दोस्त अरुण से दिल का रिश्ता था मोदी का

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की दोस्ती चार दशक से भी अधिक पुरानी थी. ये दोस्ती महज सियासी नहीं थी, बल्कि दिल की गहराइयों से थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की दोस्ती चार दशक से भी अधिक पुरानी थी. ये दोस्ती महज सियासी नहीं थी, बल्कि दिल की गहराइयों से थी.

आज मेरा दोस्त अरुण चला गया, बहरीन की धरती पर प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल जब ये बात कही तो उनका गला रुंध गया था, आंखों में आंसू आ गये थे.

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  • Last Updated: August 25, 2019, 5:04 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की दोस्ती चार दशक से भी अधिक पुरानी थी. ये दोस्ती महज सियासी नहीं थी, बल्कि दिल की गहराइयों से थी. जेटली वो अकेले दोस्त थे, जिनसे मोदी अपना सारा दुख-दर्द बयान कर सकते थे और हर कठिन परिस्थिति में जिन पर भरोसा कर सकते थे. मोदी के लिए जेटली का जाना एक ऐसा घाव है, जो भर नहीं सकता, क्योंकि जेटली की जगह कोई और नहीं ले सकता.

आज मेरा दोस्त अरुण चला गया, बहरीन की धरती पर प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल जब ये बात कही तो उनका गला रुंध गया था, आंखों में आंसू आ गये थे. कार्यक्रम के बाद अकेले में बैठकर मोदी रोए भी होंगे, क्योंकि अरुण जेटली का जाना उनके लिए बड़ा आघात है, जिसे समझना सबके लिए आसान नहीं.

मोदी और जेटली की पारिवारिक और आर्थिक पृष्ठभूमि एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी, खान-पान का तरीका अलग था, लेकिन दोस्ती इतनी प्रगाढ़ कि चार दशक बाद भी उसमें कोई सेंध नहीं लगा पाया था, जबकि सियासत के मैदान में इसकी गुंजाइश काफी अधिक रहती थी. मोदी के लिए निजी बातचीत में जेटली अरुण थे, तो सार्वजनिक मंच पर अरुण जी, वही जेटली के लिए मोदी पर्दे के पीछे नरेंद्रभाई थे, तो सार्वजनिक तौर पर अमूमन मोदी जी या फिर बाद के दिनों में प्रधानमंत्री जी.



आपातकाल के तुरंत बाद हो गई थी दोस्ती की शुरुआत
मोदी और जेटली की दोस्ती की शुरुआत आपातकाल के तुरंत बाद हो गई थी, जब दोनों ने एक-दूसरे को जानना शुरु किया था. आपातकाल के दौरान जेटली जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ नेता के तौर पर 19 महीने जेल में रहे थे, तो मोदी भूमिगत होकर आपातकाल का विरोध करते रहे थे, वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओ के बीच सेतु का काम करते हुए. आपातकाल के समाप्त होने के तुरंत बाद मोदी कुछ समय के लिए दिल्ली आए थे, आपातकाल पर किताब लिखने के लिए दिल्ली के दीनदयाल शोध संस्थान से जुड़े थे. इसी दौरान अपने गुरु और संघ के वरिष्ठ नेता लक्ष्मणराव ईनामदार उर्फ वकील साहब और दत्तोपंत ठेंगणी की प्रेरणा से दिल्ली यूनिवर्सिटी से एक्सटर्नल छात्र के तौर पर बीए की परीक्षा दी थी और पास भी हुए थे. जेटली के राजनीतिक जीवन की शुरुआत तो डीयू में छात्र राजनीति से ही हुई थी. ऐसे में दोनों एक-दूसरे के करीब आए.

Arun Jaitley

बाद के दिनों में, 1978 के बाद मोदी एक बार फिर से गुजरात चले गये और संघ कार्य में लग गये. उधर जेटली दिल्ली में छात्र राजनीति के बाद कानून की अपनी प्रैक्टिस में लग गये और बड़ी जल्दी नाम कमाया एक कुशल वकील के तौर पर. मोदी भी संघ के बाद 1987 में बीजेपी में आए, गुजरात बीजेपी के महामंत्री के तौर पर. इसके साथ ही मोदी बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने, उधर जेटली भी 1991 में कार्यकारिणी के सदस्य बन चुके थे. उससे पहले वीपी सिंह की सरकार के दौरान जेटली 1989-90 में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रह चुके थे, जो सरकार बीजेपी के बाहरी समर्थन से सत्ता में आई थी.

