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संविधान की विकास गाथा: संविधान निर्माताओं में डॉ. आंबेडकर के अलावा और भी हैं...

Sachin kumar Jain | News18Hindi
Updated: February 24, 2020, 2:28 PM IST
संविधान की विकास गाथा: संविधान निर्माताओं में डॉ. आंबेडकर के अलावा और भी हैं...
डॉ. आंबेडकर के अलावा और भी कई लोग शामिल हैं संविधान निर्माण में

जहां तक संविधान निर्माण की पूरी प्रक्रिया का सवाल है, इसमें व्यापक रूप से संविधान सभा के कई सदस्यों ने ऐसी भूमिका निभाई थी, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

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  • Last Updated: February 24, 2020, 2:28 PM IST
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अक्सर हमारे सामने यह तथ्य आता है कि भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीम राव आंबेडकर हैं, लेकिन यह एक अधूरा तथ्य है. डॉ. आंबेडकर ने भारत के संविधान में न्याय, बंधुत्व और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र के भाव को स्थापित करने में केन्द्रीय भूमिका जरूर निभाई थी, किन्तु वे संविधान के अकेले निर्माता या लेखक नहीं थे.

जहां तक संविधान निर्माण की पूरी प्रक्रिया का सवाल है, इसमें व्यापक रूप से संविधान सभा के कई सदस्यों ने ऐसी भूमिका निभाई थी, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. मसलन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पेश किया था, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मूलभूत अधिकारों और अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की सुरक्षा के लिए बनाई गई समिति का समन्वय किया था. आदिवासी समाज के हकों पर जयपाल सिंह ने बहुत अहम भूमिका निभाई, तो वहीं इसे भारतीय दर्शन से जोड़ने में डॉ. एस. राधाकृष्णन की भूमिका बहुत अहम रही.

जनवादी पक्ष को मौलाना हसरत मोहानी ने लगातार स्थापित किया. डॉ. आंबेडकर ने जो सबसे अहम काम किया, वह था समाज के सबसे वंचित तबकों यानी दलितों समाज की मानवीय गरिमा को संविधान के केंद्र में स्थापित कर देना. उन्होंने अपने निजी जीवन में भी जिस तरह की जातिवादी उपेक्षा, छुआछूत, शोषण और हिंसा का सामना किया था, उन्होंने तय कर लिया था कि वे भारत की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था में से अमानवीय मनुवाद को बाहर निकाल फेकेंगे.

डॉ. भीम राव आंबेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता माना जाता है. निःसंदेह उन्होंने समानुभूति के साथ संविधान को रूप, आकार, स्वरूप, चरित्र प्रदान किया. लेकिन वास्तविकता यह है कि संविधान के निर्माण में केवल डॉ. भीम राव आंबेडकर की ही भूमिका नहीं थी. भारत का संविधान एक साझा पहल का नतीजा है. 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने मसौदा (प्रारूप) समिति के गठन का निर्णय लिया. इस समिति की भूमिका के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा गया कि "परिषद् (संविधान सभा) में किए गए निर्णयों को प्रभाव देने के लिए वैधानिक परामर्शदाता (बी एन राव) द्वारा तैयार किए गए भारत के विधान (संविधान) के मूल विषय की जांच करना, उन सभी विषयों के जो उसके लिए सहायक हैं या जिनकी ऐसे विधान में व्यवस्था करनी है और कमेटी द्वारा पुनरावलोकन किए हुए विधान के मसौदे के मूल रूप को परिषद् के समक्ष विचारार्थ उपस्थित करना."



यह भी एक सच है कि डॉ. आंबेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में संविधान का अंतिम मसौदा प्रस्तुत करते हुए जो कहा, उसे भारत ने भुला दिया है. उन्होंने कहा था कि “जो श्रेय मुझे दिया जाता है, उसका वास्तव में मैं अधिकारी नहीं हूं. उसके अधिकारी बी एन राव हैं, जो इस संविधान के संवैधानिक परामर्शदाता है. और जिन्होंने मसौदा समिति के विचारार्थ संविधान का एक मोटे रूप में मसौदा बनाया. कुछ श्रेय मसौदा समिति के सदस्यों को भी मिलना चाहिए, जिन्होंने 141 दिन तक बैठकें कीं और उनके नए सूत्र खोजने के कौशल के बिना तथा विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रति सहनशील तथा विचारपूर्ण सामर्थ्य के बिना इस संविधान को बनाने का कार्य इतनी सफलता के साथ समाप्त न हो पाता.

सबसे अधिक श्रेय इस संविधान के मुख्य मसौदा लेखक एस.एन. मुखर्जी को है, बहुत ही जटिल प्रस्थापनाओं को सरल से सरल तथा स्पष्ट से स्पष्ट वैध भाषा में रखने की उनकी योग्यता की बराबरी कठिनाई से की जा सकती है. इस सभा के लिए वे एक देन स्वरूप थे. उनकी सहायता न मिलती तो इस संविधान को अंतिम स्वरूप देने में इस सभा को कई और वर्ष लगते.

