Analysis: खास मिशन पर लग गये हैं मोदी के खासमखास

Analysis: खास मिशन पर लग गये हैं मोदी के खासमखास
प्रधानमंत्री ने कोविद -19 के खिलाफ भारत की लड़ाई की समीक्षा की

कोरोना के महासंकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पीएम मोदी ने अपने खास अधिकारियों को सौंपी है बड़ी जिम्मेदारी. एके शर्मा और तरुण बजाज जैसे अधिकारी पहले भी बड़े लक्ष्य हासिल करने में कामयाब रहे हैं और एक बार फिर मोदी को उनसे यही उम्मीद है, जब उनके हाथ में दी गई है एमएसएमई और डीईए की कमान.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 27, 2020, 9:11 AM IST
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मोदी सरकार में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है, कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों और विभागों में नये सचिवों की नियुक्ति की गई है, तो कई अधिकारियों को उसी जगह प्रोमोशन दे दिया गया है. कुल मिलाकर पैंतीस अधिकारी इस फेरबदल में शामिल हुए हैं. इस बदलाव की जरूरत की रूपरेखा दो हफ्ते पहले ही बन गई थी, जब मोदी सरकार ने 1987 और 1988 बैच के 28 आईएएस अधिकारियों को सचिव स्तर पर प्रोन्नत करने का फैसला किया था. इसी हिसाब से ये नई नियुक्तियां हुई हैं और फेरबदल किये गये हैं.

लेकिन इस सूची को ध्यान से देखने पर एक बड़ा संदेश भी मिलता है. संदेश खुद पीएम मोदी ने ही दिया है. दो ऐसे अधिकारी, जो लंबे समय से पीएमओ में थे और मोदी के करीबी और विश्वासपात्र अधिकारियों में जिनकी गिनती होती थी, उन्हें पीएमओ से बाहर दो बड़े महत्वपूर्व विभागों की कमान दी गई है सचिव के तौर पर. ये दोनों ही अधिकारी 1988 बैच के हैं, तरुण बजाज और अरविंद शर्मा. तरुण बजाज हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी, तो अरविंद शर्मा गुजरात कैडर के. तरुण बजाज को डीईए यानी आर्थिक मामलों के विभाग की जिम्मेदारी सचिव के नाते दी गई है, तो अरविंद शर्मा, जो एके शर्मा के तौर पर प्रशासनिक हलकों में मशहूर हैं, को एमएसएमई यानी कुटीर, लघु और मध्यम उद्यमों के मंत्रालय के सचिव की जिम्मेदारी.

एके शर्मा का तो पीएमओ से जाना ही अपने आप में अचरज के तौर पर देखा जा रहा है. रिकॉर्ड के तौर पर एके शर्मा नरेंद्र मोदी के साथ सबसे लंबे समय तक सीधे जुड़े रहने वाले अधिकारी के तौर पर मशहूर हैं. नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के केंद्रीय संगठन में महामंत्री की भूमिका निभाने के बाद जब 7 अक्टूबर 2001 को सीधे गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी, तो वहां सीएमओ में हुए फेरबदल के तहत मोदी ने सबसे पहले एके शर्मा की नियुक्ति की थी अपने सचिव के तौर पर. उससे पहले शर्मा गुजरात के महेसाणा और खेड़ा जिलों में कलेक्टर रह चुके थे, साथ ही जीएमडीसी में ज्वाइंट एमडी और जीएसएफसी में एमडी रह चुके थे.



अरविंद शर्मा, जो एके शर्मा के तौर पर प्रशासनिक हलकों में मशहूर हैं, को एमएसएमई यानी कुटीर, लघु और मध्यम उद्यमों के मंत्रालय के सचिव की जिम्मेदारी दी

जिस वक्त मोदी ने बतौर सीएम अपने सेक्रेटरी के तौर पर ए के शर्मा को अपने पास बुलाया, उस वक्त वो सरदार सरोवर नर्मदा परियोजना में पुनर्वास मामलों के कमिश्नर हुआ करते थे. मोदी के पास तीन अधिकारियों का पैनल सेक्रेटरी पद पर नियुक्ति के लिए भेजा गया था, जिसमें से एके शर्मा को उन्होंने पसंद किया. बताया जाता है कि शर्मा जब महेसाणा में कलेक्टर होते थे, उस वक्त मोदी को उनके बारे में अच्छा फीडबैक बीजेपी कार्यकर्ताओं और अपने जानकारों से मिला था. इसी आधार पर मोदी ने शर्मा पर भरोसा किया, क्योंकि मोदी गुजरात भूकंप के बाद संकट का सामना कर रही बीजेपी और वहां की राज्य सरकार के कामकाज में जान फूंकने के लिए भेजे गये थे.

