ANALYSIS- लोकसभा चुनाव: BJP के सामने यक्ष प्रश्न- पूर्ण परिवर्तन या बस झाड़-पोंछ?

हिन्दी हृदय प्रदेश कहे जाने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार ने पार्टी के अंदरूनी समीकरण को बदल दिया है.

News18Hindi
Updated: January 27, 2019, 3:04 PM IST
ANALYSIS- लोकसभा चुनाव: BJP के सामने यक्ष प्रश्न- पूर्ण परिवर्तन या बस झाड़-पोंछ?
हिन्दी हृदय प्रदेश कहे जाने वाले तीन राज्यों में बीजेपी की हार ने पार्टी के अंदरूनी समीकरण को बदल दिया है.
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Updated: January 27, 2019, 3:04 PM IST
अनीता कात्याल
बीजेपी इस वक्त 'आगे कुआं-पीछे खाई' वाली स्थिति में फंसती दिख रही है. लोकसभा चुनाव में अब बस कुछ ही महीनों का वक्त बचा है और बीजेपी अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि क्या उसे पुरानी नीति पर ही चलते हुए पार्टी के उम्मीदवारों में बड़ा फेरबदल करना चाहिए या फिर थोड़ी झाड़-पोंछ के साथ अपने मौजूदा सांसदों पर ही भरोसा जताना चाहिए.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बीजेपी के इस सवाल का जवाब ढूंढना और मुश्किल कर दिया है. इन चुनावों से पहले ऐसा कहा था कि पार्टी अपने कई मौजूदा सांसदों का टिकट काटकर उनकी जगह नए चेहरों को लोकसभा चुनाव में उतारेगी. किसी नेता विशेष के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी से निपटने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का यह राम बाण हुआ करता था. 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की शानदार जीत के बाद शाह की इसी रणनीति के जरिये पार्टी ने कई विधानसभा चुनावों में जीत की नई इबारत लिखी.

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बीजेपी अध्यक्ष तब इस तरह के सख्त फैसलों को लेकर निश्चिंत थे, क्योंकि उन्हें यकीन था कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के दम पर नए उम्मीदवार भी जीत जाएंगे. इसके अलावा पार्टी संगठन पर अमित शाह की पकड़ का मतलब था कि पार्टी के भीतर को लेकर विरोध नहीं और अगर कुछ नाराजगी उभरी भी तो उसे जल्द ही दूर कर लिया गया. उनके फैसलों से अगर कोई नाखुश भी है तो उसे खामोशी से सबकुछ झेलना होता था.



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हालांकि हिन्दी हृदय प्रदेश कहे जाने वाले इन तीन राज्यों में बीजेपी की हार ने पार्टी के अंदरूनी समीकरण को बदल दिया है. अगर अमित शाह लोकसभा उम्मीदवारों की मौजूदा फेहरिस्त में ज्यादा रद्दोबदल करते हैं तो बहुत संभव है कि पार्टी में उनसे नाराज़ चल रहा धड़ा मुखर होकर विरोध जता सकता है. दूसरी तरफ अमित शाह अगर लोकसभा चुनाव में नपातुला कदम उठाते हुए मौजूदा सांसदों को ही टिकट देते हैं तो इन सांसदों के खिलाफ लोगों की नाराज़गी पार्टी को भारी भी पड़ सकती है.
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बीजेपी की इस हालिया शिकस्त ने पार्टी नेतृत्व से नाराज़ चल रहे नेताओं के सुर को बुलंद कर दिया है. अब वे अपनी नाराजगी का इजहार करने में हिचक नहीं रहे, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि इन चुनावी नतीजों से मोदी-शाह की छवि को धक्का लगा है और अभी वे सबसे कमजोर स्थिति में हैं. बीजेपी के मौजूदा सांसद यह मान रहे हैं कि अपनी सीट बचाने या फिर मनपसंद जगह से टिकट लेने का यह सुनहरा मौका है.

यहां रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से यह ऐलान कर दिया कि वह अगला लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की अपनी मौजूदा सीट गाजीपुर से ही लड़ेंगे. उन्होंने यह भी साफ किया कि अगर उन्हें गाजीपुर से टिकट नहीं मिला तो फिर वह इस चुनाव से दूर ही रहना पसंद करेंगे.

मोदी-शाह की जोड़ी को आने वाले महीनों में संभलकर कदम बढ़ाना होगा, क्योंकि 2019 का चुनाव 2014 जैसा नहीं रहना वाला. पांच साल पहले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और 'अच्छे दिन' लाने के वादे के बल पर बीजेपी को अप्रत्याशित जीत हासिल हुई. हालांकि मोदी की लोकप्रियता पूरी तरह खत्म तो नहीं, लेकिन घटी जरूर है. पार्टी इस वक्त बस मोदी मैजिक के बल पर सियासी नैया पार होने के भरोसे नहीं बैठी रह सकती है. इसके अलावा विपक्षी नेताओं पर हमले भी ज्यादा काम आते नहीं दिख रहा. ऐसे में इस अहम वक्त में मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी के भीतर बगावत नहीं देखना चाहेंगे, खासकर तब जब वे ही ड्राइवर सीट पर हैं और उनके सरकार का कामकाज गहन समीक्षा के दौर से जुगर रहा है.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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