नीरव मोदी, माल्या और चोकसी ही नहीं, भारत को है इन 300 भगोड़ों की तलाश

भगोड़े विजय माल्या और नीरव मोदी पर ब्रिटेन में चल रहा है प्रत्यर्पण का केस. मेहुल  चोकसी डोमिनिका में गिरफ्तार हुआ है. (फाइल फोटो)

भगोड़े विजय माल्या और नीरव मोदी पर ब्रिटेन में चल रहा है प्रत्यर्पण का केस. मेहुल चोकसी डोमिनिका में गिरफ्तार हुआ है. (फाइल फोटो)

साल 2002 से भारत अब तक 75 से भी कम भगोड़ों (Fugitives) का प्रत्यर्पण (Extradition) कर पाया है. अभी भी 300 भगोड़ों की उसे तलाश है. हालांकि भारत की 47 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि और 11 देशों के साथ प्रत्यर्पण व्यवस्था है.

  • Share this:

नई दिल्ली. भगोड़े कारोबारी मेहुल चोकसी (Mehul Choksi) की डोमिनिका में गिरफ्तारी के बाद उसके प्रत्यर्पण को लेकर सरकार के प्रयास जारी हैं. लेकिन प्रत्यर्पण के ऐसे मामलों में कई बातें मायने रखती हैं जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून, घरेलू कानून, राजनीति और कूटनीति. दो संप्रभु राष्ट्रों के हितों में टकराव अक्सर प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को पेचीदा बना देते हैं. एक तरफ जिस देश में अपराध हुआ है, उस देश की कोशिश होती है कि भगोड़े व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई कर पीड़ित को न्याय दिया जा सके, वहीं आरोपी जिस देश की जमीन पर है, उसकी सरकार, अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कानून के तहत व्यक्ति का प्रत्यर्पण नहीं कर सकती ताकि मानवाधिकार उल्लंघन को रोका जा सके.

यही वजह है कि साल 2002 से भारत अब तक 75 से भी कम भगोड़ों का प्रत्यर्पण कर पाया है. अभी भी 300 भगोड़ों की उसे तलाश है. हालांकि भारत की 47 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि और 11 देशों के साथ प्रत्यर्पण व्यवस्था है. हालांकि प्रत्यर्पण एक लंबी प्रक्रिया है  जिसमें भारतीय एजेंसियों को विदेशी सरकार, विदेशी कोर्ट और जरूरत पड़े तो इंटरपोल के साथ सामंजस्य बैठाना होता है.

Youtube Video

इस बीच भारत के जेलों की हालत भी प्रत्यर्पण में बड़ी रुकावट हैं. ज्यादातर जेल अपनी क्षमता से ज्यादा भरी हुई हैं. यही नहीं हिरासत में होने वाली मौत के अलावा खराब मेडिकल सुविधा और गंदगी भी अक्सर मौत की वजह बन जाती हैं.
1993 में हुई संधि के बावजूद यूके की अदालत आसानी से प्रत्यर्पण नहीं होने देती

यही वजह है कि भारत और यूके के बीच 1993 में हुई प्रत्यर्पण संधि के बावजूद यूके की अदालत आसानी से प्रत्यर्पण नहीं होने देती. खराब मेडिकल सुविधा के बीच भीड़भाड़ वाली जेल में किसी को रखना यूके के मानवाधिकार कानून 1988 और प्रत्यर्पण कानून 2003 के खिलाफ है. गोवा में 150 बच्चों के साथ यौन शोषण करने वाला ब्रिटिश नागरिक रेमंड वार्ले भी प्रत्यर्पण से बच रहा है क्योंकि उसका आरोप है कि गोवा की जेल की हालत उसकी जान के लिए खतरा है.

इसके बाद यूके से दो एक्सपर्ट्स गोवा की जेल के हालात का निरिक्षण करने आए. इसकी वजह से प्रक्रिया में और देरी हो गई और कोर्ट ने रेमंड को डिमेंशिया से पीड़ित होने की वजह से उसका प्रत्यर्पण रोक दिया. इसी तरह ही विजय माल्या और नीरव मोदी ने भी भारतीय जेलों की बुरी स्थिति का हवाला देते हुए यूके की अदालत से प्रत्यर्पण रोकने की गुजारिश की है. भारतीय सरकार को आर्थर रोड जेल का नवीनीकरण करना पड़ा, जिससे भारतीय जेल में अमानवीय हाल नहीं होने का यूके की अदालत को भरोसा दिलाया जा सके. इस तरह की मांग करके भगोड़े प्रत्यर्पण की प्रक्रिया में लगातार देरी करवाते हैं.



