिन सवाल की तरह हल करने की कोशिश की. निचली अदालत के जज गणित के शिक्षक की तरह बर्ताव नहीं कर सकते हैं. सभी क्रिमिनल मामलों में तुलनात्मक अध्ययन साक्ष्य, तथ्य और परिस्थिति के दायरे में रिकार्ड पर मौजूद चीजों के आधार पर किया जाना चाहिए. जो ये नहीं करते वो अपने सही रास्ते से भटक जाते हैं. इसी तरह से निचली अदालत के जज सही रास्ते से भटक गए औऱ यही वजह है कि इस पूरे मामले को उन्होंने उपन्यास की काल्पनिक घटना की तरह चीजों को मान लिया.

कोर्ट ने अपने फैसले मे कहा कि उस रात जलवायु विहार के फ्लैट नंबर एल 32 में आरुषि और हेमराज के साथ जो कुछ हुआ उसका निजली अदालत के जज ने फिल्म डायरेक्टर की तरह काल्पनिक और रंगीन तरीके से वर्णन किया. निचली अदालत ने फिल्म डायरेक्टर की तरह काल्पनिक तरीके से ये फैसला लिया कि उस रात राजेश तलवार ने आरुषि और हेमराज को किन परिस्थितियों में देखा था. निचली अदालत के जज ने इसी काल्पनिक आधार पर माना कि ये अपराध किस तरह से हुआ है. निचली अदालत के जज ने बिखरे हुए साक्ष्यों और तथ्यों को आपस में मिला तो दिया लेकिन उन तथ्यों की सिलसिलेवार ढंग से व्याख्या नहीं की.

निचली अदालत के जज ये भूल गए कि दरअसल ये मामला क्या है. वो ये भूल गए कि दंपति के खिलाफ लगाए आरोपों का मतलब क्या है. ये बात पूरी तरह से साबित हो चुकी है कि दोनो पक्षों यानी तलवार दंपति और सीबीआई ये जानते ही नहीं थे कि उस रात फ्लैट के अंदर आखिर हुआ क्या. सिर्फ अनुमान लगाया गया कि उस रात फ्लैट के अंदर क्या हुआ था. लेकिन इस दोहरे हत्याकांड की वजह को सिर्फ अनुमान के आधार पर पुख्ता मान लेना और उसके आधार पर सबूतों और परिस्थिति को देखना एक भूल थी. निचली अदालत ने कानून की आधारभूत बारीकियों की अनदेखी की. वो तथ्यों को ठीक तरीके से बताने और सबूतों और अलग-अलग परिस्थितियों के विश्लेषण में नाकाम रहे.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि हो सकता है कि निचली अदालत के जज ने अति उत्साह में आकर खुद की बनाई हुई मान्यताओं के आधार पर एकतरफा और संकुचित सोच अपना लिया था. सिर्फ अपनी भावनात्मक विश्वास की बिनाह पर निचली अदालत के जज ने अपनी कल्पनाओं को ठोस रूप देने की कोशिश की. इसी क्रम में वो सबूतों और तथ्यों के विश्लेषण में चूक गए. निचली अदालत के जज को मौजूदा साक्ष्यों का उनके मौजूदा रूप में विश्लेषण करना चाहिए था न कि भावनात्मक आधार पर. निचली अदालत के जज ने चीजों को हल्के ढंग से लिया और लचीला नजरिया नहीं अपनाया. जो सबूत कभी मौजूद थे ही नहीं उन सबूतों के आधार पर फैसले तक पहुंच गए.

निचली अदालत को कानून सम्मत और पारदर्शी होना चाहिए. कानून की पूरी प्रक्रिया का माखौल न उड़े इसलिए जज को एक साधारण विचारधारा वाला होना चाहिए और कल्पनाओं को अधिक विस्तार नहीं देना चाहिए. ये कहने वाली बात नहीं है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में निचली अदालत के जज को सावधानी के साथ काम करना चाहिए. साक्ष्यों और तथ्यों को संकुचित दायरे में नहीं देखना चाहिए बल्कि साक्ष्यों को कानून सम्मत तरीके से देखना चाहिए. कोई भी फैसला खुद के बनाई हुई धारणा और कल्पना पर आधारित नहीं होना चाहिए और फैसले में पारदर्शिता नजर आनी चाहिए. इस मामले में ऐसा लगता है कि निचली अदालत के जज कानून में बताई गए मूल चीजों को भूल गए और अपने ही अंदाज में पूरे केस को डील किया.
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