वहां से मोदी का ए के शर्मा पर जो भरोसा जमा, वो कभी कम नहीं हुआ और यहां तक कि जब 26 मई 2014 को उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली, तो पीएमओ में पहली नियुक्ति एके शर्मा की ही की, तीस मई को आदेश जारी हुआ और औपचारिक तौर पर तीन जून से ए के शर्मा ने पीएमओ में अपना काम ज्वाइंट सेक्रेटरी के तौर पर शुरु किया. वैसे तो अनौपचारिक तौर पर 20 मई से ही वो अपना काम दिल्ली में कर रहे थे, जब मोदी को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया था.

सवाल उठता है कि जो एके शर्मा पिछले साढ़े अठारह साल से लगातार मोदी की सीधी छत्रछाया में काम कर रहे थे और सीएम के सेक्रेटरी से लेकर केंद्र में सचिव तक की प्रोन्नति मोदी के साथ सीधे काम करके ही हासिल करते रहे, उन्हें अब पीएमओ से बाहर क्यों भेजा गया है. यही बात तरुण बजाज के मामले में भी है, जो अप्रैल 2015 में पीएमओ में ज्वाइंट सेक्रेटरी के तौर पर आए थे और वहीं पर लगातार काम करते रहे थे, प्रोमोशन पाकर एडिशनल सेक्रेटरी बन जाने के बावजूद. खास बात ये है कि मोदी के पीएमओ में शर्मा और बजाज ही दो एडिशनल सेक्रेटरी थे, जो अब सेक्रेटरी पद पर प्रोमोशन के बाद एक साथ दो महत्वपूर्ण विभागों और मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं.

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इन दोनों को पीएमओ से बाहर एमएसएमई और डीईए में भेजा जाना पीएम मोदी की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है. जानकार सूत्र बताते हैं कि कोरोना के महासंकट के बीच मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को तेजी के साथ पटरी पर लाने की है जो पिछले एक महीने से देशव्यापी लॉकडाउन के कारण मुश्किल मे है. इस बड़ी चुनौती से निबटने के लिए ही मोदी ने अपने दो खास प्रशासनिक सिपहसालारों को दो अहम विभागों की जिम्मेदारी दी है. मोदी को इन पर पूरा भरोसा भी है और इन दोनो के कामकाज को वो जानते भी हैं. खास बात ये है कि तरुण बजाज को उसी डीईए का सचिव बनाकर भेजा गया है, जिस डीईए में करीब तीन साल तक वो ज्वाइंट सेक्रेटरी के तौर पर काम कर चुके थे पीएमओ में आने के पहले तक.

स्वाभाविक तौर पर मोदी के लिए गरीब लोगों की चिंता करना अहम है. कोरोना संकट के बाद उन्होंने जितनी बार भी देशवासियो के साथ बातचीत की, गरीब हमेशा उनकी चिंता के केंद्र में रहा है. पीएम मोदी को अच्छी तरह पता है कि अगर बड़े पैमाने पर गरीबों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करने हैं, तो कुटीर, लघु और मध्यम उद्यमों को तेजी से आगे बढ़ाना होगा, इन्हें मजबूत करना होगा. ए के शर्मा के पास इस सेक्टर को ठीक करने के लिए पर्याप्त अनुभव है. गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए साढ़े तेरह साल तक सीएमओ का हिस्सा रहे एके शर्मा लगातार इंडस्ट्री की ही जिम्मेदारी संभाले रहे. यहां तक कि औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए मोदी ने 2003 में जब वाइब्रेंट गुजरात इन्वेस्टर सम्मिट की शुरुआत की, तो एके शर्मा ही सिगल रेफरेंस प्वाइंट इसके लिए बनाये गये थे सीएमओ में.

बतौर सीएम मोदी जब देश और दुनिया में लगातार निवेशकों से मिलने के लिए गये या व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों के साथ विदेश गये, तो उनके बगल में हमेशा एके शर्मा ही मौजूद रहा करते थे. यहां तक कि पीएमओ में भी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सभी विभागों पर निगाह रखने की जिम्मेदारी उन्हीं के पास रही और देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक राज्यों को भी वो मॉनिटर करते रहे. फाइनेंस के मामले में कोई सीधी भूमिका नहीं रहने के बावजूद बजट की तैयारी के दौरान भी इनपुट देने से लेकर तमाम महत्वपूर्ण मौकों पर उनकी बात सुनी जाती रही. दरअसल ए के शर्मा को पीएम मोदी की अगुआई में काम करते हुए अठारह साल बीत चुके हैं और उन्हें भली-भांति पता है कि किस चुनौती से कैसे निबटना है और मोदी क्या चाहते हैं.

