अमृतसर ट्रेन हादसा: मुआवज़ा, सरकारी नौकरी और तस्वीरों में तब्दील कुछ ज़िंदगियां

ये सिर्फ इस एक घर की कहानी नहीं है, मुआवजे के बंटवारे और सरकारी नौकरी को लेकर कई घरों में अभी से तनाव शुरू हो गया है.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: November 8, 2018, 11:42 AM IST
अमृतसर ट्रेन हादसा: मुआवज़ा, सरकारी नौकरी और तस्वीरों में तब्दील कुछ ज़िंदगियां
ये सिर्फ इस एक घर की कहानी नहीं है, मुआवजे के बंटवारे और सरकारी नौकरी को लेकर कई घरों में अभी से तनाव शुरू हो गया है.
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: November 8, 2018, 11:42 AM IST
दशहरे की रात अमृतसर में हुए रेल हादसे में 19 साल के मनीष की मौके पर ही मौत हो गई थी. मौके से उसका सिर्फ सिर मिला था, जिसके जरिए शिनाख्त की जा सकी, बाद में शायद बाकी शरीर भी मिल गया. मनीष की मां, छोटा भाई और पिता तीनों के फोन में उस कटे सर की तस्वीर मौजूद है. मनीष की मां भावहीन चेहरे से वही फोटो हर किसी आने-जाने वाले को दिखाती है, मुझे दिखाने के दौरान भी उदास आंखों से उस तस्वीर को देखती रहती है फिर कुछ संभलकर छोटे बेटे की तरफ इशारा कर कहती है कि बड़ा तो चला गया, हो सके तो इसे सरकारी नौकरी दिलवा दीजिए. हादसे में संतोष की बेटी रजनी और 8 महीने की नातिन नभनूर भी मारे गए थे. संतोष कैमरा ऑन होते ही लगातार रोती रहती हैं वैसे ही जैसे कविता भी बात करते हुए लगातार रोती हैं, क्योंकि उनका 17 साल का इकलौता बेटा दीपक अब सिर्फ तस्वीर बनकर घर के कमरे में टंगा रह गया है.

अमृतसर के मुकमपुरा, सुंदर नगर और जोड़ा फाटक की गलियां-मोहल्लों में सबकुछ सामान्य ही नज़र आता है. दुर्घटनाओं के बाद नज़र आने वाली बेचैनियां अब नहीं बची हैं, लेकिन लोकल अखबारों में रोज़ छपता है कि किसे मुआवजा मिल गया और किसे सरकारी नौकरी या फिर किस पार्टी का कौन सा नेता ये सब देने-दिलाने के वादे कर रहा है. इस दुर्घटना में मारे गए लोगों को प्रति मौत 5 लाख रुपए का चेक मिल गया है, जो कुछ दिनों में कैश भी हो जाएगा.



दर्शना के पति हादसे में मारे गए थे
दर्शना के पति हादसे में मारे गए थे


घायलों में से कुछ को 50 हज़ार रुपए का चेक मिला है और कुछ लोग अब भी अपने घावों को खोलकर दिखा रहे हैं जिससे साबित हो सके कि ये चोट भी उसी ट्रेन की दी हुई है. एक जांच चल रही है, जिसमें सभी पक्ष अपने बेक़सूर होने की बात कह रहे हैं. उधर मारे गए लोगों के परिवारों में अभी से मुआवजे और सरकारी नौकरी को लेकर झगड़े शुरू हो गए हैं.

पहला भाग: 'अब भी चीखें सुनाई देती हैं लेकिन कमाना-खाना तो पड़ेगा न'

जोड़ा फाटक के टिंकू प्रधान को इलाके में कोई भी गंभीरता से नहीं लेता, क्योंकि उसकी बातें इस तरह की होती भी हैं. जब मनीष की मां अपने बेटे के कटे हुए सिर की फोटो मुझे दिखा रही होती है तो वो मुस्कुराता रहता है, मैं जब उससे इसकी वजह पूछता हूं तो वो कहता है कि किसी मां का अपने फोन में बेटे की ऐसी फोटो लेकर घूमना सामान्य हो रहा है ये अजीब है, मेरा मुस्कुराना नहीं. फिर बुदबुदाता है, मौत के दुख से बड़ा सच है मुआवजा और सरकारी नौकरी. ये सच भी है क्योंकि पीड़ित परिवारों ने मुआवजे को ही न्याय के बतौर स्वीकार कर लिया है और नौकरी ने उनके बचे हुए दुख को भी सरकारी एहसान के तले दबाने का काम किया है. अब वो इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था को नहीं ढूंढ रहे हैं, 'जो होना था हो गया' कहकर ये खोज अब नौकरी देने का वादा करने वाले के दरवाजे की तरफ मुड़ गई है.

हादसे में मारे गए मनीष का परिवार
हादसे में मारे गए मनीष का परिवार

Loading...

मौत की कहानियां, उनके किरदार और बचे हुए लोग
जोड़ा फाटक के पास रहने वाले लोग इस बात की तस्दीक करते हैं कि उस रात रेलवे लाइन पर हजारों लोगों की भीड़ मौजूद थी. उस रात की कहानियां सुनाते हुए बिल्ले दा चौक के पास रहने वाला एक आदमी खुद को 'बचा हुआ' कहकर संबोधित करता है. मुकमपुरा, सुंदर नगर और जोड़ा फाटक के लोग ट्रेन हादसे के संदर्भ में खुद को अब इस नई पहचान और कहानियों के साथ सहज कर चुके हैं, जिनमें उनके आस-पास से कुछ लोग नहीं रहे और वो किसी तरह बचे रह गए हैं. ये रेलवे ट्रैक उनके घरों के इतना पास है कि शायद उनकी हर अच्छी-बुरी याद में शामिल रहा था और अब उनके जिंदा बच जाने की याद का भी हिस्सा बन गया है.

कविता का इकलौता बेटा दीपक भी हादसे में मारा गया
कविता का इकलौता बेटा दीपक भी हादसे में मारा गया


जोड़ा फाटक के पास दो कमरे के बिना प्लास्टर वाले घर में रहने वाली दर्शना के पति की इस हादसे में मौत हो गई है. दर्शना के पति दिहाड़ी मजदूर थे, और अब उन पर दसवीं क्लास में पढ़ रही एक जवान बेटी की जिम्मेदारी बची है जो कैसे निभेगी अब यही उनके लिए सबसे बड़ा सवाल है. दर्शना पूछती हैं कि मुआवजे का चेक तो मिल गया है लेकिन मेरी और बेटी की जिंदगी एक चेक के सहारे कट जाएगी क्या ? जो चला गया वो क्या इससे वापस आ जाएगा, मेरी जिंदगी में जो जगह खाली हुई है उसे कौन भरेगा ? हादसे में संतोष की बेटी और नातिन की मौके पर ही मौत हो गई, एक पांच साल की नातिन बची है जो बार-बार मां के बारे में नानी से सवाल पूछती रहती है, दरवाजे पर बैठी रहती है. संतोष रोते हुए सवाल करती है- क्या इस बच्ची को चेक दे दूं मैं या फिर सरकारी नौकरी?

संतोष की बेटी और नातिन हादसे में मारे गए
संतोष की बेटी और नातिन हादसे में मारे गए


घर खाली कर गए, झगड़े दे गए...
अमृतसर ट्रेन हादसे के बाद जोड़ा फाटक की रामलीला में रावण का किरदार निभाने वाले दलबीर सिंह का नाम ख़ूब चर्चा में आया था. ऐसा बताया जाता है कि मरने से पहले दलबीर ने कई लोगों की जान बचाई थी. दलबीर और उसका भाई पतंग बनाकर बेचने का काम करते थे. उसके पीछे घर में बूढ़ी मां, पत्नी और आठ महीने की एक बच्ची रह गई है. जब मैं उसके घर पहुंचता हूं तो दलबीर की मां और पत्नी सरकारी नौकरी के लिए किसी नेता से मिलने गई हुई होती हैं, हालांकि अब भी पूरे घर में दलबीर की बनाई पतंगे बिखरी हुई हैं. उनके घर के आस-पास लोगों से पूछने पर पता चलता है कि मुआवजे का चेक बीवी को मिल गया है और शायद सरकारी नौकरी भी उसे ही मिलेगी.

रामलीला में रावण बनने वाले दलबीर का घर
रामलीला में रावण बनने वाले दलबीर का घर


पड़ोसी बताते हैं कि दलबीर की मां अभी से ऐसी शंकाओं से घिर गई हैं कि उसकी पत्नी अभी जवान है शायद दोबारा शादी भी कर ले. मुआवजा उसे मिल ही गया है नौकरी भी मिल गई तो बेटे के जाने के बदले उनके हिस्से तो शायद कुछ भी नहीं आएगा. कुछ दिनों से घर में झगड़ा भी हो रहा हो रहा है कि नौकरी दलबीर के भाई को लेने दी जाए. दलबीर की बहन भी बातों-बातों में उदासी से कहती हैं कि एक तो घर खाली कर दिया और बदले में ये झगड़े भी दे दिए.

दूसरा भाग: 'अमृतसर रेल हादसा' या 'गलतियों का सिलसिला' जिसमें सब हिस्सेदार थे..

ये सिर्फ इस एक घर की कहानी नहीं है, मुआवजे के बंटवारे और सरकारी नौकरी को लेकर कई घरों में अभी से तनाव शुरू हो गया है. अनिल कुमार के सबसे छोटे भाई सुरेश कुमार की भी इसी हादसे में मौत हो गई थी. तीन भाइयों में सबसे छोटा सुरेश अविवाहित था और उसकी मौत का मुआवजा सहमति से दोनों भाइयों ने आपस में बांट लिया है लेकिन बात सरकारी नौकरी पर अटक गई है.