यदि यह संविधान सभा विभिन्न विचार वाले व्यक्तियों का एक समुदाय मात्र होती, एक उखड़े हुए फर्श के समान होती, जिसमें हर व्यक्ति या हर समुदाय अपने को विधिवेत्ता समझता तो मसौदा समिति का कार्य बहुत कठिन हो जाता. तब यहां सिवाए उपद्रव के कुछ नहीं होता. सभा में कांग्रेस पक्ष की उपस्थिति ने इस उपद्रव की संभावना को पूरी तरह से मिटा दिया. इसके कारण कार्यवाहियों में व्यवस्था और अनुशासन दोनों बने रहे. कांग्रेस पक्ष के अनुशासन के कारण ही मसौदा समिति यह निश्चित रूप में जानकर कि प्रत्येक अनुच्छेद और प्रत्येक संशोधन का क्या भाग्य होगा, इस संविधान का संचालन कर सकी. अतः इस सभा में संविधान के मसौदे के शांत संचालन के लिए कांग्रेस पक्ष ही श्रेय की अधिकारी है.

यदि इस पक्ष के अनुशासन को सब लोग मान लेते तो संविधान सभा की कार्यवाही बड़ी नीरस हो जाती. यदि पक्ष के अनुशासन का कठोरता से पालन किया जाता तो यह सभा "जी हुज़ूरों" की सभा बन जाती. सौभाग्यवश कुछ द्रोही थे. श्री कामत, डॉ. पी.एस. देशमुख, श्री सिधावा, प्रो. सक्सेना और पंडित ठाकुर दास भार्गव थे. इनके साथ-साथ मुझे प्रो. के.टी. शाह और पंडित हृदयनाथ कुंजरू का भी उल्लेख करना चाहिए. जो प्रश्न उन्होंने उठाए, वे बड़े सिद्धान्तपूर्ण थे. मैं उनका कृतज्ञ हूं. यदि वे न होते तो मुझे वह अवसर नहीं मिलता, जो मुझे इस संविधान में निहित सिद्धांतों की व्याख्या करने के लिए मिला और जो इस संविधान के पारित करने के यंत्रवत कार्य की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण था."

चूंकि भारतीय संविधान के बारे में यह कहा जाता है कि यह ब्रिटिश उपनिवेशवादी व्यवस्था के तहत बनाए गए भारत शासन अधिनियम (1935) की प्रतिलिपि है. इसके लिए डॉ. भीम राव आंबेडकर की सभा में खूब आलोचना भी हुई. इस विषय में पंडित बाल कृष्ण शर्मा ने कहा कि इस विषय पर जो कुछ मैं कह सकता हूं, वह यह कि मसौदा समिति, डॉ. आंबेडकर और उन सबके लिए जिन्होंने डॉ. आंबेडकर का साथ दिया, यह गौरव की बात है कि वे संकीर्णता की किसी भी भावना से प्रेरित नहीं हुए. आखिर हम एक संविधान बना रहे हैं. हमारे सामने आधुनिक प्रवृत्तियां, आधुनिक कठिनाइयां और आधुनिक समस्याएं हैं. अपने संविधान में हमें इन सबके लिए उपबंध करना हैं और इस कार्य के लिए यदि हमने भारत शासन अधिनियम का सहारा लिया, तो हमने कोई पाप नहीं किया है."

संविधान सभा में संविधान पर चार चरणों में काम हुआ था.

पहला चरण - सबसे पहले संविधान के लक्ष्य सम्बन्धी प्रस्ताव पर चर्चा-बहस और स्वीकार किया जाना. और इसके साथ ही नियम निर्माण समिति और सभा संचालन समिति का गठन. 22 जनवरी 1947 को आठ लक्ष्यों को संविधान सभा ने स्वीकार किया, जिन्हें हासिल करने के लिए संविधान बनाया जाना था.

दूसरा चरण - संविधान सभा द्वारा विभिन्न विषयों (मूलभूत और अल्पसंख्यकों के अधिकार, संघ की शक्तियां, प्रांतीय और संघ अधिकार समिति आदि) पर प्रारूप और प्रावधानों के प्रतिवेदन बनाने के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया जाना. संघ शक्ति समिति में नौ सदस्य थे, इसके अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे. कार्य संचालन समिति में तीन सदस्य थे और इसके अध्यक्ष थे डॉ. कन्हैया माणिकलाल मुंशी, प्रांतीय विधान समिति में 25 सदस्य थे और अध्यक्ष थे सरदार वल्लभ भाई पटेल, संघ विधान समिति में 15 सदस्य थे और इसके अध्यक्ष थे पंडित जवाहरलाल नेहरू. इन समितियों की रिपोर्ट्स संविधान सभा में प्रस्तुत की गई और उन पर खूब बहस हुई. इन समितियों के प्रतिवेदनों को संविधान सभा के सलाहकार बी.एन. राव ने समग्र स्वरूप देते हुए संविधान का पहला प्रारूप तैयार किया. इस प्रारूप की समीक्षा के लिए सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी.