भारत में उचित न्याय नहीं मिलने के झूठे दावे

भगोड़े इस बात का दावा करके कि भारत में उनके साथ उचित न्याय नहीं किया जाएगा और उन्हें सजा दी जाएगी, अपने प्रत्यर्पण को रोकने का प्रयास करते हैं. नीरव मोदी और विजय माल्या कोर्ट में बहस से पहले ही खुद को मीडिया ट्रायल का पीड़ित घोषित कर चुके हैं. उनका दावा था कि भारत सरकार उन्हें कई एजेंसियों के जरिए तंग कर रही है.

नीरव मोदी ने तो एक कदम आगे बढ़ते कि ये तक कह दिया कि भारत की न्यायिक व्यवस्था अब स्वतंत्र नहीं रह गई है. सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज काटजू ने विशेष गवाह के तौर पर नीरव मोदी का समर्थन किया था, हालांकि इस दावे को यूके की वेस्टमिनिस्टर मजिस्ट्रेट अदालत ने खारिज कर दिया था.

नदीम सैफी का केस

नदीम सैफी ने तो अपने प्रत्यर्पण को रोकने के लिए अदालत को ये मानने को मजबूर कर दिया कि ‘आरोप सही मंशा से नहीं लगाए गए थे और न्याय के हित में नहीं थे.’ दिलचस्प बात ये है कि भारत-यूके प्रत्यर्पण संधि में इस तर्क को प्रत्यर्पण रोकने में एक मजबूत आधार माना जाता है.

भारत ने कुछ प्रत्यर्पण के मामलों में सफलता भी हासिल की, जिसमें अबु सलेम और रवि पुजारी का मामला शामिल है. दोनों ही मामलों में इंटरपोल की मदद ली गई थी. अबु सलेम के मामले में भारत ने पुर्तगाल को ये भरोसा दिलाया कि सलेम को मौत की सजा नहीं दी जाएगी. क्योंकि ईसीएचआर के तहत पुर्तगाल इस बात को लेकर बाध्य था कि किसी भी भगोड़े को प्रत्यर्पण के बाद मौत की सजा न दी जाए.

रवि पुजारी मामले में भगोड़े को सेनेगल से लाने में भारत की एजेंसी को बहुत मेहनत करनी पड़ी थी क्योंकि उसने ये दावा प्रस्तुत कर दिया था कि भारत जिसे ढूंढ रही है, वह शख्स वो नहीं है. उसके प्रत्यर्पण में इसलिये देरी हुई क्योंकि सेनेगल की अदालत से पहले उस पर धोखाधड़ी का मामला चल रहा था.

मेहुल चोकसी ने अपनाया एंटिगा का रास्ता

मेहुल चोकसी ने प्रत्यर्पण से बचने के लिए एंटिगा की राह पकड़ी थी. उसने निवेश वाले तरीके से खुद के लिए नागरिकता जुगाड़ी, और बाद में एंटीगुअन अदालत में अपने प्रत्यर्पण को रोकने की गुजारिश की. वहीं भारत डोमिनिकन अदालत से उसकी गिरफ्तारी की मांग में जुटा हुआ था, उसके काउंसिल ने ये तर्क रखा कि उसके क्लाइंट को एंटीगा भेजा जाना चाहिए क्योंकि वो वहां का नागरिक है.

जब कोई ऐसे देश में पकड़ा जाता है जो ना तो उसका गृह देश हो ना ही वो देश जहां अपराध हुआ है, ऐसे में भगोड़ों के लिए ये अथॉरिटी से खुद को अपने देश भेजने की गुजारिश करना सामान्य बात है. मसलन रेमंड वार्ले थाइलैंड में गिरफ्तार हुआ था लेकिन उसे भारत की जगह ब्रिटेन भेजा गया था.

भारत को ये समझना होगा कि अकेले कूटनीति की दम पर भारत भगोड़ों के प्रत्यर्पण के रिकॉर्ड को ठीक नहीं कर पाएगा. कूटनीति विदेशी सरकार के जरिये खड़ी की गई बाधाओं को तो हटा सकती है लेकिन उसकी विदेशी अदालत में प्रत्यर्पण की सुनवाई में बहुत छोटी भूमिका होती है. हमारा ध्यान भारतीय एजेंसी और कानून के इस लचीलेपन पर होना चाहिए जिसका फायदा उठा कर अपराधी बाहर भागने में कामयाब हो जाता है.

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज