'अमृतसर रेल हादसा' या 'गलतियों का सिलसिला' जिसमें सब हिस्सेदार थे..

अब जब इस घटना को करीब 15 दिन गुजर गए हैं इस हादसे की जिम्मेदारी तय करने के लिए जालंधर से लाए गए आधिकारी बी पुरुषार्थ की अध्यक्षता में मजिस्ट्रेटी जांच चल रही है.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: November 6, 2018, 10:56 AM IST
'अमृतसर रेल हादसा' या 'गलतियों का सिलसिला' जिसमें सब हिस्सेदार थे..
इस हादसे में 62 लोगों की मौत हो गई थी.
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: November 6, 2018, 10:56 AM IST
रवि एक फैक्ट्री में मजदूरी का काम करता है और उसे अब भी रोज़ उस जगह से गुजर कर काम पर जाना होता है जहां उस रात उसकी मां, बहन और 7 महीने की प्रेग्नेंट बीवी को ट्रेन ने कुचल दिया था. विजय के 19 साल के बेटे का सिर्फ सिर मिला था जिससे उसकी पहचान की जा सकी थी. 5 साल की हरप्रीत अपनी नानी से बार-बार अपनी मां के वापस आने को लेकर सवाल करती है, अक्सर दरवाजे पर ही बैठी रहती है. रेलवे ने खुद को और ड्राइवर को भी क्लीन चिट दे दी है, हाईकोर्ट ने चीफ गेस्ट नवजोत कौर सिद्धू को. सरकार ने मजिस्ट्रेटी जांच बिठा दी है जहां नवजोत सिंह सिद्धू को भी क्लीन चिट मिल गई है. आयोजक का दावा है उसने पुलिस से एनओसी ली थी, हालांकि वो अभी हिरासत में है. फिलहाल मुआवजा-सरकारी नौकरी के शोर से पीड़ित परिवारों के घाव भरने की कोशिश लगातार जारी है...

अब जब इस घटना को करीब 15 दिन गुजर गए हैं इस हादसे की जिम्मेदारी तय करने के लिए जालंधर से लाए गए आधिकारी बी पुरुषार्थ की अध्यक्षता में मजिस्ट्रेटी जांच चल रही है. News18 Hindi से फोन पर हुई बातचीत में बी पुरुषार्थ जांच से जुड़ी जानकारी साझा करने से इनकार करते हैं लेकिन इस बात का लगातार भरोसा देते हैं कि जो भी दोषी होगा उसकी जम्मेदारी तय की जाएगी. बता दें कि पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने जालंधर के संभागीय आयुक्त बी पुरूषार्थ की अगुवाई में इस मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया है जो चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंप देंगे.



बहरहाल इस हादसे को ध्यान से देखने पर ये किसी एक की जगह सामूहिक गलती नज़र आती है. लोग जब पटरी पर मौजूद थे कानून का उल्लंघन कर रहे थे, रेलवे ने न मेल देखा और न ही कोई सावधानी बरती, पुलिस ने त्यौहार और रावण दहन कार्यक्रम की जानकारी होने बावजूद सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए और आयोजकों ने एक कदम आगे बढ़ते हुए रेलवे ट्रैक की तरफ मौजूद दीवार पर ही एलसीडी स्क्रीन लगाकर रही सही कसर पूरी कर दी.

ट्रेजेडी ऑफ़ एरर्स...



  1. रेलवे, ड्राइवर और पुलिस ?
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    19 अक्टूबर की रात अमृतसर के जोड़ा फाटक के पास हुए हादसे में 62 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे. स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब दो दशक से हर साल रावण यहीं जलता है, रेलवे ट्रेन धीमी चलाता है, पुलिस भी मदद करती है जिससे कभी कोई हादसा नहीं हुआ. चश्मदीद सन्नी बताते हैं कि उस दिन भी हादसे से ठीक पहले दो और ट्रेनें गुजरीं थीं, वो ट्रेनें धीमी थीं, हॉर्न दिया गया और लोग हट गए थे. मौत वाली ट्रेन तब आई जब रावण जलाया गया, पटाखों का शोर था, हॉर्न बजाया भी होगा तो उसे सुनना नामुमकिन था. रेलवे ने शुरुआत में कहा कि ट्रैक के उस हिस्से पर घुमावदार मोड़ है ड्राइवर को दिखा नहीं होगा, फिर कहा कोई सूचना नहीं मिली थी और बाद में कहा कि लोग कानून का उल्लंघन कर ट्रैक पर खड़े थे.


