कांग्रेस में क्‍या सबकुछ ठीक नहीं है, राहुल गांधी के खिलाफ उठने लगी हैं आवाजें!

कांग्रेस में क्‍या सबकुछ ठीक नहीं है, राहुल गांधी के खिलाफ उठने लगी हैं आवाजें!
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोमवार को घमासान देखने को मिला था.

क्या कांग्रेस (Congress) में एक सक्रिय नेतृत्व नहीं होने से पुराने कांग्रेसियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है? क्या पार्टी एक और टूट के लिए तैयार है? आखिर ये सारे सवाल उठे क्यों हैं...

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 25, 2020, 12:54 PM IST
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नई दिल्‍ली. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक (CWC Meeting) के दौरान नेताओं के बीच मचे घमासान से कई सवाल खड़े हो गए हैं. क्या गांधी परिवार का वर्चस्व अब पार्टी में घट रहा है? क्या पार्टी के अंदर सबकुछ सामान्य नहीं है? क्या पार्टी में एक सक्रिय नेतृत्व नहीं होने से पुराने कांग्रेसियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है? क्या पार्टी एक और टूट के लिए तैयार है?

सबसे पहले बताते हैं कि आखिर ये सारे सवाल उठे क्यों हैं. कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संगठन में आमूल चूल परिवर्तन पर जोर दिया. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में इस लेटर का साइड इफ़ेक्ट दिखा. सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने खत लिखने वाले नेताओं पर तीखा हमला किया. परिणाम ये निकला कि राहुल गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया कांग्रेस के भीतर से उठी.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने बैठक के भीतर ही ये कह दिया कि अगर उनका बीजेपी से साठगांठ साबित हो जाता है तो पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे देंगे. उनका ये बयान पार्टी फोरम में था, इसलिए बयान सूत्रों के हवाले से बाहर आया. जाहिर है ऐसे बयान के खारिज होने की संभावना ज्यादा थी, जो बाद में आ भी गई. लेकिन कांग्रेस के एक और बड़े नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक बगावत कर दी. तथाकथित राहुल गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए उन्‍होंने ट्वीट किया. ट्वीट में उन्होंने लिखा कि 30 साल से बीजेपी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, फिर भी बीजेपी के साथ साठगांठ का आरोप.



कपिल सिब्बल के ट्वीट के अर्थ
कपिल सिब्बल का ये बयान सामान्य नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि उनका ये बयान राहुल गांधी के बयान के सीधे सीधे विरोध में था. हालांकि राहुल गांधी के विरोध में सार्वजनिक तौर पर उठी आवाज पर पार्टी में हड़कंप मच गया. पार्टी का एक तबका डैमेज कंट्रोल में जुटा और रणदीप सुरजेवाला का तत्काल बयान आया कि राहुल गांधी के बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. फिर थोड़ी देर में कपिल सिब्बल ने ये कहते हुए अपने पुराने ट्वीट को डिलीट कर दिया कि राहुल गांधी से व्‍यक्तिगत तौर पर बात हो गई है. जिस बयान का जिक्र किया वो गलत था, इसलिए ट्वीट भी डिलीट करते हैं.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि कपिल सिबल का ये विरोध सामान्य तो किसी भी तरीके से नहीं कहा जा सकता है. कपिल सिब्बल खांटी कांग्रेसी हैं. कांग्रेस की कार्यशैली और गांधी नेहरू परिवार के वर्चस्व को बेहतर तरीके से समझते हैं. फिर आखिर राहुल गांधी के विरोध में उनका खुला विरोध कैसे? क्या पार्टी के भीतर गांधी नेहरू परिवार को लेकर अब आवाज बुलंद होने लगी है. क्या पार्टी के अंदर गांधी परिवार की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं?

शशि थरूर के घर बनी रणनीति
जानकारों के मुताबिक कांग्रेस में जो बगावत की शुरुआत हुई है, उसकी चिंगारी कांग्रेस सांसद शशि थरूर के घर हुई एक डिनर पार्टी से शुरू हुई. ये डिनर पार्टी तकरीबन 5 महीने पहले शशि थरूर के आवास में हुई थी. सूत्रों के मुताबिक उस डिनर पार्टी में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी, सचिन पायलट, कार्ति चिदम्बरम, मणिशंकर अय्यर मौजूद थे. कहा जा रहा है कि उस बैठक में पार्टी संगठन में आमूल चूल परिवर्तन पर आवाज उठाने का निर्णय लिया गया था.

सूत्रों की मानें तो शशि थरूर के घर हुई डिनर पार्टी में ही संगठन में परिवर्तन पर लिखे लेटर का मजमून तैयार हुआ. कहा जा रहा है कि 23 बड़े नेताओं ने इस लेटर पर दस्तखत करके उसे कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेज दिया कि पार्टी में बदलाव जरूरी है. सूत्रों के मुताबिक लेटर में संगठन के स्तर पर बदलाव करने को कहा गया और कहा गया कि बीजेपी का सामना करने के लिए पार्टी को खड़ा करने की जरूरत है. पत्र में तत्काल इंटीट्यूशनल लीडरशिप मकैनिज्म बनाने की बात की गई है, जो पार्टी का पुनरुद्धार और मार्गदर्शन कर सके. सूत्रों के मुताबिक जिन लोगों ने इस लेटर पर साइन किए हैं, उनमें राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद, पार्टी के सांसद और पूर्व मंत्री आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शशि थरूर, सांसद विवेक तन्खा शामिल हैं.

