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ANALYSIS: भाजपा ने शिवसेना को यूं दिया 'दर्द', 14 साल पुराने जख्म हो गए हरे

Manoj Khandekar | News18Hindi
Updated: October 17, 2019, 4:49 PM IST
ANALYSIS: भाजपा ने शिवसेना को यूं दिया 'दर्द', 14 साल पुराने जख्म हो गए हरे
शिवसेना ने भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार नीतेश राणे के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा है.

नीतेश राणे के खिलाफ शिवसेना के अधिकृत उम्मीदवार सामने आने के बाद उनके पिता नारायण राणे ने भी एक दांव खेला है. उन्होंने सिंधुदुर्ग की दो अन्य सीटों सावंतवाडी और कुडाल में शिवसेना के खिलाफ दो निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है.

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  • Last Updated: October 17, 2019, 4:49 PM IST
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कणकवली शब्द संस्कृत के शब्द कनकवल्लि से बना है. कनक यानी सोना और वल्लि यानी भूमि. सोने की यह भूमि या स्वर्ण भूमि अब महाराष्ट्र (Maharashtra) के चुनावी रणसंग्राम का सबसे बड़ा अखाड़ा बन गया है. यूं तो राज्य की सभी 288 सीटों पर भाजपा (BJP) और शिवसेना (Shivsena) के बीच गठबंधन है, लेकिन स्वर्ण भूमि में आकर दोनों दलों के बीच तलवारें खींच गई है. शिवसेना ने यहां गठबंधन धर्म का पालन नहीं करते हुए भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार नीतेश राणे (Nitesh Rane) के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा है.

नीतेश राणे 2014 में बतौर कांग्रेस (Congress) उम्मीदवार इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन अब उन्हें पटखनी देने के लिए उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की पार्टी ने पहले निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल करने वाले सतीश सावंत को अपना अधिकृत उम्मीदवार घोषित किया है.

मतदान के लिए एक सप्ताह का वक्त बचा होने की वजह से कणकवली में प्रचार जोर-शोर से चल रहा है और इसके साथ ही भाजपा और शिवसेना के बीच तनाव बढ़ने की आशंका है. माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadanavis) 15 अक्टूबर को कणकवली में नीतेश राणे के समर्थन में एक जनसभा को संबोधित करेंगे. इसी जनसभा में नीतेश के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे अपनी पार्टी महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष का भाजपा में विलय कर देंगे. वहीं, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का 16 अक्टूबर को कणकवली दौरा प्रस्तावित है. ऐसे में दोनों दलों के बीच टकराव बढ़ सकता है.



14 साल पुरानी अदावत..!
दरअसल, लड़ाई नीतेश राणे बनाम सतीश सावंत नहीं है. बल्कि नीतेश के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे बनाम शिवसेना है, जिसके चलते कणकवली का चुनाव दोनों के लिए साख का सवाल बन गया है. दोनों के बीच इस अदावत को जानने के लिए हमें 14 साल पीछे 2005 में जाना होगा, जब नारायण राणे अपने समर्थक विधायकों के साथ शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे. राणे ने उस समय शिवसेना के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के साथ मतभेदों पर पार्टी छोड़ दी थी. राणे के पार्टी छोड़ने की वजह से शिवसेना को अपने मजबूत गढ़ कोंकण में गहरा झटका लगा था. उसी वक्त से राणे बनाम शिवसेना की लड़ाई जगजाहिर है.

राणे यूं ले रहे है बेटे का 'बदला'
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नीतेश राणे के खिलाफ शिवसेना के अधिकृत उम्मीदवार सामने आने के बाद उनके पिता नारायण राणे ने भी एक दांव खेला है. उन्होंने सिंधुदुर्ग की दो अन्य सीटों सावंतवाडी और कुडाल में शिवसेना के खिलाफ दो निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है. सावंतवाडी से गृह राज्य मंत्री दीपक के सरकर के खिलाफ राजन तेली और कुडाल से वैभव नाईक के सामने रणजीत देसाई का समर्थन किया है. राणे बनाम शिवसेना की वजह से कोंकण की इन तीनों सीटों पर लड़ाई बेहद दिलचस्प हो गई है.



राणे के जरिए भाजपा का मिशन कोंकण
कोंकण क्षेत्र शुरू से ही शिवसेना का मजबूत गढ़ रहा है. भाजपा और अन्य दल तमाम कोशिशों के बावजूद इस गढ़ को भेदने में नाकाम रहे हैं. ऐसे में नारायण राणे के जरिए भाजपा इस इलाके में अपने पांव जमाने की कोशिश कर रही है. यदि कणकवली में राणे को सफलता मिलती है तो संदेश साफ जाएगा कि उनके परिवार को इस इलाके में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. वहीं भाजपा के लिए भविष्य में इस इलाके में अपना विस्तार करने की राह भी खुल जाएगी.

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First published: October 14, 2019, 8:48 PM IST
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