जीआरपी की जांच में यह बात सामने आई है कि 18 और 19 अक्टूबर की मध्यरात्रि 12:53 बजे पुलिस कमिश्नरेट ऑफिस ने रेलवे पुलिस (जीआरपी) समेत इलाके के सभी थानों को दशहरे के मद्देनजर सुरक्षा प्रबंध पुख्ता करने के लिए ईमेल भेजी थी. एक सिक्योरिटी ब्रांच से भेजे गए इस मेल में हर उस जगह का नाम दिया गया है, जहां पर सुरक्षा में पुलिस को तैनात रहना था. इस मेल में जोड़ा फाटक के पास मौजूद धोबी घाट का जिक्र भी है. हालांकि जीआरपी का कहना है कि सिर्फ एक मेल के जरिए इलाके की पुलिस अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती.



रेलवे से रिटायर्ड ड्राइवर 78 वर्षीय दयाचंद बताते हैं कि ऐसे मौकों पर जब रेलवे ट्रैक के आसपास कोई आयोजन होना हो या किसी वजह से भीड़ इकट्ठी होने वाली हो पूर्व सूचना मिलने पर ड्राइवर्स के लिए एक कॉशन ऑर्डर जारी कर दिया जाता है. इस ऑर्डर का मतलब ये ही होता है कि इन इलाकों में संभल कर ट्रेन चलानी है या फिर ट्रेन की स्पीड कम कर लेनी है. इस मामले में जीआरपी को सूचना देने के लिए एक मेल किया गया था जिस पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके चलते कोई कॉशन ऑर्डर नहीं जारी हो पाया. उधर इलाके के थानों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया जिसकी वजह से कार्यक्रम में भीड़ के मुताबिक पुलिस बल तैनात नहीं किया जा सका.

ट्रेन चला रहा ड्राइवर जिसका नाम अरविंद कुमार बताया जाता है, मजिस्ट्रेट जांच के दौरान दर्ज कराए गए अपने बयान में कहा है कि उसके पास इस तरह के आयोजन की कोई जानकारी नहीं थी. वह जालंधर से चला था. मानावाला से निकला और अचानक ट्रैक पर लोग दिखे. भीड़ दिखी तो उसने ब्रेक लगाया, लेकिन गाड़ी की स्पीड कंट्रोल करते-करते लोगों से टक्कर हो गई. वो गाड़ी रोकना चाहता था लेकिन फाटक पर मौजूद गार्ड ने उसे बताया कि पब्लिक ने हमला करना शुरू कर दिया है. इसे देखते हुए उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी. पुलिस भी इस बात की तस्दीक करती है कि हादसे के बाद लोगों की भीड़ ने फाटक पर मौजूद रेलवे गार्ड की बुरी तरह पिटाई की थी. सुरक्षा के मद्देनज़र रेलवे ट्रैक के इस हिस्से की सुरक्षा के लिए अब भी आरपीएफ तैनात है.

2. आयोजक
रावण दहन कार्यक्रम के आयोजक सौरभ मिट्ठू मदान 30 अक्टूबर परिवार समेत मजिस्ट्रेट जांच में शामिल हुए थे और जांच अधिकारी बी पुरुषार्थ ने उनसे बंद कमरे में करीब तीन घंटे तक पूछताछ भी की. सौरभ और उनका परिवार इस घटना के बाद से ही अमृतसर से बाहर रह रहा है, इसकी वजह भी है क्योंकि हादसे के अगले ही दिन भीड़ ने उनके घर पर पथराव कर दिया था. घटना के एक दिन बाद ही सौरभ और दशहरा समिति जोड़ा फाटक ने एक पत्र जारी कर अपना पक्ष रखा था. आयोजन समिति ने दो पत्र जारी किए थे, पहले में समिति ने अमृतसर के गोल्डेन अवेन्यू पर धोबी घाट में लगने वाले मेले में सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को आवेदन दिया था. जबकि दूसरा पत्र एएसआई दलजीत सिंह की ओर से दिया गया जवाब है कि उन्हें इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं हैं.



