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बहुत कुछ कहता है पर्यावरण दिवस को लेकर मिश्र का गुस्सा...!

श्रवण शुक्‍ला
Updated: October 15, 2015, 8:15 PM IST
बहुत कुछ कहता है पर्यावरण दिवस को लेकर मिश्र का गुस्सा...!
‘साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन पर्यावरण दिवस सिर्फ एक ही दिन होता है। समाज और सरकार का दुर्भाग्य है कि वो पर्यावरण की चिंता सिर्फ एक ही दिन करते दिखते हैं।

‘साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन पर्यावरण दिवस सिर्फ एक ही दिन होता है। समाज और सरकार का दुर्भाग्य है कि वो पर्यावरण की चिंता सिर्फ एक ही दिन करते दिखते हैं।

  • Last Updated: October 15, 2015, 8:15 PM IST
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नई दिल्ली। ‘साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन पर्यावरण दिवस सिर्फ एक ही दिन होता है। समाज और सरकार का दुर्भाग्य है कि वो पर्यावरण की चिंता सिर्फ एक ही दिन करते दिखते हैं। विकास का दौर चल रहा है और उसकी कीमत प्रकृति चुका रही है। ऐसे में कभी अरावली की खैर नहीं तो कभी हिमालय की खैर नहीं’। प्रख्यात गांधीवादी और पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का ये गुस्सा तब छलका जब विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में उनसे उनकी प्रतिक्रिया मांगी गई।

मिश्र का कहना था कि सरकार को जीडीपी बढ़ानी है। उसके लिए विशाल स्तर पर निर्माण का काम करना है। कहीं नोएडा बन रहा है, तो कहीं उससे भी बड़ा ग्रेटर नोएडा बन रहा है। कहीं गुड़गांव बन रहा है तो कहीं इंद्रप्रस्थ और कहीं उसका भी विस्तार इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन बन रहा है। इस विस्तार में होने वाले हर निर्माण कार्य में रेत लगती है। सीमेंट लगता है। अब ये सीमेंट, रेत कहां से आ रही है। सीमेंट कारखाने से निकलता है, वो भी पत्थर तोड़कर बनता है। लेकिन रेत को बनाने में नदियों को हजारों साल लगते हैं। वो पत्थरों को घिसकर रेत बनाती हैं और किनारों पर छोड़ती हैं। पहले हमारी जरूरतें इतनी नहीं थीं, तसलों में भरकर रेत-मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाते थे, मोहल्ले बस जाते थे, शहर बस जाते थे। अब तो लग रहा है जैसे सृष्टि का नए सिरे से निर्माण हो रहा है। नए नियम गढ़े जा रहे हैं। इसी के चलते रेत माफिया नाम से एक नया शब्द आया है। इसकी वजह से नदियों का रास्ता बदला जा रहा है। जंगल काटे जा रहे हैं।

मिश्र ने कहा कि हमें अपनी तकनीक पर अंधविश्वास हो चला है। हम दिल्ली को पीने का पानी 300 किलोमीटर दूर से लाकर दे रहे हैं। सरकारों का दावा होता है कि हम लोगों को प्यासा नहीं मरने देंगे। ये हो भी रहा है। सरकार सैकड़ों किलोमीटर दूर से पानी लाकर दे रही है। लेकिन शहर के सभी तालाब नष्ट कर दिए गए हैं। 1908 में दिल्ली राजधानी बनी थी, तब दिल्ली में 800 तालाब थे, अब एक भी नहीं है। हमारा भूजल खत्म हो चला है। ऐसे में अगर किसी दिन 300 किलोमीटर दूर भी पानी नहीं रहेगा तो? तो दिल्ली पर कितना बड़ा संकट आ जाएगा। यही संकट गांवों पर आने वाला है।

मिश्र ने कहा कि आज शहर बनते हैं तो सबसे पहले भूजल को नष्ट करने का काम किया जाता है। लेकिन हम लोग 364 दिन सोते रहते हैं और एक दिन, पर्यावरण दिवस पर कहते हैं कि बूंद-बूंद बचाओ। ये डराने की बात नहीं है, चिंता की बात है। इसीलिए आज आप सिर्फ सोचें। कुछ अपने भविष्य के लिए सोचें। जिन्हें काम करना है वो बिना किसी मदद के कर रहे हैं। हम जैसे लोगों ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, लेकिन आम जन और सरकार सिर्फ एक दिन के लिए जागती है।

मिश्र ने कहा कि आज सरकार के पास पर्यावरण मंत्रालय है, लेकिन वो आम लोगों के हित के लिए नहीं, बल्कि बड़े-बड़े प्रोजेक्टों की बाधा दूर करने के लिए है। सरकार सिर्फ पर्यावरण संबंधी नीतियों के नाम पर पर्यावरण का मजाक उड़ा रही है। उसे भविष्य की नहीं, वर्तमान की चिंता है। वो विकास तो कर रही है, लेकिन भविष्य के विनाश को नहीं देख रही। काश उनको भी सदबुद्धि आ जाए।

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First published: June 5, 2015, 7:14 AM IST
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