2019 की तैयारी? अमरावती को सिंगापुर बनाना चाहते हैं चंद्रबाबू नायडू

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट का खर्च 45,000 करोड़ रुपये है. APCRDA के अनुसार, प्रोजेक्ट का आंकड़ा 1 साथ करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.


Updated: April 17, 2018, 12:58 PM IST
2019 की तैयारी? अमरावती को सिंगापुर बनाना चाहते हैं चंद्रबाबू नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू (फाइल फोटो)

Updated: April 17, 2018, 12:58 PM IST
ऐश्वर्या कुमार

मौर्य, पल्लव, सातवाहन और विजयनगर के अलावा कई साम्राज्य आंध्र प्रदेश के प्राचीन शहर अमरावती पर अपना दावा जता चुके हैं. फिलहाल, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इस शहर को पुनर्जीवित करना चाहते हैं. 'अविनाशियों के स्थान' यानी अमरावती के पुनर्निर्माण की चाहत रखने वाले नायडू का दावा है कि वे इसे सिंगापुर बना देंगे. बता दें कि अपनी प्लानिंग और हाईटेक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सिंगापुर दुनियाभर में मशहूर है.

आंध्र के मुख्यमंत्री नायडू ने पिछले महीने ही बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया है. वे आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने से नाराज हैं. उनका आरोप है कि केंद्र सरकार आंध्र प्रदेश को लेकर गंभीर नहीं है और वे संसद में किए अपने वादों पर कायम नहीं रहे.

बजट सत्र के दौरान गठबंधन तोड़ने के तुरंत बाद नायडू ने बीजेपी से पूछा था, "मैंने साइबराबाद बनाया है, आपने क्या बनाया?"

क्या है उनका महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट?
नायडू अमरावती को भारत का सिंगापुर बनाना चाहते हैं. 217 वर्ग किलोमीटर में फैले अमरावती को कृष्णा नदी के साथ-साथ विजयवाडा तक डेवलप किया जा रहा है. 2050 तक यहां की आबादी 3.5 मिलियन होने की संभावना है.

मुख्यमंत्री अक्सर 'लैंड पूलिंग सिस्टम' का भी जिक्र करते हैं, जो किसानों से जमीन अधिग्रहण करने के लिए चंद्रबाबू सरकार का अपना मॉडल है. बता दें कि अमरावती ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसमें सरकार किसानों से जमीन लेकर उन्हें विकसित जमीन का 30% तक वापस कर देती है. सरकार का दावा है कि किसान स्वेच्छा से अब तक 35,000 एकड़ जमीन दे चुके हैं.
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सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट का खर्च 45,000 करोड़ रुपये है. APCRDA के अनुसार, प्रोजेक्ट का आंकड़ा 1 साथ करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. तो इतने खर्च से अमरावती में क्या बदलाव होगा? नायडू का वादा का वादा है कि अमरावती में राज्य की प्राचीन कला और आर्किटेक्चर की झलक मिलेगी.

APCRDA के कमिश्नर डॉक्टर श्रीधर चेरुकुरी के मुताबिक, अमरावती का डिजाइन कई मशहूर शहरों से प्रेरित है. एम्स्टर्डम की तर्ज पर अमरावती के सभी बड़ी सड़कों के साथ-साथ नहरें भी होगी, जिसका इस्तेमाल वॉटर ट्रांसपोर्ट के लिए होगा. इस ग्रीन-ब्लू शहर का 50 फीसदी हिस्से में हरियाली और 10-15% हिस्से में पानी होगा. यहां न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क की तरह घनी हरियाली भी होगी. रियल टाइम गवर्नेंस के लिए सभी नागरिकों की बायोमीट्रिक डिटेल भी ली जाएगी.

श्रीधर ने बताया, "इस शहर में नौ थीम आधारित क्षेत्र होंगे, जिसमें नॉलेज, टूरिज्म, स्पोर्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, हेल्थ, फाइनेंस, मीडिया और गवर्मेंट शामिल हैं. राज्य अधिकारियों के अनुसार, हालांकि देश के कुछ शहरों में ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर देखने को मिल सकता है, लेकिन अमरावती में सबकुछ एक साथ होगा.

क्या है जमीनी हकीकत?
यह प्रोजेक्ट फिलहाल पहले चरण में है, जिसमें सरकारी इमारतें और अधिकारियों के घर बनाए जा रहे हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, फेज 1 का खर्च 43,000 करोड़ रुपये आएगा, जिसमें से 3,000 करोड़ खर्च हो चुके हैं. फेज 1 का 53% काम पूरा हो चुका है.

अमरावती के फेज 1 एरिया के दौरे में आपको कंस्ट्रक्शन नज़र आएगा. सरकारी कर्मचारियों के 3,840 अपार्टमेंट्स और मंत्रियों, ब्यूरोक्रेट्स व उच्च न्याय अधिकारियों के 186 बंगले भी बनाए जा रहे हैं.

इसके अलावा रियल टाइम गवर्नेंस सेंटर भी बनाया जा रहा है. बड़ी इमारतों में फेस रिकग्निशन (चेहरा पहचानने वाली प्रणाली) सिस्टम, सेंसर कंट्रोल्ड स्ट्रीट लाइट्स और 24*7 हेल्पलाइन भी डेवलप की जाएगी.

सरकार की योजना पर उठ रहे हैं सवाल
वहीं दूसरी तरफ, सरकार की जमीन अधिग्रहण स्कीम को लेकर सवाल उठ रहे हैं. कई किसानों का कहना है कि अमरावती के लिए ली गई जमीन के बदले उन्हें LPS मॉडल के तहत रकम दी गई. अनुमोली गांधी नाम के एक एक्टिविस्ट ने इस मामले में सरकार को कोर्ट में खींचा है. गांधी के पास लिंग्यापलेम में 82 एकड़ जमीन है.

गांधी के मुताबिक, उनकी जमीन की कीमत 4.25 करोड़ है. लेकिन सरकार ने इस जमीन की कीमत सिर्फ 10 लाख रुपये घोषित की है. उन्होंने बताया, "किसान कन्फ्यूज हैं. सरकार केवल उम्मीदों का माहौल बना रही है."

उनकी शिकायत को एक अन्य किसान कुदासराओ का समर्थन मिला है, जिन्होंने 'लैंड पूल' योजना में अपनी जमीन नहीं दी. उन्होंने बताया, "मैंने अपनी एक एकड़ जमीन सरकार को नहीं दी, क्योंकि मुझे सालभर इससे कमाई होती है."

न सिर्फ किसान, बल्कि पूर्व चीफ सेक्रेटरी आईवाईआर कृष्णा राव भी अपनी किताब 'हूज कैपिटल, अमरावती?' में इस प्रोजेक्ट के लिए नायडू सरकार की आलोचना कर चुके है. वाईएसआर कांग्रेस चीफ जगन मोहन रेड्डी ने इस स्कीम को 'लैंड फूलिंग' बताया है. इससे पहले उन्होंने कहा था कि सरकार ने किसानों की जमीन के टुकड़े लेकर कॉर्पोरेट्स को कम कीमतों में दे दिए.

हालांकि, अमरावती को नायडू का ट्रंप कार्ड माना जा रहा है. उनके मुताबिक, 2018 तक इस शहर का बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा हो जाएगा.
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