हालांकि सौरभ सिर्फ एएसआई की एनओसी के जरिए हादसे की जिम्मेदारी से बच जाएंगे ऐसा मुश्किल है. अमृतसर के डिप्टी मेयर रमन बख्शी के मुताबिक जोड़ा फाटक के धोबी घाट में किए जा रहे रावण दहन के आयोजन को लेकर नगर निगम से भी कोई परमिशन नहीं ली गई थी. बख्शी के मुताबिक इस तरह का कोई भी आयोजन करने के लिए अलग-अलग महकमों से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है. इसके बाद SDM, पीडब्ल्यूडी विभाग और बिजली विभाग के साथ ही फायर डिपार्टमेंट से भी एनओसी लेनी होती है. जिस स्थिति में रेलवे की मेन लाइन से 5 मीटर दूर कोई आयोजन हो तो रेलवे को तो इस कार्यक्रम की सूचना देना बेहद ज़रूरी है.

सिर्फ इतना ही नहीं आयोजन में शामिल होने आए लोगों को भी रेलवे ट्रैक से दूर रखना आयोजन समिति की ही जिमेदारी है, क्योंकि वही लोगों को एक रेलवे कानून का उल्लंघन करने के लिए प्रेरित कर रहा था. पंजाब के डीजीपी सुरेश अरोड़ा ने भी कहा है कि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (रेलवे) इकबाल प्रीत सिंह सहोता अमृतसर ट्रेन हादसे की जिम्मेदारी तय करने के लिए अलग जांच करेंगे. डीजीपी ने कहा कि अमृतसर में किसकी ओर से 'लापरवाही' हुई है इसकी जिम्मेदारी ज़रूर तय की जाएगी.

पुलिस की एनओसी

जोड़ा फाटक के पास रहने वाले विजय कुमार जिन्होंने इस हादसे में अपना 19 साल का बेटा खो दिया, बताते हैं कि जितनी भीड़ रावण दहन देखने आई थी उसके मुताबिक सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए थे. विजय आरोप लगाते हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत तब हुई जब भीड़ ज्यादा देखकर आयोजकों ने एलसीडी स्क्रीन को पटरियों की तरफ कर दिया, जिससे मैदान में नहीं आ सके लोग पटरियों की तरफ से ही चीफ गेस्ट को सुन सकें और रावण दहन देख सकें. इसी के चलते ट्रैक पर काफी ज्यादा भीड़ इकठ्ठा हो गई थी.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि आयोजन समिति का एक ख़ास राजनीतिक पार्टी से जुड़ाव होने के चलते कहीं से भी परमिशन लेने या फिर सुरक्षा का इंतज़ाम करने कि ज़रूरत नहीं समझी गई. स्थानीय प्रशासन, नगर निगम और अन्य अधिकारी भी चुप रहे क्योंकि उन्हें भी सौरभ मिट्ठू की राजनीतिक पहुंच का अंदाजा था. हालांकि सीएम अमरिंदर सिंह ने भरोसा दिलाया है कि आयोजक, स्थानीय प्रशासन, नगर निगम के कर्मचारी और अधिकारी, जिन्होंने इस आयोजन को होते हुए देखा और परमिशन न होने के बावजूद चुप्पी साध ली, उन सब के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी. अगर कोई राजनेता भी इसमें सामने आता है तो नगर निगम एफआईआर करवाने और कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेगा.

3. स्थानीय लोग
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर को अमृतसर रेल हादसे से जुड़ी एक जनहित याचिका ख़ारिज करते हुए कहा था कि इस हादसे के लिए चीफ गेस्ट नवजोत कौर सिद्धू को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने आगे कहा था कि ऐसे हादसों के लिए सरकार को भी जिम्मेदार कैसे माना जा सकता है जब लोग खुद ही कानून का उल्लंघन करके रेलवे ट्रैक पर खड़े थे. इस दुर्घटना को लेकर रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्वनी लोहानी का रुख भी कुछ ऐसा ही था. उन्होंने कहा, 'यह कहना गलत है कि इस घटना के लिए रेलवे जिम्मेदार है. ट्रैक पर दो क्रॉसिंग हैं, दोनों बंद थे. यह मेन लाइन है. वहां स्पीड लिमिट की कोई बंदिश नहीं है. रेलवे प्रशासन को मेन लाइन के करीब कार्यक्रम आयोजित कराए जाने की कोई सूचना नहीं दी गई थी. लोग ट्रैक से दशहरा का कार्यक्रम देख रहे थे, लोगों को ज्यादा सचेत रहने की आवश्यकता थी. रेलवे ट्रैक्स पर कोई अतिक्रमण नहीं होना चाहिए.'



बहरहाल ये पूरी तरह सच है कि इस हादसे में मारे गए 62 लोग और 213 घायल रेलवे एक्ट 1989 के सेक्शन -147 (रेलवे प्रीमिसिस ट्रेसपासिंग एक्ट) के तहत दोषी हैं. सिर्फ साल 2017 में ही रेलवे ने रेलवे प्रीमिसिस ट्रेसपासिंग एक्ट के तहत 1,73,112 लोगों पर जुर्माना लगाया है. बता दें कि 2015 से अब तक 49,790 लोगों ने इसी तरह रेलवे ट्रैक क्रॉस करते हुए जान गंवाई है. सबसे ज्यादा 7,908 मौतें उत्तरी रेलवे क्षेत्र पर हुई , वहीं दक्षिणी रेलवे क्षेत्र में 6,149 मौतें और पूर्वी रेलवे क्षेत्र में 5,670 मौतें हुईं. इसके साथ ही ऐसे लोगों पर 4.35 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया. अमृतसर में रेलवे ट्रैक पर खड़े होकर रावण दहन देख रहे लोग भी इसी कानून के तहत दोषी ठहराए जा सकते हैं और रेलवे भी इसी तर्क का इस्तेमाल कर रहा है. हालांकि स्थानीय लोग इससे जुड़े सवाल पर कहते हैं कि देश के किस हिस्से में रेल की पटरी ऐसे पार नहीं की जाती, एक कानून की आड़ में रेलवे, पुलिस और आयोजक 62 लोगों की मौत की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते.

गलतियों की एक सीरीज और 62 मौतें...
इस मामले में जो बात निकलकर सामने आती है वो लगभग सभी पक्षों के गैरजिम्मेदारी, कोताही और अनदेखी को ही इस हादसे की मुख्य वजह के बतौर पेश करती है. स्थानीय लोगों का कहना है और पुलिस ने ही ये माना है कि बीते साल को छोड़ दें तो हर साल इसी छोटे से धोबी घाट में रावण दहन के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. आस-पास रहने वाले लोगों का कहना है कि रेलवे हर साल इस दौरान ट्रेन धीमी चलाता है, इसी बार इतनी तेज स्पीड से ट्रेन आई कि कसी को मौका नहीं मिल पाया. पटरियों के आस-पास ही रहने वाली आशा देवी कहती हैं कि असल में जो लोग पटरियों पर खड़े थे, वो रावण दहन होते ही अपने-अपने मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगे थे, ऐसे में उनका ध्यान ट्रेन पर नहीं गया. ट्रेन भी ठीक उसी वक़्त आई जब रावण में आग लगाई गई, पटाखों और लाउडस्पीकर की आवाज़ में ट्रेन का हॉर्न सुनाई देना नामुमकिन था.



बहरहाल ये घटना एक गलतियों की सीरीज का परिणाम नज़र आती है. जिसमें स्थानीय राजनीतिक दबाव के चलते प्रशासन, पुलिस और नगर निगम सालों से पटरियों के इतने करीब होने वाले आयोजन पर सवाल नहीं उठा रहे थे. लोकल थाने से मिली एनओसी, कमिश्नर ऑफिस के मेल का जीआरपी या किसी भी पुलिस अधिकारी का न देखना भी इसी कोताही का सबूत है जो अक्सर सरकारी महकमों के कल्चर जैसी नज़र आती है. बिना किसी वैलिड परमिशन के हो रहे आयोजन में एलसीडी स्क्रीन को मेन रेलवे ट्रैक की तरफ घुमा दिया गया जिससे लोग पटरियों पर इकठ्ठा हो गए. इतने साल से हो रहे आयोजन के बावजूद रेलवे ने भी इस पर कभी सवाल नहीं उठाए. ये सारी गलतियां शायद वर्षों से लगातार दोहराई जा रही थी जिनका खामियाजा इन 62 लोगों के परिवारों को जीवन भर उठाना होगा.
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