दिल्ली हिंसा की सियासत में निशाने पर रहे अमित शाह संसद में बहस के बाद कैसे खरे हो कर निकले

दिल्ली हिंसा की सियासत में निशाने पर रहे अमित शाह संसद में बहस के बाद कैसे खरे हो कर निकले
अमित शाह ने संसद में विपक्ष के सवालों का जवाब दिया.

लोकसभा में तो कांग्रेस के सदस्य गृहमंत्री के बयान के दौरान लगातार टोका टाकी करते नजर आए और सदन से वॉक आउट तक कर गए और अमित शाह समेत पूरी बीजेपी को हल्ला बोलने का मौका भी दे दिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 13, 2020, 5:23 PM IST
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दिल्ली दंगों पर छिड़ी बहस में लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी अमित शाह का सिक्का एक बार फिर चल गया. परत दर परत जब गृहमंत्री अमित शाह ने दंगों के राज से परदा हटाना शुरु किया तो पूरा का पूरा विपक्ष भी ध्यान नहीं हटा पाया. लोकसभा में तो कांग्रेस के सदस्य गृहमंत्री के बयान के दौरान लगातार टोका टाकी करते नजर आए और सदन से वॉक आउट तक कर गए और अमित शाह समेत पूरी बीजेपी को हल्ला बोलने का मौका भी दे दिया. लेकिन राज्य सभा में स्थिति बिल्कुल पलट थी. एक के बाद एक कांग्रेस ने अपने दिग्गजों को मैदान में उतारा जिन्‍होंने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कभी वाजपेयी के राजधर्म निभाने की बात की तो कभी अमित शाह को सरदार पटेल के सपनों को पूरा करने का ताना भी मारा.

लेकिन एक बात तो साफ थी की अमित शाह पूरे संयत थे. लगभग घंटे भर के भाषण के दौरान विपक्षी सांसद भले ही टोका टाकी करते रहे हों लेकिन उन्होने अपना आपा नहीं खोया. लगातार मुस्कुराते रहे और अपनी पार्टी के सांसदों को भी खामोश रहने का इशारा करते है. खास बात ये कि जब भी विपक्ष के दिग्गज नेता उनके बयान के बीच बोलने के लिए उठ खड़े हुए तो अमित शाह तुरंत अपनी सीट पर बैठ जा रहे थे ताकि विपक्षी नेता अपना बयान दे दें. लोकसभा में भी उन्होने दंगों में मारे गए लोगों को भारतीय बता कर और साथ ही सभी पीडितों को न्याय दिलाने की बात कर विपक्ष की जुबान पर ताला लगा चुके थे. लेकिन राज्यसभा में तो उनका एक-एक बयान और उन बयानों के बीच विपक्ष के दिग्गजों को लपेटे में लेना ये जता गया कि उनकी बातों की बाजीगरी में भी वो माहिर राजनीतिक खिलाड़ी हो गए हैं. आसान नहीं होता गुलाम नबी आजाद और कपिल सिबल जैसे नेताओं को लपेटे मे लेना.

सबसे पहले उन्‍होंने कपिल सिबल के बयानों पर उनको घेरा. जब गृहमंत्री कह रहे थे कि सीएए से किसी भी भारतीय नागरिक का नुकसान नहीं होगा. सिबल जो सीएए को लेकर सरकार पर निशाना साध रहे थे, वो बातों में ऐसे घिरे कि अपनी रौ में कह गए कि किसने कहा है कि सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून में किसी के साथ अन्याय होगा. अब तक इसके खिलाफ मोर्चा खोले सिबल के ऐसा बोलते ही अमित शाह की मुस्कुराहट नहीं दबी. जब सिबल और गुलाम नबी आजाद ने सीएए को एनपीआर से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि एनपीआर में डाउटफुल सीटीजन यानी संदेहास्पद शब्द जोड़ने का बात की तो अमित शाह ने ताल ठोक कर ऐलान किया कि किसी भी जगह डी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. अमित शाह की जुबानी ये बात सुनकर गुलाम नबी आजाद एक बार फिर खड़े हो गए और पुछा कि क्या ये पक्का है. तुरंत गृहमंत्री का जबाव आया बिल्‍कुल पक्का है. और फिर आजाद साहब संतुष्ट होकर अपनी सीट पर मुस्कुराते नजर आए.



गुलाम नबी आजाद यहीं नहीं रुके. सीएए, एनआरसी जैसे कानूनों को लेकर बार बार सवाल उठाते रहे तो अमित शाह ने उन्‍हें मिलने का आमंत्रण तक दे डाला. अमित शाह ने आजाद साहब को कहा कि आप मुझसे मिलने आइए और उन लोगों को भी लेकर आईए जिन्हें इन विषयों पर संदेह है. मैं सबसे मिल कर उनकी शंकाओं को दूर करुंगा. उनके इस आश्वासन के बाद आजाद अपनी सीट पर मुस्कुराते हुए सर हिलाते नजर आए मानो ये बात उन्हे भा गई हो.
इसलिए दो दिनों की संसद की इस बहस ने चंद काम तो अच्छे कर दिए. पूरे भाषण में ऐसा कहीं नजर नहीं आया कि गृहमंत्री के बयान से सांप्रदायिकता झलक रही हो. एक तो संयम से पूरी बहस सुनने और बोलने वाले अमित शाह प्रखर वक्ता के रुप में उभरे और दूसरे विपक्षी दलों ने भी उनके इस्तीफे की मांग भूल कर उनकी वाकपटुता का भी लोहा माना. संसद में ऐसी संयमित नोकझोंक अरसे बाद दिखाई दी जो शायद आने वाले दिनों में सत्ता और विपक्ष की दूरियां कम करने का काम कर सकती है.
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