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कुर्मी वोट के लिए जिंदगीभर संघर्ष करते रहे सोनेलाल पटेल; बेटी अनुप्रिया सत्ता तो पत्नी विपक्ष की प्रमुख साथी

कुर्मी वोट के लिए जिंदगीभर संघर्ष करते रहे सोनेलाल पटेल; बेटी अनुप्रिया सत्ता तो पत्नी विपक्ष की प्रमुख साथी

अपना दल की विरासत

अपना दल की विरासत

साल 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव (Assebmly election 2022) में सोनेलाल पटेल (Sonelal Patel) की विरासत पर नई जंग छिड़ी है. अनुप्रिया पटेल (Anupriya Patel) का गुट जहां बीजेपी के साथ गठबंधन में है तो कृष्णा पटेल (Krishna Patel) गुट समाजवादी पार्टी के साथ.

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Apna Dal/Kurmi Vote/Sonelal Patel Dynasty: साइंस का एक प्रतिभाशाली स्टूडेंट इमरजेंसी के दौर में हुए छात्र आंदोलन का हिस्सा बनता है और अपने गांव से समाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत करता है. पहले चौधरी चरण सिंह और फिर कांशीराम के साथ जुड़ता है, लेकिन लक्ष्य बनाता है, ‘यूपी की राजनीति में कुर्मी जाति को व्यापक प्रतिनिधित्व दिलाना’. 10 साल वह दूसरी पार्टियों के साथ तो 14 साल वह अपनी पार्टी बनाकर संघर्ष करता है, लेकिन एक चुनाव नहीं जीत पाता है. इस बीच एक रोड एक्सीडेंट में उसकी मौत हो जाती है. पार्टी की जिम्मेदारी उसकी पत्नी और तीसरे नंबर की बेटी उठा लेती है. बेटी चुनाव में उतरती है. पहले विधायक, फिर सांसद, फिर केंद्र में मंत्री बन जाती है. लेकिन, यहां से परिवार में एक टूट पड़ती है. बेटी और मां आमने-सामने हो जाती हैं. अब साल 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों ही गुट अलग तरह का मोर्चा खोले हुए है.

फिजिक्स से एमएमसी टॉपर और डॉक्टरेट छात्र सोनेलाल पटेल को पहले चौधरी चरण सिंह प्रभावित करते हैं और उसके बाद उसे समाजिक न्याय की बात समझ में आती है. दौर था साल 1970-80 का. छात्र आंदोलनों के दौरान ही उसे प्रदेश की राजनीति का एक कैलकुलेशन समझ में आता है. जिसका रिफरेंस उसे साल 1954 की जाति जनगणना से मिलता है. ये कि प्रदेश में करीब 6 फीसदी कुर्मी हैं, लेकिन राजनैतिक तौर पर हाशिए पर हैं.

सोनेलाल पटेल

तब तक सोनेलाल पटेल डॉ. सोनेलाल पटेल हो गए थे और लोग उन्हें ‘डॉक्टर साहब’ के नाम से पुकारने लगे थे. कुर्मी जाति के लोगों के पास जमीनें ठीक-ठाक थीं. व्यापार ठीक था. लेकिन, राजनैतिक प्रतिनिधित्व तुलना में कम था. ऐसे में सोनेलाल पटेल कुर्मी महासभा से जुड़ गए. और इसके प्रदेश अध्यक्ष हो गए.

सोनेलाल पटेल कागजी पदाधिकारी नहीं थे. वह प्रदेश भर में घूम-घूमकर कुर्मियों-किसानों को एकजूट करने लगे. इसी बीच उनकी मुलाकात कांशीराम से हुई और वह सक्रिय राजनीति में आ गए. कांशीराम ने सोनेलाल पटेल को यूपी बसपा का महासचिव बना दिया. यहां से सोनेलाल पटेल ने प्रदेश में दलितों, कुर्मी-किसानों को एकजुट करने का प्रयास किया. लेकिन, साल 1995 में मायावती के मुख्यमंत्री बनने और फिर सरकार के गिरने के बाद उन्होंने बसपा से किनारा कर लिया और अपनी पार्टी ‘अपना दल’ की नींव रख दी.

सोनेलाल पटेल साइंस के स्टूडेंट रहे. वह राजनीति का भी साइंस कितना समझते थे, इसे आप अपना दल के झंडे से समझ सकते हैं. जिस समय अपना दल बना वह दौर एक तरफ राम मंदिर आंदोलन का था तो दूसरी तरफ मायावती तमाम अंबेडकरवादियों को इकट्ठा कर रही थीं. ऐसे में सोनेलाल ने भगवा और नीले दो रंगों के साथ अपनी पार्टी का झंडा बनाया.

अपना दल के गठन के बाद सोनेलाल पटेल का नया संघर्ष शुरू हुआ. उनका ऐसा दावा था कि यूपी के 16 जिलों में कुर्मी चुनावी रिजल्ट को बदल सकने की जनसंख्या में रहते हैं. इसमें मिर्जापुर, सोनभद्र, संतकबीर नगर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, बलरामपुर, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, कौशांबी, प्रतापगढ़, फतेहपुर, उन्नाव, जालौन और बरेली हैं. उनका कहना था कि इन जिलों में करीब 11% कुर्मी वोट बैंक है. इनके सरनेम पटेल, वर्मा, सचान, गंगवार, कटियार और निरंजन हैं.

apna dal
सोनेलाल पटेल

यहां से सोनेलाल पटेल ने पूरे प्रदेश में लगातार पार्टी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश की. साल 2002 में उनकी पार्टी से डॉन अतीक अहमद विधानसभा पहुंचे, लेकिन इस जीत को अपना दल की जीत न मानते हुए अतीक अहमद की जीत कहा गया. सोनेलाल पटेल खुद कोई चुनाव जीत नहीं पा रहे थे. लेकिन, वह लगातार पार्टी का विस्तार करने की कोशिश कर रहे थे. इस बीच 14 साल से अपना दल के लिए संघर्ष कर रहे सोनेलाल पटेल की एक रोड एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई और यहां से अपना दल के भविष्य को लेकर एक सवाल खड़ा हुआ.

