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पिछले 5 सालों में एनीमिया का ज्यादा शिकार हुईं महिलाएं, सर्वे में खुलासा

सांकेतिक तस्वीर- News18 English
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5th National Family Health Survey: 2019-20 के आंकड़े बताते हैं कि मोदी 1.0 में महिलाओं में एनीमिया के आंकड़े कम होने के बजाए बढ़े हैं. 2015-16 से तुलना की जाए, तो असम में 66 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से जूझ रहीं थीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 18, 2020, 7:09 PM IST
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(सिंधु भट्टाचार्य)
नई दिल्ली.
देश में बेटियों की हालत ठीक नहीं है. हाल ही में सामने आए 5वें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (5th National Family Health Survey ) के आंकड़े यह दावा करते हैं. अपने पहले कार्यकाल में मोदी सरकार (Modi Government) ने बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ का नारा दिया था. इसके बावजूद बिहार में हर दूसरी और आंध्र प्रदेश में हर तीसरी महिला अनपढ़ है. हालांकि, महिलाओं की हालत सुधारने के लिए कई काम किए हैं, लेकिन अभी भी सरकार को आंकड़ों को बेहतर बनाने में मेहनत करनी होगी.

5वें नेशनल हेल्थ सर्वे के पहले चरण में 2019-20 के लिए 22 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश कवर किए गए हैं. इन आंकड़ों की तुलना 2015-16 के डेटा से की गई है. डेटा बताता है कि असम में 15-49 उम्र के बीच की तीन महिलाओं में से कम से कम 2 एनीमिया (Anaemia) का शिकार हैं. वहीं, पूरे देश में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं एनीमिया से ज्यादा प्रभावित हैं.

बिहार में 5 में से 4 महिलाओं ने अभी तक इंटरनेट नहीं चलाया
आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 5 में से 4 और तेलंगाना में 4 में से 3 महिलाओं ने कभी भी इंटरनेट इस्तेमाल नहीं किया है. वहीं, कर्नाटक और बिहार में 10 में से कम से कम 4 महिलाओं ने पति की तरफ से हिंसा और एनीमिया का सामना किया है. इसके अलावा 22 राज्यों में फर्टिलिटी रेट भी खासा कम हुआ है.



साक्षरता: बिहार में केवल 57.8 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं. जबकि, यहां करीब 80 फीसदी पुरुष लिख और पढ़ सकते हैं. महिला साक्षरता के मामले में बड़े राज्यों से तुलना की जाए, तो उत्तर-पूर्वी राज्यों की हालत काफी अच्छी है. यहां इन 6 राज्यों में 10 में से 8 महिलाएं पढ़ी-लिखी है. खास बात है कि 5 साल के अंतराल में 2019-20 में हर राज्य में साक्षरता दर में सुधार हुआ है. सबसे ज्यादा महिला साक्षरता दर केरल में है.

एनीमिया: लद्दाख में 15-49 साल की महिलाओं की बात करें, तो 10 में से 9 महिलाएं एनीमिया से जूझ रही हैं. पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 4 में से 3 है. वहीं, ज्यादातर राज्यों में हर चौथी महिला एनीमिया का शिकार है. इस साल मार्च में संसद में बोलते हुए मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा था कि देश में 53.1 प्रतिशत या हर दूसरी महिला एनीमिया का शिकार है. इसके लिए उन्होंने चौथे नेशनल हेल्थ सर्वे का हावाला दिया था.

2019-20 के आंकड़े बताते हैं कि मोदी 1.0 में महिलाओं में एनीमिया के आंकड़े कम होने के बजाए बढ़े हैं. 2015-16 से तुलना की जाए, तो असम में 66 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से जूझ रहीं थीं. बिहार में भी यह आंकड़ा 60.3 फीसदी से बढ़कर 63.5 प्रतिशत हो गई है.

बाल विवाह: बाल विवाह (Child Marriage) के मामले कुछ बड़े राज्यों में कम हुए हैं, लेकिन यह हालात हर जगह नहीं हैं. बिहार, बंगाल और त्रिपुरा में 20-24 साल की 10 में 4 लड़कियों ने कहा कि उनकी शादी 18 साल की उम्र से पहले ही कर दी गई थी. पॉपुलेशन फेडरेशन ऑफ इंडिया ने भी बाल विवाह के बढ़ते मामलों पर चिंता जाहिर की थी. त्रिपुरा में बाल विवाह के मामले 2015-16 की तुलना में 33.1 प्रतिशत से बढ़कर 40.1 फीसदी पर पहुंच गए हैं. बिहार और पश्चिम बंगाल में बाल विवाह का असर ज्यादा है. पीएफआई ने कहा है कि ज्यादातर राज्यों में टोटल फर्टिलिटी रेट कम होने से भारत की जनसंख्या स्थिर हो गई है.

साथी की मारपीट: सिक्किम, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, असम और कर्नाटक के अलावा हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में पतियों की तरफ से होने वाली हिंसा कम हुई है. सर्वे से मिले आंकड़ों के मुताबिक, यहां हिंसा 20.6 प्रतिशत से बढ़कर 44.4 फीसदी हो गई है.

बैंक के खाते और फैसले लेने की आजादी: इस मामले में खबर अच्छी है. बिहार में महिलाओं के बैंक खाता खोलने और उसे चलाने में खासा इजाफा हुआ है. 2015-16 में 4 में से केवल 1 महिला के पास खाता होता था, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर कम से कम 3 हो गया है. 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 3 में से कम से कम 2 महिलाओं के पाश बैंक खाता है. वहीं, घर के बड़े फैसले लेने के मामले में महिलाओं ने तरक्की की है. वहीं, जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, सिक्किम और पश्चिम बंगाल इस मामले में पिछड़े हैं.
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