पसंद अलग-अलग फिर भी एक-दूसरे से गहरा प्रेम
1991 के बाद बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जब भी बैठक हुई, मोदी और जेटली हमेशा एक कमरे में रहा करते थे. पार्टी के अलावा घंटों पुस्तकों पर बात होती थी, समाज के विषय में बात होती थी, तकनीक पर बात होती थी. पूरी बीजेपी को पता था कि दोनों एक ही साथ रहते हैं, घूमते हैं. वो भी तब जब दोनों के खान-पान, पहनावे और पृष्ठभूमि सबमें बड़ा फर्क था. जेटली जहां मांसाहार के शौकीन, वहीं मोदी शुद्ध शाकाहारी, जो मानते थे कि पेट, जिसे जठराग्नि कहते हैं, अग्निदेवता का प्रतीक है, उसमें कोई मांस का टुकड़ा कैसे जा सकता है. पहनावे के स्तर पर भी फर्क, मोदी हमेशा कुर्ता-पाजामा में, तो जेटली शर्ट-पैंट या सूट में. मोदी हिंदी में अमूमन बात करना पसंद करते थे, तो जेटली की प्रिय भाषा अंग्रेजी. जेटली शहरी मध्यम वर्ग के प्रतीक, तो मोदी ग्रामीण निम्न मध्यम वर्ग के प्रतीक.

लेकिन ये भिन्नताएं एक तरफ, दोनों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम एक तरफ. जेटली ने बहुत जल्दी भांप लिया था कि मोदी में ऐसा कुछ है, जो बाकियों में नहीं है और ये आदमी लंबी रेस का घोड़ा है. वहीं मोदी मानते थे कि जेटली पर भरोसा किया जा सकता है, जो हर परिस्थिति में साथ रहेंगे, न सिर्फ दोस्त, बल्कि मार्गदर्शक के तौर पर.

Narendra Modi, Arun Jaitley, नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली

यही वो वजह थी, जिसकी वजह से मोदी और जेटली की दोस्ती लगातार गहरी होती चली गई. 1995 में अपने रणनीतिक कौशल के बूते पर गुजरात में पहली बार बीजेपी की सरकार केशुभाई पटेल की अगुआई में बनाने के बावजूद जब वाघेला के विद्रोह के कारण मोदी को गुजरात छोड़ना पड़ा, तो दिल्ली पहुंचे मोदी की जेटली से दोस्ती और गहराती चली गई. पार्टी ऑफिस में एक साथ तो होते ही थे, पार्टी ऑफिस के बाहर कभी जेटली के घर पर, तो कभी किसी रेस्तरां में भोजन पर बैठकर बातें करना दोनों को पसंद था.

मोदी के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आए थे जेटली
यूं तो जेटली मोदी से उम्र में दो साल छोटे थे, लेकिन विधायिका और कार्यपालिका, दोनों के साथ उनका औपचारिक नाता मोदी से दो साल पहले जुड़ा. जेटली 1999 के अक्टूबर महीने में वाजपेयी की सरकार में पहली दफा मंत्री बने, सूचना और प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा संभाला. इसके बाद वो अप्रैल 2000 में गुजरात से राज्यसभा के लिए चुने गये. जेटली को गुजरात से राज्यसभा में भेजे जाने में खुद मोदी ने अहम भूमिका निभाई, तब वो बीजेपी के केंद्रीय संगठन महामंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे. लेकिन अगले ही साल खुद मोदी के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के पीछे जेटली ने बड़ी भूमिका निभाई.

