Analysis: पश्चिम बंगाल में ममता से खफा वोटर्स लेफ्ट से भी नाउम्मीद, नई पसंद बनती दिख रही है भाजपा!

टीएमसी के 1998 में गठन के बाद से ही राज्य की राजनीति वामदल बनाम टीएमसी के इर्दगिर्द घूम रही है. भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी रणनीति पार्टी को राज्य में मजबूत तीसरे मोर्चे के तौर पर पेश करने की है.


Updated: April 16, 2019, 3:29 PM IST
Analysis: पश्चिम बंगाल में ममता से खफा वोटर्स लेफ्ट से भी नाउम्मीद, नई पसंद बनती दिख रही है भाजपा!
पुरुलिया में टीएमसी की रामनवमी रैली को देखते लोग.

Updated: April 16, 2019, 3:29 PM IST
अनिरुद्ध घोषाल
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में बलरामपुर के बुजुर्ग दीनबंधु महतो (62) खुद को वामपंथी विचारधारा से जुड़ा हुआ बताते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी के पक्ष में मतदान करने की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि इसका विचारधारा से कोई लेनादेना नहीं है. यह समय की जरूरत है. हमने जरूरत पड़ने पर वामदलों को सत्ता से बेदखल किया. अगर आगे जरूरत पड़ी तो बीजेपी के खिलाफ भी वोट डालेंगे. उनके मुताबिक, आज तृणमूल कांग्रेस वही बन चुकी है, जिससे मुक्ति दिलाने का उसने वादा किया था. वहीं, राज्य में वामदल अपने आखिरी दिन गिन रहा है.

बंगाल के पूर्वोत्तर में कूचबिहार से पुरुलिया तक राज्य की दक्षिण-पश्चिम सीमा है. इस क्षेत्र के लोग कुछ चीजों पर एकमत हैं, लेकिन पूरे इलाके में हर व्यक्ति 'बामेर शेष दिन' (वामदलों के आखिरी दिन) की चर्चा कर रहा है. अर्थशास्त्री प्रणब बर्धन ने 2011 में एक लेख में लिखा था कि मार्क्सवाद के नाम पर वामदल लोकल माफिया बन चुके हैं. ये मुश्किल हालात में गॉडफादर की तरह पेश आते हैं, लेकिन यही बाद में लोगों को लूटते हैं.

दीनबंधु महतो की तरह काफी लोगों का कहना है, 'ऐसा नहीं है कि ममता बनर्जी हालात बदलने की कोशिश नहीं कर रही हैं और सरकार गांवों के विकास के लिए पैसे नहीं भेज नहीं रही है, लेकिन इसका फायदा चंद लोगों को ही मिल रहा है. बड़ी बात यह है कि फायदा लेने वाले सभी लोग टीएमसी कार्यकर्ता हैं. प्रदेश भाजपा नेतृत्व का कहना है कि अगर यह सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण होता तो हम दांव नहीं लगाते. टीएमसी को 2014 में मिले कुल मतों में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं की तादाद बराबर थी. आज ममता बनर्जी अपने काडर पर नियंत्रण खो बैठी हैं.

ममता ने हासिल की माकपा से बड़ी जीत
2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज वामदलों को बेदखल किया था. इसके बाद ममता ने जमीनी स्तर पर टीएमसी को मजबूत करना शुरू किया. फिर पारंपरिक तौर पर वाम या कांग्रेस के वोटबैंक में पैठ बढ़ानी शुरू की. धीरे-धीरे राज्य में टीएमसी की मौजूदगी बढ़ती गई. टीएमसी ने 2016 में राज्य की 295 विधानसभा सीटों में 213 पर (72 फीसदी) शानदार जीत हासिल की. ऐसी जीत माकपा को 1987 में तब भी नहीं मिली थी, जब उसके पक्ष में 53 फीसदी वोट पड़े थे. तब माकपा 187 सीटों पर जीती थी. सहयोगी दलों के साथ माकपा को 294 में 250 सीटें हासिल हुई थींं.

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बहन को सरकारी योजना के तहत मिली साइकिल के साथ बच्चा. इस गांव के लोगों ने पंचायत चुनाव में बीजेपी के प्रत्याशी जिताया था.


वामदल 'सरकारी वाम' हो गए : अभिजीत मजूमदार 

कूचबिहार से झारग्राम तक के मतदाताओं का कहना है कि सत्ता के अपने दुष्परिणाम हैं. टीएमसी सत्ता में आने से पहले वामदलों के हर चीज पर नियंत्रण करने की आलोचना करती थी. उस दौरान टीएमसी का एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना था. नक्सलबाड़ी आंदोलन के नेता रहे चारू मजूमदार के बेटे और सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) में दार्जिलिंग के जिला सचिव अभिजीत मजूमदार का कहना है कि सामाजिक नियंत्रण-निगरानी के जरिये वाम 'सरकारी वाम' हो गया.

लड़की के बीजेपी समर्थक होने के कारण टीएमसी ने नहीं होने दी शादी

अलीपुरद्वार के रहने वाले शामिक सेन ने बताया कि कोलकाता में रहने के दौरान उन्हें एक लड़की से प्रेम हो गया. वह उससे शादी करना चाहते थे. अलीपुरद्वार के नजदीकी इलाकों में टीएमसी का दबदबा है, जबकि लड़की और उसके परिजन बीजेपी समर्थक थे. इसलिए टीएमसी ने हमारी शादी नहीं होने दी. टीएमसी ने सेन के आरोप काेे बेबुनियाद बताया, लेकिन शामिक का कहना है कि वह टीएमसी को वोट नहीं देंगे. झारग्राम की एक सीट आदिवासी बाहुल्य है. पहले इस सीट पर वाम चरमपंथियों का प्रभाव था. इसी क्षेत्र के केशियारी में स्कूल टीचर सोमला हंबराम ने बताया कि स्कूल में कुछ पद खाली थे, जिनका विज्ञापन दिया जाना था, लेकिन पार्टी ने अपने समर्थकों की भर्ती कर दी.

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पंचायत चुनाव में हिंसा को लेकर भी है लोगों में नाराजगी 

राज्य के पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को लेकर भी लोगों में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ खासी नाराजगी है. बीजेपी का आरोप है कि पंचायत चुनाव के दौरान 100 से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी गई. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान कश्मीर से भी ज्यादा हिंसा हुई थी. बसीरहाट के अनरुल बिस्वास के मुताबिक, उन्होंने टीएमसी काडर को बताया कि वह दीदी के समर्थक हैं. उन्होंने यह भी बताया कि वह सोशल मीडिया पर भी उनके पक्ष में लिखते हैं. इसके बाद भी टीएमसी काडर ने उनकी पिटाई की.

सम्मान और रुतबा आखिर कब तक रहेगा बरकरार
विधानसभा चुनाव 2016 से पहले ममता बनर्जी को लेकर राज्य के ज्यादातर हिस्सों के लोगों में सम्मान का भाव था. टीएमसी को भी इसका अहसास था. मार्च, 2016 की एक रैली में उन्हें मुक्तिदाता और जंगलमहलेर क्रांतिदाता (जंगलमहल की क्रांतिदाता) के तौर पर पेश किया गया. उस दौरान कूचबिहार में आखिरी चुनावी सभा के दौरान उन्हें फिर अग्नि कन्या के तौर पर पेश किया गया. उपाधियां बनी रहेंगी, लेकिन सवाल उठता है कि इतना सम्मान और रुतबा आखिर कब तक बना रहेगा?

फीकी पड़ी टीएमसी सरकार की योजनाओं की चमक
पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी की ओर से शुरू की गईं लड़कियों के लिए साइकिल से लेकर 2 रुपये प्रति किग्रा चावल जैसी कई योजनाएं फीकी पड़ चुकी हैं. वामदलों ने भी भूमि वितरण जैसी योजनाएं चलाई थीं, लेकिन बदले माहौल में उनका असर भी कम हो गया. वामदलों का कहना है, यह जरूरी नहीं कि आपको मिलने वाला सम्मान वोट में तब्दील होगा. हावड़ा के अभिषेक दासगुप्ता (24) का कहना है कि ममता बनर्जी से पहले सड़कें इतनी साफ नहीं थीं. यहां तक कि कई इलाकों में सड़कें ही नहीं थीं. ममता बनर्जी ने बहुत कुछ किया है, लेकिन आज मेरे पास नौकरी नहीं है. कुछ तो बदलने की जरूरत है. दासगुप्ता का कहना है कि वह दीदी के पक्के समर्थक हैं, लेकिन पार्टी काडर बेकाबू हो गया है. काडर जनकल्याण योजनाओं के वितरण पर कब्जा किए बैठा है. पूरे राज्य का यही हाल है.

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बीजेपी ने भर दी एमसी-वामदल टकराव से बनी खाली जगह
ऐसे माहौल में भाजपा 'अई तृणमूल आर ना' नारे के साथ चुनाव प्रचार कर रही है. पार्टी खुद को राज्य में तीसरे मोर्चे के तौर पर पेश कर रही है. प्रदेश भाजपा और चुनाव समिति के एक सदस्य का कहना है कि पार्टी 2016 से पहले ही राज्य में तीसरे दल के तौर पर पहचान बना चुकी थी. बनर्जी का पूरा ध्यान प्रमुख दोनों दलों पर था और टीएमसी वामदल को तबाह करना चाहती थी. दोनों दलों के टकराव से राज्य की सियासत में रिक्तता बनी. हमने उसी खाली जगह को भर दिया. हालांकि टीएमसी नेताओं का कहना है कि वाम-कांग्रेस गठबंधन नहीं होने से उनकी पार्टी के लिए शानदार मौका है. बनर्जी के करीबी सूत्र ने बताया कि दीदी को भरोसा है कि गठबंधन नहीं होने के कारण मुस्लिम मतदाता किसी दूसरी पार्टी पर अपना वोट बर्बाद नहीं करेंगे. मुसलमानों को पता है कि भाजपा को रोकने के लिए दीदी को ही वोट देना पड़ेगा.

क्या ममता की सोच सही?
क्या ममता बनर्जी की यह सोच सही है? क्या मुस्लिम मतदाताओं के लिए दीदी को वोट करने की यह पर्याप्त वजह है? भाजपा से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि पार्टी की राज्य इकाई के एक धड़े का विश्वास डगमगाना शुरू हो चुका है. उन्होंने कहा कि बंगाल में बाकी छह चरणों में होने वाले मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने को लेकर बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय की मांग बेवजह नहीं है. पहले चरण का मतदान परीक्षण था. कुचबिहार में हमें बढ़त मिल रही थी, लेकिन हमें जानकारी मिली कि आखिरी मिनटों में टीएमसी ने करीब 7000 बूथ पर बढ़त बना ली. हमारे पास टीएमसी की तरह जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की फौज नहीं है. कूचबिहार में हमें इसकी कमी खली. अगर यही पैटर्न आगे भी जारी रहा तो हमारे लिए अच्छा नहीं होगा.

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