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कांग्रेस का पुनर्जन्‍म: 2019 से पहले राहुल के सामने ये हैं चुनौतियां

कांग्रेस का पुनर्जन्‍म: 2019 से पहले राहुल के सामने ये हैं चुनौतियां

विपक्षी दलों के नेताओं के साथ राहुल गांधी. (PTI Photo/Shailendra Bhojak)

विपक्षी दलों के नेताओं के साथ राहुल गांधी. (PTI Photo/Shailendra Bhojak)

कांग्रेस ने रविवार को ऐलान किया कि गठबंधन की छतरी तैयार करने का जिम्‍मा राहुल गांधी के पास होगा लेकिन शर्त यह है कि कांग्रेस मुख्‍य रोल में होगी और राहुल इसके कप्‍तान रहेंगे.

    राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद कांग्रेस वर्किंग कमिटी(सीडब्‍ल्‍यूसी) की पहली बैठक में पार्टी ने 2019 के चुनावों के लिए मजबूती से कदम उठाने की तैयारी दिखाई. इसके तहत पार्टी ने 2004 के प्रदर्शन को दोहराकर बीजेपी के खिलाफ गठबंधन के नेतृत्व करने की मंशा साफ कर दी. हालांकि यह साफ कर देना जरूरी है कि समय बदल चुका है और गंगा में काफी पानी बह चुका है. नरेंद्र मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी नहीं समझना चाहिए और मोदी-शाह की जोड़ी लगभग अजेय लगती है. साथ ही बाकी छोटे दल भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के सपने देख रहे हैं और कोई भी पार्टी कांग्रेस की परछाई बनने को तैयार नहीं है.

    उदाहरण के तौर पर मायावती और ममता बनर्जी राहुल की अगुवाई वाली कांग्रेस की सहयोगी बनने की बजाय प्रधानमंत्री बनने की हसरत रखती हैं. कांग्रेस के लिए नरेंद्र मोदी या बीजेपी ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय दल भी बड़ी चुनौती हैं. इसी को ध्‍यान में रखते हुए राहुल गांधी के लिए जरूरी है कि वह कांग्रेस अस्मिता को जगाएं. कांग्रेस ने रविवार को ऐलान किया कि गठबंधन की छतरी तैयार करने का जिम्‍मा राहुल गांधी के पास होगा लेकिन शर्त यह है कि कांग्रेस मुख्‍य रोल में होगी और राहुल इसके कप्‍तान रहेंगे.

    वरिष्‍ठ नेता राज बब्‍बर ने कहा, 'केवल कांग्रेस ही बीजेपी और आरएसएस को रोक सकती है. कांग्रेस केवल एक पार्टी नहीं है वह विचारधारा है. गठबंधन को लेकर राहुल गांधी फैसला करेंगे.' हालांकि कथनी करनी से आसान है.

    राहुल गांधी वही करना चाहते हैं जो सोनिया ने 2004 में किया था और महागठबंधन में मुख्‍य भूमिका निभाना चाहते हैं. 2004 में विपक्ष बिखरा हुआ था और इतना ताकतवर नहीं था कि अपनी शर्तें मनवा सके. उस समय ममता बनर्जी को बंगाल की मुख्‍यमंत्री बनना था जबकि रामविलास पासवान व डीएमके अपने-अपने राज्‍यों में बड़े खिलाड़ी नहीं बने थे और सोनिया की कोशिशों पर खुशी से मान गए थे.

    दूसरी ओर, राहुल गांधी के लिए हालात कठिन है. सबसे पहले तो, ममता बनर्जी, एमके स्‍टालिन, मायावती और यहां तक कि अखिलेश यादव की महत्‍वाकांक्षाएं ऐसी हैं जो उन्‍हें कांग्रेस के सामने झुकने नहीं देगी. दूसरी बात, राहुल गांधी सोनिया नहीं है. सोनिया ने अपने भाषण में बीजेपी से लड़ने के लिए साथ आने की जरूरत बताई जो इस बात का इशारा है कि उन्‍हें साथियों को जोड़ने के लिए फिर से सक्रिय होना पड़ेगा.

    कांग्रेस मझधार में फंसी है. राजनीतिक और कड़वी हकीकत ने उसे अहसास करा दिया है कि पार्टी को एक गठबंधन बनाना होगा और इसके लिए उसने एक ग्रुप भी बनाया है. गठबंधन पर मुहर लगाने का काम राहुल गांधी का होगा. बावजूद इसके कांग्रेस को अपने कैडर को संदेश देना होगा कि वह उन्‍हें खुश करने से पीछे नहीं हटेगी. राजस्‍थान कांग्रेस के अध्‍यक्ष सचिन पायलट का कहना है, 'हमारे रणनीतिक गठबंधन होंगे लेकिन कांग्रेस को मुख्‍य भूमिका निभानी होगी.'

    कर्नाटक में सरकार बनाने और जेडीएस से ज्‍यादा सीटें पाने के बाद भी कांग्रेस ने खुद के लिए सीएम पद नहीं चाहा. इससे पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता नाराज और भ्रम में है कि यह वही राहुल गांधी है जो यह कहते हुए राजनीति में आए थे कि सत्‍ता जहर है और कांग्रेस की अस्मिता से समझौता नहीं करना चाहिए. आज राहुल अस्मिता के लिए ही लड़ रहे हैं जबकि यह भी मान रहे हैं कि 2019 में सत्‍ता में आने के लिए उन्‍हें बाकी पार्टियों का साथ चाहिए होगा.

    रविवार को सीडब्‍ल्‍यूसी की बैठक से दो बातें साफ हो गई: कांग्रेस को 2019 के लिए दोस्‍त चाहिए. वह अकेले बीजेपी से नहीं भिड़ सकती. और देश की सबसे बड़ी पार्टी को अपनी अस्मिता के लिए लड़ना होगा.

    Tags: Congress, General Election 2019, Rahul gandhi

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