अनिल कुमार के भाई सुरेश भी हादसे में मारे गए
अनिल कुमार के भाई सुरेश भी हादसे में मारे गए


अच्छा है 'भय्या लोग' चले गए
हरभजन सिंह बिल्ले वाला चौक के पास रहते हैं उनके ठीक बगल के मकान में बिहार से आए कुछ मजदूर किराए पर रह रहे थे. अमृतसर ट्रेन हादसे में उनके भी दो साथियों की मौत हो गई थी जिसके बाद बाकी लोग भी शायद घर लौट गए हैं. इस हादसे में यूपी-बिहार के जिन लोगों की मौत हुई है सभी दिहाड़ी मजदूर हैं और ज्यादातर सभी के परिवार अब मुआवजे के चेक लेकर वापस लौट गए हैं. ये लोग जहां भी रहते थे उन घरों पर अब ताले लटके हैं. स्थानीय लोगों से पूछने पर उन्हें बस इतना पता है कि यहां 'भय्या लोग' रहते थे, जो अब नहीं रहते.

हरभजन सिंह
हरभजन सिंह


हरभजन सिंह भी बताते हैं कि इस इलाके में तो ढेर सारे 'भय्या लोग' रहते हैं. हादसे के बारे में बात करते हुए वो थोड़ा गुस्से में आ जाते हैं, उनके मुताबिक हादसा 'भय्या लोगों' के चलते ही हुआ था. इसके सबूत के तौर पर उनके पास एक फ़ॉर्मूला भी है. उनका मानना है कि ये रावण दहन का प्रोग्राम 20 सालों से हो रहा था लेकिन अभी कोई हादसा नहीं हुआ, पहले 'अपने' ही लोग रहते थे तो धोबी घाट का ग्राउंड काफी होता था. 'भय्या लोग' आए तो आबादी बढ़ गई और भीड़ के चलते ट्रैक पर भी लोग खड़े होने लगे. हरभजन गुस्से में कहते हैं इनसे पहले ही सब ठीक था, ये गंदगी और क्राइम भी फैलाते हैं और अब इन्हीं के चक्कर में कितने अपने भी मारे गए हैं.

जांच के नतीजों का इंतज़ार किसे है ?
अमृतसर मामले में भी मजिस्ट्रेट और रेलवे दोनों की ही जांच कर रही है लेकिन शायद ही पीड़ित परिवारों में से किसी को इसके नतीजों से अब कोई फर्क पड़ता नज़र आता हो. अनिल कुमार भी बातचीत में यही दोहराते हैं कि अभी तो मामला इसी में अटका हुआ है कि गलती रेलवे, आयोजक या पुलिस में से किसकी थी. फिर अगर मजिस्ट्रेटी जांच में किसी को दोषी ठहराया भी गया तो अदालत में केस चलेगा, जिसका फैसला जाने कब आएगा. हम गरीब लोग हैं रोज़ कमाना-खाना होता है, घर का एक सदस्य पहले ही कम हो गया अब हम भी इन चक्करों में घर बैठ जाएं.

रेखा देवी
रेखा देवी


रेखा देवी और उनके पति बिहार के मोतिहारी के रहने वाले हैं और अमृतसर में मजदूरी करते हैं. रेखा का दावा है कि हादसे में उनके सर में भी चोट लगी थी, हालांकि मुआवजा नहीं मिला क्योंकि अभी तक वो साबित नहीं कर पाई कि ये चोट उसी हादसे ने दी है. रेखा कहती हैं डॉक्टर से सर्टिफिकेट चाहिए, वो उसके लिए पैसे मांगता है. दो दिन काम छोड़कर कोशिश की थी कि सर्टिफिकेट बन जाए लेकिन न तो हमारे पास उतना पैसा है और न ही हम रोज़-रोज़ काम छोड़ सकते हैं, अब हमें मुआवजा नहीं चाहिए. इलाके में एक ऐसी आम राय स्थापित होती जा रही है कि इस दुर्घटना में गयी लोगों की जान के बदले न्याय यही है कि कुछ पैसे मिल जाएं या फिर घर का कोई आदमी सरकारी नौकरी करने लगे.

रवि के घर में तीन मौतें हुई
रवि के घर में तीन मौतें हुई


जोड़ा फाटक, मुकमपुरा और सुंदरनगर जानते हैं कि रंजीत एवेन्यू के लिए न्याय का मतलब कुछ अलग हो सकता है, उनके लिए ये अभी तक किसी ट्रेन की चपेट में आए बिना रोज़ जिंदा बचकर शाम को घर लौट आना ही है. लोकल मीडिया, पुलिस, प्रशासन और इलाके के नेता सभी इस बात पर सहमत नज़र आते हैं कि इस हादसे की गलतियों पर कम से कम बात हो और इलाके के लोगों का जिंदा बचे रहने का ये चक्र मुआवजे और नौकरियों की मदद से फिर ट्रैक पर आ जाए. टिंकू प्रधान भी इससे सहमत है कि 'याद रह जाना' एक बने बनाए सिस्टम को तबाह करता है, ये दुनिया अपनी 'भूल जाने' की आदतों के चलते ही बची हुई है.
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...

News18 चुनाव टूलबार

  • 30
  • 24
  • 60
  • 60
चुनाव टूलबार