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COVID-19 Vaccine: क्या कोरोना संक्रमण के बाद भी हमें वैक्सीन लगवाने की जरूरत है? जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

प्राकृतिक इम्यूनिटी को लेकर भले ही वैज्ञानिकों में अलग-अलग मत हों लेकिन एक बात को लेकर उनमें सहमति नजर आती है कि जिन्हें संक्रमण नहीं हुआ है उनके लिए जिंदगी के साथ जुआ खेलने से वैक्सीन लगाना एक बेहतर विकल्प होगा.

प्राकृतिक इम्यूनिटी को लेकर भले ही वैज्ञानिकों में अलग-अलग मत हों लेकिन एक बात को लेकर उनमें सहमति नजर आती है कि जिन्हें संक्रमण नहीं हुआ है उनके लिए जिंदगी के साथ जुआ खेलने से वैक्सीन लगाना एक बेहतर विकल्प होगा.

प्राकृतिक इम्यूनिटी को लेकर भले ही वैज्ञानिकों में अलग-अलग मत हों लेकिन एक बात को लेकर उनमें सहमति नजर आती है कि जिन्हे ...अधिक पढ़ें

    नई दिल्ली. जब से कोरोना ने दुनिया में दस्तक दी है, जितना संक्रमितों की संख्या बड़ी है उतनी ही तेजी से विवाद भी पैदा हुए, कुछ लोग आज तक इसे एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी की तरह देख रहे हैं, वहीं वैक्सीन आने के बाद कुछ लोगों का इस पर विश्वास नहीं बन पाया है. इसके अलावा एक सवाल और खड़ा हुआ है कि जिन लोगों को कोविड-19 हो चुका है क्या उन्हें वाकई में वैक्सीन की जरूरत है भी. ये एक उतना ही पेचीदा सवाल है जितना वायरस, जिसके बारे में हम जितना जानने का प्रयास कर रहे है ये उतना ही जटिल होता जा रहा है. कई लोग कोविड से ठीक भी हुए है और हो सकता है कि दूसरी बार वायरस से उनका सामना होने पर वो पूरी तरह से ठीक रहे लेकिन ये सब कुछ इम्यूनिटी के स्थायित्व, उसकी मजबूती और लोगों की उम्र और शुरूआती संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करता है.

    येल विश्वविद्यालय के इम्यूनोलॉजिस्ट अकिको इवासाकी का कहना है कि यही बात किसी भी नैसर्गिक संक्रमण के साथ होती है, आपको वो बहुत कम स्तर पर हो सकती है या बहुत उच्च स्तर पर जा सकती है, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह की बीमारी विकसित हुई है. वही विशेषज्ञों का कहना है कि जिनकी इम्यूनिटी अच्छी है, हो सकता है उनके एक साल तक कुछ नहीं हो लेकिन उन्हें वैक्सीन लगवा लेना चाहिए. वैक्सीन से उनकी इम्यूनिटी और बेहतर होगी और लंबे वक्त तक उन्हें सभी तरह के वैरियंट से सुरक्षा मिलेगी. टोरंटो विश्वविद्यालय की इम्यूनोलॉजिस्ट जेनिफर गॉमरमेन कहती है कि अगर आपको संक्रमण हुआ है और वैक्सीन भी लग गई है तो आपको सुपरपॉवर मिल चुकी है.

    बूस्टर डोज देने की भी तैयारी
    इसी तरह का तर्क टीका लगवाने वाले लोगों को बूस्टर देने को लेकर भी दिया जा रहा है. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटि के इम्यूनोलॉजिस्ट माइकल नुस्सेन्ज़विग का कहना है कि, एक निश्चित अवधि के बाद आपको बूस्टर लगेगा या फिर आप संक्रमित होंगे. संक्रमण से कितनी इम्यूनिटि मिली या वैक्सीन कितनी इम्यूनिटी देती है ये कहना मुश्किल है. इस बात पर कई अध्ययन हो चुके हैं और उनके नतीजे एक विरोधाभास पैदा करते हैं. कुछ का कहना है कि mRNA वैक्सीन ज्यादा एंटीबॉडी उत्पन्न करती है और कोरोना वायरस से होने वाले संक्रमण पर अच्छा काम करती है. वहीं कुछ पहले हुए संक्रमण से उत्पन्न हुई एंटीबॉडी को वैक्सीन की तुलना में ज्यादा कारगर मानते हैं. हालांकि नुज्जेनविग का कहना है कि प्राकृतिक इम्यूनिटी को लेकर किए गए अध्ययन में एक खामी है, इसके लिए जो लोग कोविड से बच गए उन्हीं को ध्यान में रखकर परिभाषा तय की गई है. जबकि प्राकृतिक इम्यूनिटी अनिश्चता का मामला है.