तरुण बजाज अप्रैल 2015 में पीएमओ में ज्वाइंट सेक्रेटरी के तौर पर आए थे


तरुण बजाज को डीईए की जिम्मेदारी देना भी महत्वपूर्ण संकेत देने वाला है. गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी अतनु चक्रवर्ती तीस अप्रैल को बतौर सचिव रिटायर होने जा रहे हैं. बजाज को इस विभाग का पुराना अनुभव है, पीएमओ में खुद लंबे समय तक काम कर चुके हैं, ऐसे में महत्वपूर्ण आर्थिक कदमों या नियमों के मामले में उनकी चाल काफी तेज रह सकती है, क्योंकि न तो कोऑर्डिनेशन में कोई समस्या होने वाली है और न ही किसी किस्म की संवादहीनता का खतरा.

ये दोनों अधिकारी इन दो महत्वपूर्ण मंत्रालयों में पीएम के आंख-कान की भूमिका में रहने वाले हैं और अपनी स्थापित क्षमताओं के हिसाब से नतीजे देने में सक्षम भी. संदेश साफ है, कोरोना से लड़ाई के मामले में पीएम मोदी की अगुआई में भारत ने जिस तरह से वैश्विक साख बनाई है, पड़ोसियों के साथ ही दुनिया के बड़े देशों की भी मदद की है, उसके बाद अब अपनी अर्थव्यवस्था को तेजी से पटरी पर लाने की कवायद पूरी गंभीरता के साथ शुरु की जा रही है और इसके लिए सीधे-सीधे अपने खास अधिकारियों को मैदान में उतार दिया है मोदी ने संबंधित विभागों की कमान देकर. संकेत ये भी है कि बाकी किसी भी सेक्टर के मुकाबले अर्थव्यवस्था मोदी के एजेंडे में टॉप पर है और वो इसमें कोई कोताही नहीं बरतना चाहते. वित्त मंत्रालय में तरुण बजाज को रखने के पहले मोदी अपने एक और पसंदीदा अधिकारी टीवी सोमनाथन को पहले ही एक्सपेंडीचर सेक्रेटरी के तौर पर वहां रख चुके हैं. दिसंबर 2019 में ये नया पद पदभार स्वीकार करने के पहले तमिलनाडु कैडर के 1987 बैच के आईएएस अधिकारी सोमनाथन पीएमओ में रह चुके थे और नोटबंदी के समय इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

एमएसएमई का जिम्मा बतौर मंत्री नितिन गडकरी के पास है, तो वित्त मंत्रालय का जिम्मा निर्मला सीतारमण के पास. अपने इन महत्वपूर्ण मंत्रियों के साथ अपने खास अधिकारियों को रखकर पीएम मोदी ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने में सरकार के जिन दो मंत्रालयों की अहम भूमिका रहने वाली है, उनमें कही किसी किस्म की दिक्कत न हो और अपने काम के लिए साख बना चुके अधिकारियों की मदद से वहां जल्दी से बड़े और सकारात्मक परिणाम हासिल किये जा सकें. पीएम मोदी ने अपनी प्राथमिकता साफ कर दी है और अब नतीजे देने की जिम्मेदारी इन अधिकारियों पर है, जिनकी क्षमता के बारे में खुद पीएम मोदी को कोई संदेह नहीं है.

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सवाल ये उठता है कि आखिर पीएम मोदी को इन अधिकारियों पर इनता भरोसा क्यों है, खास तौर पर एके शर्मा के मामले में. एके शर्मा का लगातार 18 साल से नरेंद्र मोदी के साथ काम करना ज्यादातर लोगों के लिए पहेली जैसा है, आखिर कैसे इतने समय तक वो नरेंद्र मोदी का विश्वास हासिल करते रहे. मोदी लगातार साढे तेरह साल तक गुजरात के सीएम पद पर रहने का रिकॉर्ड बनाने के बाद छह साल से देश के पीएम हैं और एके शर्मा इस दौरान उनके साथ लगातार रहे हैं. इतने लंबे समय तक पीएम के साथ रहने के बाद शर्मा पहली दफा उनकी सीधी छत्रछाया से बाहर जा रहे हैं. ये बात ये सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि खुद मोदी के लिए अपने इस खास अधिकारी से उम्मीदें कितनी अधिक हैं.

एके शर्मा लगातार 18 साल तक पीएम का विश्वास हासिल करते आए हैं, तो इसकी कई वजहें हैं. बेहद लो प्रोफाइल रखने वाले एके शर्मा अमूमन कैमरे की चकाचौंध से दूर रहते हैं, जुबान पर भी जबरदस्त नियंत्रण है, शायद ही कोई बात उनके जरिये बाहर निकले. मोदी को कभी किसी काम के लिए मना नहीं करते, लेकिन उस दौरान आने वाली दिक्कतों और पेचीगदियों को भी साफ तौर पर बता देते हैं.