क्या कांग्रेस संकट के दौर से गुजर रही है
कांग्रेस के अंदर तकरार इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि कांग्रेस एक भारी संकट के दौर से गुजर रही है. 2014 के बाद 2019 में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा है. एक समय देश में सबसे बड़ी पार्टी आज खुद के वजूद की लड़ाई लड़ रही है. संगठन कमजोर होता जा रहा है. पार्टी के अंदर सशक्‍त नेतृत्व की कमी साफ दिखाई दे रही है. पार्टी के भीतर कई ऐसे मौके आये जब नेतृत्व की कमी की वजह से नेताओं की आपसी लड़ाई सामने आई. नेताओ ने पार्टी छोड़ी, यहां तक कि राज्य में सरकार भी गवानी पड़ी. इसका ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं. मध्यप्रदेश में सरकार गई और राजस्थान में जैसे तैसे सरकार बची. लेकिन एक बात जरूर सामने आई कि पार्टी को एकजुट करने में नेतृत्‍व नाकाम दिखा. पार्टी के भीतर यंग गार्ड और ओल्ड गार्ड की बात सामने आने लगीं. कहा जाने लगा कि पार्टी सोनिया गांधी और राहुल गांधी गुट में बंट गई है. कोई राहुल गांधी के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने में लगा है तो कोई सोनिया गांधी के खिलाफ. लेकिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के दौरान पार्टी के अंदर उभरी दरार अंदर की सारी बातों को पब्लिक प्लेटफार्म पर ले आई है.

हालांकि ये बताना लाजिमी है कि ये पहली बार नहीं है कि कांग्रेस के अंदर नेहरू गांधी परिवार के खिलाफ आवाज़ बुलंद हुई हो. कांग्रेस के इतिहास पर ध्यान दें तो जब जब पार्टी अंदर से कमज़ोर हुई है, पार्टी के भीतर से गांधी नेहरू परिवार के खिलाफ आवाज़ उठी है.

गांधी नेहरू परिवार के खिलाफ बगावत का इतिहास
सोनिया गांधी के खिलाफ बगावत
ऐसा नही है कि ये पहली बार गांधी परिवार के खिलाफ बगावत का स्वर बुलंद हुआ है. आपको याद होगा कि 1999 में भी सोनिया गांधी के खिलाफ पार्टी के अंदर बागवत हुई थी. शरद पवार, पीएस संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर सीधे सोनिया गांधी को चुनौती दे डाली थी. परिणाम सबके सामने है. पार्टी का एक बड़ा धड़ा जरूर सोनिया गांधी के साथ खड़ा हो गया था, लेकिन कांग्रेस के इन तीनों नेताओं ने पार्टी तोड़कर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया.

इंदिरा गांधी के विरोध में उठे स्वर
1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को लगभग आधे राज्यों में हार का सामना करना पड़ा था. हार की वजह से पार्टी में आंतरिक संघर्ष बढ़ गया था. इसकी शुरुआत तब हुई जब इंदिरा गांधी ने पांचवें राष्ट्रपति पद के चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ वीवी गिरि को अपना प्रत्याशी बनाया और उन्हें जिता दिया. कई महीनों तक पार्टी में संघर्ष के बाद उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा ने नवम्बर 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से ये कहते हुए निकाल दिया कि इंदिरा पार्टी में व्यक्तिवाद को बढ़ावा दे रही हैं. पार्टी के पुराने नेता जिन्हें उस समय सिंडिकेट कहा जाता था इंदिरा गांधी से बेहद नाराज थे, वे लोग उस समय इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहना शुरू कर दिया था.

इंदिरा को हटाए जाने के बाद कांग्रेस पार्टी की संसदीय बैठक में उनके पक्ष में जबरदस्त सपोर्ट निकलकर सामने आया. नतीजा हुआ कि पार्टी टूट गई लेकिन इंदिरा वामपंथियों और डीएमके की मदद से अपनी सरकार बचाने में सफल रहीं हालांकि 1971 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत के साथ ही इंदिरा गांधी ने पार्टी के अंदर भी जंग जीत ली और उनके नेतृत्व पर मुहर लग गई.

राजीव गांधी के खिलाफ भी उठी आवाज
पार्टी में एक बड़ा भूचाल तब आया जब मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले कांग्रेस के बड़े नेता वीपी सिंह को 1987 में राजीव गांधी ने मंत्रिमंडल से हटा दिया. वीपी सिंह ने इसके पहले केंद्रीय वित्त मंत्री रहते हुए हाई प्रोफाइल बोफोर्स मामले की जांच की निगरानी की थी. वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को चुनौती देने के लिए जनता दल नाम से पार्टी बनाई. इसमें आरिफ मोहम्मद खान भी शामिल हो गए जो शाह बानो केस मामले में पार्टी से नाराज होकर इस्तीफा दे चुके थे. इसके साथ ही वीपी सिंह को राज्य के .बड़े नेताओं जैसे उड़ीसा के बीजू पटनायक और कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े का साथ मिला. 1989 के आम चुनावों में वीपी सिंह ने राजीव गांधी को हरा दिया और बीजेपी के सपोर्ट से प्रधानमंत्री बने.
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