    केवल 85 से 90 फीसद ऐसे लोग जो कोविड पॉजिटिव हुए थे और बीमारी से ठीक हुए थे, शुरूआत में उनमें एंटीबॉडी पता लगाने योग्य थी. मसलन जहां युवाओ में वैक्सीन और संक्रमण से आई इम्यूनिटी में तुलना के योग्य है, जबकि mRNA के दो डोज से 65 साल से ऊपर के लोगों को पहले वाले संक्रमण में सुरक्षा मिली. इवासाकी की टीम ने जो शोध की उसके नतीजे बताते हैं कि गंभीरता बढ़ने के साथ साथ एंटीबॉडी का स्तर भी बढ़ता गया है. ऐसे 43 फीसद लोग जो बीमारी से ठीक हुए उनमें न्यूट्रीलाइंजिंग एंटीबॉडी ( दोबारा संक्रमण को रोकने वाला प्रकार) पता लगाने के स्तर पर नहीं थी. ऐसे 30 फीसद लोग जो बीमारी से ठीक हुए थे उनमें दो महीने के बाद ही एंटीबॉडी पता ना लगने वाले स्तर तक गिर गई थी. वहीं कुछ शोधार्थियों का मानना अलग है. उनका कहना है कि ये बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है, अगर इसे सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने वालों के साथ जोड़ कर देखा जाए तो पता लगाने योग्य एंटीबॉडी का स्तर बड़ा हुआ मिलेगा. उनका तर्क है कि जीवित वायरस के जरिए व्यापक इम्यून रिस्पांस पैदा होगा जो वैक्सीन में एक प्रोटीन एककोड करके लगाने की तुलना में ज्यादा होगा. वायरस नाग और गले की रक्षा प्रणाली को उत्तेजित करेगा, दूसरे संक्रमण में ठीक इसी जगह संक्रमण रोकने की जरूरत होती है. जबकि वैक्सीन मुख्यतौर पर खून में एंटीबॉडी पैदा करता है.

    प्राकृतिक इम्यूनिटी के बारे में सही जानकारी जरूरी
    वायरस के खंड संक्रमण के कई हफ्तों के बाद तक इंसान के शरीर में रह सकते हैं. जिससे इम्यून सिस्टम को लड़ाई की समझ पैदा करने के लिए और वक्त मिल जाता है. जबकि वैक्सीन के जरिए जो प्रोटीन पंहुचाया जाता है वो बहुत जल्दी शरीर से बाहर निकल जाता है. कई अध्ययन अब ये बता रहे हैं कि वायरस के पहले वाले संस्करण से दोबारा संक्रमण होने की आशंका कम होती है. लेकिन सवाल ये है कि ये कब तक सुरक्षा प्रदान कर सकता है क्योंकि ये बात तो तय है कि इससे जिंदगी भर तो सुरक्षा नहीं मिलने वाली है. इस बात को लेकर भी कोई स्पष्ट मत नही है कि संक्रमण के बाद पैदा हुई इम्यूनिटी नए वैरियंट पर कितना काम करेगी. बहुत से अध्ययन डेल्टा वैरियंट के पूरी तरह प्रभाव में आने से पहले खत्म हो चुके थे वहीं हालिया शोध में साफ नहीं है.

    हालांकि डेल्टा वैरियंट के खिलाफ प्राकृतिक इम्यूनिटी के समर्थन में सबसे व्यापक अध्ययन इजराइल में हुआ है, जिसके मुताबिक जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है उनकी तुलना में जिन्हे वैक्सीन लगी है उनमें दोबारा संक्रमण होने की आशंका 13 गुना ज्यादा है. वहीं विशेषज्ञों आगाह करते हुए कहते हैं कि प्राकृतिक इम्यूनिटी के बारे में कुछ भी विचार बनाने से पहले उसेक बारे में ठीक से जानना बेहद ज़रूरी है. विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग कोविड से उभर गए है उनके लिए वैक्सीन अभी भी आदर्श विकल्प है. इससे इम्यूनिटी को एक बेहतरनी बूस्ट मिलेगा और एक करीब करीब ना टूटने वाला इम्यून कवच तैयार होगा. जिससे शायद भविष्य में आने वाले वेरियंट से भी रक्षा हो सके.

    प्राकृतिक सुरक्षा को लेकर भले ही वैज्ञानिकों में अलग अलग मत हों लेकिन एक बात को लेकर उनमें सहमति नजर आती है कि जिन्हें संक्रमण नहीं हुआ है उनके लिए जिंदगी के साथ जुआ खेलने से वैक्सीन लगाना एक बेहतर विकल्प होगा. इवासाकी का कहना है कि कोविड से लोगों में दिल, गुर्दे और दिमागी क्षति हुई है और ये युवाओं में भी देखा गआ है. इसकी वजह से लोग बुरी तरह से थकने लगे हैं और महीनों तक बीमार रहे हैं. किसी को भी प्राकृतिक संक्रमण से इम्यूनिटी हासिल करने का प्रयास नहीं करना चाहिए. ये बहुत ही खतरनाक है.

    Tags: Coronavirus in India, COVID 19, Vaccination in India

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