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पश्चिम बंगाल: प्रवासी मतदाता निभा सकते हैं बड़ी भूमिका, TMC-BJP दोनों साधने में लगे

राजनीतिक ही नहीं आर्थिक विशेषज्ञ भी सरकार के इस सबसे तेज रोलबैक को विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर: PTI)

राजनीतिक ही नहीं आर्थिक विशेषज्ञ भी सरकार के इस सबसे तेज रोलबैक को विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर: PTI)

West Bengal Election 2021: 2011 जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 24.4 लाख आबादी दूसरे राज्यों से हैं. इनमें से ज्यादातर बिहार (Bihar), ओडिशा, झारखंड और यूपी से हैं. बंगाल में 11.4 लाख लोग बिहार, 4.6 लाख झारखंड, 2.4 लाख यूपी और 1.4 लाख ओडिशा से हैं.

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(माजिद आलम)


कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) तीसरे चरण में प्रवेश कर चुका है. राज्य में दोनों पार्टियों के बीच बंगाली और गैर बंगाली का खेल जारी है. हालांकि, इसी बीच राज्य का एक तबका ऐसा भी है, जिसे कोई भी राजनीतिक दल नाराज नहीं करना चाहता. ये हैं हिंदी भाषी प्रवासी समूह, जो पूरे राज्य में राजनीतिक दलों की नजरों में बने हुए हैं. कुछ जानकारों का मानना है कि हिंदुत्व के मुद्दे के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी बीजेपी (BJP) का साथ देंगे. वहीं, कुछ इन्हें टीएमसी का मददगार भी बता रहे हैं.

कोल बेल्ट और चाय बागानों में रोजगार के लिए कुछ हिंदी भाषी आबादी 50-100 साल पहले राज्य में पहुंची थी. इलाहबाद स्थित गोविंद बल्लभ पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर बद्री नारायण बताते हैं 'गैर बंगाली बंगाल में हिंदुत्व राजनीति के साथ जा सकते हैं. पूरे तौर पर नहीं, लेकिन बहुमत में वे बीजेपी का दो कारणों से समर्थन करेंगे. यहां हिंदुत्व चेतना का प्रभाव है और वे राज्य की भद्रलोक राजनीति के साथ तालमेल नहीं बना पा रहे हैं.' साथ ही उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले समूह बीजेपी की राजनीति से परिचित हैं.
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2011 जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 24.4 लाख आबादी दूसरे राज्यों से हैं. इनमें से ज्यादातर बिहार, ओडिशा, झारखंड और यूपी से हैं. बंगाल में 11.4 लाख लोग बिहार, 4.6 लाख झारखंड, 2.4 लाख यूपी और 1.4 लाख ओडिशा से हैं. ये आंकड़े 10 सालों में काफी तेजी से बढ़े हैं. कोलकाता की 44.9 लाख आबादी में से 8.3 लाख प्रवासी हैं. इनमें 50 फीसदी बिहार से हैं. इसके बाद यूपी, झारखंड और ओडिशा का नंबर है. खास बात है कि पार्टियां भी इन समूहों के आंकड़ों से परिचित हैं. इन्हें लुभाने के प्रयास कुछ समय पहले ही शुरू हो गए थे.

ममता भी खेलती रही हैं दांव
जनवरी में हिंदी भाषी समूहों को संबोधित करते हुए सीएम ममता बनर्जी ने कहा था, 'मैंने हमेशा उन लोगों को भाई के रूप में स्वीकार किया है, जो हिंदी, पंजाबी और दूसरी भाषा बोलते हैं. क्या आप में से किसी को भी बंगाल में कोई परेशानी हुई? मैंने कभी भी भाषा और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के बीच फर्क नहीं किया. हमारा समर्थन कीजिए और हम आपका हमेशा की तरह ध्यान रखेंगे.' बीते साल बिहार के लोगों के लिए ममता ने छठ पूजा पर दो राज्य अवकाश की घोषणा की थी.

इधर बीजेपी भी अपील के मामले में पीछे नहीं है. अपनी राष्ट्रीय राजनीति और पार्टी और आरएसएस के जमीनी कार्यों के दम पर वे वर्ग को लुभा रही है. बंगाल के एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि पूर्वी उपनगर विकास के वादे पूरे नहीं होने के चलते ममता से नाराज है. वे कहते हैं, 'ये समूह ठीक उसी कारण के लिए ममता के खिलाफ वोट कर सकते हैं, जैसे उन्होंने वाम सरकार के लिए किया था. इसके अलावा वे बीजेपी की राष्ट्रीय आकांक्षाओं से भी खुद को जोड़कर देख रहे हैं.'

अलग है बंगाल की राजनीति
सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज के असिस्टेंट प्रोफेसर मैदुल इस्लाम कहते हैं 'बंगाल में राजनीति ओडिशा की तरह है. हमने देखा है कि राजनेताओं को बार-बार सत्ता मिलती रहती है. यह नवीन पटनायक की तरह ही है, जिन्हें 5 कार्यकालों के लिए चुना गया. कड़े विरोध के बाद भी नीतीश कुमार चौथी बार सत्ता में आए.' इस्लाम कहते हैं कि बंगाल में राष्ट्रवादी अपील काम नहीं करेगी, क्योंकि यहां भरोसेमंद विकल्प नहीं है.

उन्होंने कहा, '2001 में वाम के खिलाफ भी खासी नाराजगी थी, लेकिन वे दो-तिहाई बहुमत के साथ वापस आए. इसी तरह 2016 में भी तृणमूल को लेकर मध्यम वर्ग के बीच भ्रष्टाचार और घोटालों के चलते बहुत नाराजगी थी, लेकिन विपक्षी गठबंधन 77 ही जीत सका.' हालांकि, कुछ अन्य जानकार कहते हैं कि हिंदी भाषी प्रवासी समूह यूपी और बिहार के उत्तरी राज्यों के हिंदू और मुस्लिम हैं. इस समुदाय की राजनीति और चिंताएं अलग हैं. कोलकाता की आलिया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर मोहम्मद रियाज कहते हैं 'अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो यह काफी हद तक बंगाली लोगों के कारण होगा. पार्टी मतुआ समुदाय, ओबीसी, पिछड़े समूह और मध्यम वर्गीय बंगालियों को लक्षित कर रही है.'

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