तीसरा चरण - 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) का गठन किया, जिसके अध्यक्ष डॉ. भीम राव आंबेडकर बनाए गए. इस समिति ने बी एन राव द्वारा तैयार किये गए ड्राफ्ट कर काम किया.

चौथा चरण - फ़रवरी 1948 में इस प्रारूप समिति ने अपना मसौदा प्रकाशित किया. सभा के सदस्यों को लगभग आठ माह तक इस प्रारूप के अध्ययन का मौका मिला. इसके बाद नवम्बर 1948 से 17 अक्टूबर 1949 तक कई बैठकों में इस प्रारूप पर खंडवार चर्चा हुई. तीसरे और अंतिम प्रारूप पर चर्चा 14 नवम्बर 1949 को शुरू हुई और 26 नवम्बर 1949 को संविधान को पारित कर दिया गया. सघन बहस में पेश किए गए सुझावों पर विचार करते हुए संविधान के मसौदे को अंतिम रूप दिया गया. यह काम डॉ. भीम राव आंबेडकर के नेतृत्व में हुआ. इस तरह संविधान सभा में तीन स्तरों पर संविधान पर बहस हुई.

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवम्बर 1949 को, यानी उस दिन, जब संविधान आत्मार्पित किया गया, सभा की कार्यवाही का समापन करते हुए कहा कि "संविधान के संबंध में जिस रीति को अपनाया, वह यह थी कि सबसे पहले "विचारणीय बातें" निर्धारित की, जो लक्ष्य मूलक संकल्प के रूप में थी, जिसके ओजस्वी भाषण द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया था और जो अब हमारे संविधान की प्रस्तावना है. इसके बाद संविधानिक समस्याओं के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए कई समितियां नियुक्त की गईं.

इनमें से कई समितियों के सभापति या तो पंडित जवाहरलाल नेहरू होते थे या सरदार पटेल. अतः इस प्रकार हमारे संविधान की मूलभूत बातों का श्रेय इन्हीं को है. मुझे केवल यह कहना है कि इन सब समितियों ने उचित और ठीक रीति से कार्य किया और अपने-अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत किए, जिन पर सभा ने विचार किया और उनकी सिफारिशों को उन आधारों के रूप में ग्रहण किया, जिन पर संविधान का मसौदा तैयार किया गया.

यह कार्य बी एन राव ने किया, जिन्होंने अपने इस कार्य में अन्य देशों के संविधानों के पूर्ण ज्ञान और इस देश की दशा के व्यापक ज्ञान तथा अपने प्रशासनिक ज्ञान का भी पुट दिया. इसके बाद सभा ने मसौदा समिति नियुक्त की, जिसने बी एन राव द्वारा निर्मित मूल मसौदे पर विचार किया और संविधान का मसौदा बनाया. जिस पर द्वितीय पठन की स्थिति में इस सभा ने विस्तार पूर्वक विचार किया. जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने बताया था कि 7635 से कम संशोधन प्रस्ताव नहीं थे. जिनमें से 2473 संशोधन पेश किए गए. मैं केवल यह सिद्ध करने के लिए कह रहा हूं कि केवल मसौदा समिति के सदस्य ही इस संविधान पर दत्तचित्त होकर अपना ध्यान नहीं दे रहे थे, वरन अन्य सदस्य भी सचेत थे और मसौदे की पूर्णरूप से जांच परख कर रहे थे. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मसौदे में केवल प्रत्येक अनुच्छेद पर ही नहीं वरन लगभग प्रत्येक वाक्य और कभी कभी तो प्रत्येक अनुच्छेद के प्रत्येक शब्द पर हमें विचार करना पड़ा".

भारत का संविधान एक साझा, प्रतिबद्ध और मूल्य आधारित प्रक्रिया से निर्मित विधान है. इसमें विचारों, समुदायों और संस्कृतियों के साथ-साथ विविध राजनीतिक धाराओं की सक्रिय भागीदारी रही है. यह संविधान केवल राज्य व्यवस्था के नियम ही निर्धारित नहीं करता है, बल्कि व्यक्तियों की सामजिक, राजनीतिक, आर्थिक आज़ादी की व्याख्या भी करता है. ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि यह एक सहभागी और सहिष्णु प्रक्रिया के साथ बनाया गया संविधान था.

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First published: February 24, 2020, 2:23 PM IST
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