सोनेलाल पटेल की पत्नी कृष्णा पटेल अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गईं. लेकिन, वह संगठन को वह धार नहीं दे पा रही थीं, जो सोनेलाल दिया करते थे. सोनेलाल पटेल के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटियां पल्लवी पटेल, पारुल पटेल, अनुप्रिया पटेल और अमन पटेल हैं, जिसमें तीसरे नंबर की बेटी अनुप्रिया पटेल उनके साथ राजनैतिक तौर पर भी जुड़ी रहीं. वह लेडी श्री राम कॉलेज से पढ़ी हैं और वह कॉलेज के दिनों से ही कार्यक्रमों में भाग लेकर पिछड़ों के हित में आवाज बुलंद करती रही हैं.

anupriya patel
अनुप्रिया पटेल

सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद कृष्णा पटेल के साथ राजनैतिक तौर पर अनुप्रिया ही एक्टिव रहीं. इस बीच साल 2012 के विधानसभा चुनाव में अपना दल और बीजेपी का गठबंधन हो गया. यहां से पार्टी को संजीवनी मिल गई. अनुप्रिया पटले वाराणसी की रोहनिया सीट से विधानसभा चुनाव जीत गईं. 14 साल अपना दल के लिए संघर्ष करने वाले सोनेलाल पटेल एक चुनाव नहीं जीत पाए थे, लेकिन अनुप्रिया पहला चुनाव ही जीत गईं.

साल 2014 का चुनाव और अपना दल की बढ़ती हैसियत
साल 2014 के चुनाव में अपना दल बीजेपी गठबंधन के साथ मैदान में उतरी. दो सीट मिली और दोनों पर उसे जीत मिल गई. मिर्जापुर से अनुप्रिया संसद में पहुंची तो प्रतापगढ़ से हरिवंश सिंह. इसके बाद विश्वनाथगंज विधानसभा उपचुनाव में राकेश वर्मा जीत गए. अनुप्रिया पटेल केंद्र में मंत्री भी बन गईं. इससे पार्टी की हैसियत काफी बढ़ गई. हालांकि, यहीं से पार्टी में दरार भी आनी शुरू हो गई.

रोहनिया उपचुनाव और अपना दल में दरार
अनुप्रिया पटले ने साल 2009 में आशीष सिंह से शादी की थी. आशीष पॉलिटिकली काफी एक्टिव हैं. जब साल 2014 में अनुप्रिया सांसद बनीं तो वह चाहती थीं कि रोहनिया विधानसभा की सीट पर अब उनके पति आशीष सिंह लड़ें. लेकिन, उनकी मां और पार्टी की अध्यक्ष कृष्णा पटेल चाहती थीं कि वह खुद लड़ें. इससे दोनों के बीच में तकरार शुरू हुआ. अंत में कृष्णा पटेल ही चुनाव लड़ीं.

krishna patel
कृष्णा पटेल

कृष्णा पटले विधानसभा उपचुनाव में अकेली पड़ गईं. अनुप्रिया उनका प्रचार करने नहीं आईं. अनुप्रिया के दूरी बनाने के बाद पार्टी के कार्यकर्ता भी उस उत्साह से नहीं लगें, लिहाजा कृष्णा पटेल ये चुनाव हार गईं. यहां से पार्टी में दरार आ गई.

कृष्णा पटले ने अनुप्रिया को पार्टी से निकाला
चुनाव हारने के बाद पार्टी की राष्ट्री अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने 7 मई 2015 को पार्टी महासचिव अनुप्रिया सहित 7 नेताओं को पार्टी से निकाल दिया. अनुप्रिया ने दावा किया कि पार्टी उनकी है. बाद में पार्टी दो हिस्सों में टूट गई. अनुप्रिया ने अपना दल (सोनेलाल) बना लिया तो कृष्णा पटेल ने अपना दल (कमेरावादी) बना ली.

साल 2022 का इलेक्शन और सोनेलाल की विरासत
साल 2022 के चुनाव में सोनेलाल पटेल की विरासत पर नई जंग छिड़ी है. अनुप्रिया पटेल का गुट जहां बीजेपी के साथ गठबंधन में है तो कृष्णा पटेल गुट समाजवादी पार्टी के साथ. कृष्णा पटेल अपनी बड़ी बेटी पल्लवी पटेल को भी राजनीति में एक्टिव की हैं और वह भी इस बार विधानसभा का चुनाव लड़ रही हैं. दोनों गुटों का दावा है कि मौजूदा समय में प्रदेश में करीब 11 से 12 फीसदी कुर्मी वोट बैंक है और ये उनके साथ है. ऐसे में ये चुनाव ये भी तय करेगा कि सोनेलाल ने जो 1 साल संघर्ष किया, उनके कार्यकर्ता किस गुट के साथ खड़े रहते हैं.

Tags: Apna Dal, Apna Dal BJP Alliance, Krishna patel, Sonelal Patel Family, Uttar Pradesh Assembly Election 2022

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