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ANALYSIS | 2019 में राहुल गांधी के लिए कोई भी बन सकता है 'मनमोहन सिंह'

राहुल गांधी (फ़ाइल फोटो)

राहुल गांधी (फ़ाइल फोटो)

साल 2004 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई. अटल बिहारी वाजपेयी को हराने के लिए सोनिया ने चुनाव से पहले कभी भी किसी का नाम प्रधानमंत्री के तौर पर आगे नहीं बढ़ाया.

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    (वेंकटेश केसरी)

    कांग्रेस के सामने लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर चुनौतियों का अंबार खड़ा है. लेकिन अब ये लगभग साफ हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस साल 2004 की रणनीति पर निर्भर है. अगले चुनाव में बीजेपी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस ने ज़ोर-शोर से तैयारियां शुरू कर दी है है. साथ ही कांग्रेस चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों से गठबंधन को लेकर भी रणनीति तैयार कर रही है.

    पिछले छह महीने में कांग्रेस के नेताओं ने चुनाव की रणनीति को लेकर ऐसे संकेत दिए हैं कि बीजेपी और उनके सहयोगी दल उलझ गए हैं. अगर इस चुनाव को राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी बना दिया जाए तो बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है.

    कांग्रेस नेतृत्व के मुद्दे पर लगातार अपना स्टैड बदल रही है. ऐसे में क्षेत्रीय दलों के बीच हलचल तेज़ हो गई है. संकेत साफ हैं कि कोई भी 2019 के चुनाव में राहुल गांधी के लिए मनमोहन सिंह बन सकते हैं. यानी प्रधानमंत्री बनने का किसी भी नेता का सपना पूरा हो सकता है.

    राहुल गांधी भले ही अपनी मां सोनिया गांधी की परछाईं से बाहर आ गए हों लेकिन वो अभी भी प्रधानमंत्री के नाम के मुद्दे पर उनके ही नक्शे कदम पर चल रहे हैं. साल 2004 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई. अटल बिहारी वाजपेयी को हराने के लिए सोनिया ने चुनाव से पहले कभी भी किसी का नाम प्रधानमंत्री के तौर पर आगे नहीं बढ़ाया. इसके बाद कांग्रेस ने अगले 10 साल तक राज किया. सोनिया गांधी की इस रणनीति से बीजेपी को करारा झटका लगा था.

    इस बार भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री के नाम के नाम पर चुप हैं. लिहाजा उनकी चुप्पी ने बीजेपी से लेकर कांग्रेस के नेता (जो प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं) को कन्फ्यूज़ कर दिया है. साल 2004 चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने कहा था कि वह प्रधानमंत्री की रेस में नहीं हैं. उन्होंने इस दौरान ये भी कहा कि कांग्रेस में कई नेता प्रधानमंत्री पद के दावेदार  हैं.

    दिसंबर 2003 में मीडिया के साथ बातचीत विपक्ष की एकता बनाए रखने के लिए टर्निंग प्वाइट साबित हुआ. इस दौरान सोनिया गांधी ने कहा कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा ये ज़्यादा जरूरी नहीं है, बल्कि अहम ये है कि बीजेपी की हार हो.

    सोनिया की इस बात से डीएमके, आरजेडी, लोक जनशक्ति पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति और वामपंथी दल एक साथ एक मंच पर आ गए. इतना ही नहीं इससे कांग्रेस और बसपा के बीच भी दोस्ताना रिश्ते बन गए. उस समय कांग्रेस उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सरकार का बाहर से समर्थन कर रही थी. इससे उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए के स्पष्ट विकल्प का उदय हुआ.

    राहुल गांधी भी इसी राह पर चल रहे हैं. हालांकि उन्होंने ये साफ-साफ नहीं कहा है कि वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं लेकिन राहुल ने ये साफ कर दिया है कि ये नंबर गेम है और इसकी अहमियत चुनाव के नतीजे आने के बाद होती है. कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री बनेंगे. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर यहां कर्नाटक का फॉर्मूला लगाया जाएगा. बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए कर्नाटक में तीसरे नंबर की पार्टी जनता दल सेक्यूलर को मुख्यमंत्री का पोस्ट दिया गया था.

    राहुल भले ही वोटर को अपनी ओर खींच न पा रहे हो लेकिन अगर बीजेपी को नुकसान होता है तो फिर इसका फायदा उन्हें जरूर मिलेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि मायावती का वोट बैंक सिर्फ एससी-एसटी तक सीमित है. ममता बनर्जी का बोलबाला सिर्फ बंगाल में है जबकि अखिलेश और तेजस्वी चुनावी मैदान में वोटरों को रिझाने के लिए थोड़े नए हैं.  दूसरी तरफ, एमके स्टालिन और एन चंद्रबाबू नायडू की प्राथमिकता तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में किंगमेकर बनने की है. यानी तैयार हो जाइए 2019 में एक रोमांचक मुकाबला देखने के लिए.

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनकी निजी राय है)

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