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के एक गांव काझाखुर्द से आने वाले शर्मा वैसे तो राजनीति शास्त्र में एमए हैं, लेकिन मोदी क साथ काम करने के दौरान ही मिड कैरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत उन्होंने 2006 में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी कैनबरा से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर की पढ़ाई की. साल भर का ये कोर्स करने के लिए शर्मा को तब मजबूरन जाना पड़ा था, जब डीओपीटी ने उन्हें इस अनिवार्य कोर्स के लिए और समय देने से मना कर दिया. मोदी के सीएमओ से ही स्टडी लीव लेकर शर्मा आस्ट्रेलिया की राजधानी गये और फिर लौटकर सीएमओ ही आए, इसलिए उनकी सेवा मोदी के साथ लगातार बनी रही, स्टडी लीव के दौरान भी तनख्वाह सीएमओ की पोस्टिंग से ही मिलती रही.

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पोलिटिकल साइंस और पब्लिक पॉलिसी में एमए करने वाले शर्मा का ज्यादा समय अर्थशास्त्र की चिंता करते ही बीता है, खास तौर पर उद्योग-धंधे, निवेश और आधारभूत सुविधाओं के विकास की चिंता करते हुए और इसके लिए जरूरी परियोजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करते हुए. खास बात ये है कि एके शर्मा और तरुण बजाज को जब अर्थव्यवस्था की चिंता करने के लिए मोदी ने सीधे-सीधे काम पर लगाया है, उस वक्त खुद पीएमओ में उनके प्रिसिपल सेक्रेटरी पीके मिश्रा भी मूल तौर पर अर्थशास्त्र के ही विशेषज्ञ हैं. ओडीशा में उन्होंने जब इकोनॉमिक्स में बीए ऑनर्स किया, अकेले वही थे पूरे राज्य में, जो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए 1970 में. बाद में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से एमए और यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स से इकोनॉमिक्स में ही पीएचडी करने के कारण अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाते हैं पीके मिश्रा. शर्मा और बजाज उनके भी करीबी हैं, ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी संभालने वाली इस क्रैक टीम में पूरा सामंजस्य रहने वाला है, पीएम मोदी के ये सभी भरोसेमंद तो हैं ही.

एक संयोग ये भी है कि जो ए के शर्मा महेसाणा में कलेक्टर रहने के दौरान नरेंद्र मोदी की नजरों में आए थे, उस महेसाणा से पीके मिश्रा का भी नाता रहा है. 1983 से 1985 के बीच महेसाणा के कलेक्टर रहे थे मिश्रा, तो शर्मा 1995 से 1997 के बीच. मोदी का अपना जन्म जब वडनगर में 1950 के साल में हुआ था, उस वक्त वो कस्बा महेसाणा जिले का ही हिस्सा था, जो चार दशक बाद एक नये जिले पाटण का हिस्सा बन गया है. महेसाणा का भी ये खास संयोग है इन तीनों के बीच.

मोदी के प्रशासनिक हनुमान की भूमिका डेढ़ दशक से भी अधिक समय से अदा करते आए ए के शर्मा निजी जीवन में भी हनुमान भक्त हैं. खाली समय में हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, लंबी विदेश यात्राओं के दौरान हवाई जहाज में भी यही करते हैं, मशहूर हनुमान मंदिरों में दर्शन के लिए भी जाते रहते हैं. बजरंग बली के साथ ही भगवान शिव पर भी अगाध आस्था है एके शर्मा की. शिवभक्त मोदी भी हैं, लेकिन मूल तौर पर शक्ति के उपासक. शक्ति के उपासक मोदी को अपने हनुमान शर्मा से अब उम्मीद है कोरोना से ग्रस्त अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए रोजगार और उद्यमिता की संजीवनी फटाफट लाने की. उम्मीद है हनुमान अपने राम को निराश नहीं करेंगे, लॉकडाउन के समय रामानंद सागर कृत रामायण देख चुके लोगों की आंखों के आगे हाल ही में ये दृश्य गुजरा है, आवश्यकता है इसे धरातल पर उतारने की, अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में, कोरोना की पृष्ठभूमि में. रात-रात भर जाग कर मोदी के दिये हुए काम तय समय पर पूरा करने के अभ्यस्त शर्मा को इसमें कोई परेशानी भी नहीं, आखिर आराध्यदेव हनुमान ने भी तो ऐसा ही चमत्कार दिखाया है.

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