26 जनवरी 2001 को गुजरात में आए भूकंप के बाद जब राहत-पुनर्वास कार्यों को लेकर केशुभाई पटेल सरकार की काफी आलोचना होने लगी और बीजेपी राज्य में लोकसभा और विधानसभा के कुछ उपचुनाव हार गई, तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए ये चिंता का सबब बन गया. ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी और तत्कालीन पीएम अटलबिहारी वाजपेयी को जेटली ने इस बात के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई कि बिना मोदी को गुजरात का सीएम बनाए राज्य में हालात ठीक नहीं हो सकते. आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व ने फैसला किया और सात अक्टूबर 2001 को मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. दो साल पहले दोस्त अरुण जेटली वाजपेयी सरकार में मंत्री बन चुके थे और अब मोदी खुद गुजरात के मुख्यमंत्री. खास बात ये कि विधायिका के साथ मोदी का औपचारिक जुड़ाव भी जेटली के ठीक दो साल बाद ही हुआ, जब फरवरी 2002 में मोदी ने अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ा और राजकोट-2 सीट से हुए उपचुनाव में जीत हासिल की. लेकिन इस जीत के महज तीन दिन बाद ही गोधरा कांड हुआ, जिसके तहत साबरमती ट्रेन के एस-6 डिब्बे को मुस्लिम भीड़ ने आग लगी दी, 59 कारसेवकों की इसमें जान गई और उसके बाद गुजरात में जो दंगे भड़के, उसने मोदी और गुजरात की राजनीति दोनों को सदा के लिए बदल दिया.

अरुण जेटली, Arun Jaitley

दंगों के दौरान ही मोदी पर इन्हें नहीं रोकने का आरोप विपक्ष ने चस्पा करना शुरू कर दिया. टीवी चैनल, अंग्रेजी अखबार और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाएं मोदी को खलनायक के तौर पर प्रचारित करने लगीं. ऐसे में अरुण जेटली फिर अपने दोस्त की मदद को आगे आए, जिनका गुजरात से औपचारिक संबंध दो साल पहले ही बना था, गुजरात से राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद.

जेटली ने न सिर्फ असरदार ढंग से पत्र-पत्रिकाओं और टीवी पर अपनी बात रखी, बल्कि इस प्रतिकूल माहौल में मोदी को लगातार सही राय भी दी कि आखिर इस बड़े संकट से कैसे निकला जाए. इसी दौरान विपक्ष तो ठीक, पार्टी के अंदर भी एक बड़ा धड़ा इस बात की मांग करने लगा कि दंगों को नियंत्रित न कर पाने की जिम्मेदारी लेते हुए मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. इन लोगों को वाजपेयी के उस बयान से शह मिली थी, जब गुजरात का दौरा करते हुए उन्होंने मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह दी थी, ये बात अलग कि अगली ही सांस में उन्होंने ये कह भी दिया था कि उन्हें पूरा विश्वास है कि नरेंद्र मोदी इसका पालन कर रहे हैं.

 2002 में मोदी के लिए यूं तैयार की रणनीति
इन्हीं परिस्थितियों के बीच 2002 के अप्रैल महीने में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का आयोजन गोवा में हुआ. मोदी तब तक काफी दुखी हो चुके थे, विपक्ष की आलोचना तो एक तरफ, पार्टी के अंदर ही कुछ लोगों के नकारात्मक रवैये की वजह से वो परेशान हो चुके थे. 12 अप्रैल को गोवा के होटल मैरियट में ये बैठक शुरू होनी थी. लेकिन अरुण जेटली दिल्ली से सीधा गोवा पहुंचने की जगह एक दिन पहले अपने दोस्त नरेंद्र मोदी से मिलने गांधीनगर पहुंचे. दोनों दोस्त 11 अप्रैल की देर रात तक एक साथ बैठे. उनके बीच क्या पका, इसकी जानकारी उस समय किसी को नहीं थी, लेकिन इस रणनीति के बाहर आने में ज्यादा समय नहीं लगा और न ही इसका नतीजा दिखने में.

मोदी ने तब तक अपने करीबी लोगों से बात कर एक रिपोर्ट बनवा रखी थी कि आखिर जिन विकट परिस्थितियों में उन्हें गुजरात भेजा गया था, वैसे प्रतिकूल हालात में भी राज्य के विकास के लिए महज छह महीने के अंदर उन्होंने क्या-क्या ठोस काम किया है. मोदी दुखी थे पार्टी की हालत से, कुछ नेताओं के रवैये से. लेकिन अरुण जेटली निश्चिंत थे, उन्होंने अपने एक करीबी से धीरे से कहा, चिंता न करो, सब ठीक होगा.

मोदी और जेटली जब 12 अप्रैल 2002 की दोपहर गोवा पहुंचे तो सबको लग रहा था कि मोदी बाजी हार चुके हैं और कार्यकारिणी के अंदर उनको तगड़ी आलोचना का सामना करना पड़ेगा. लेकिन कार्यकारिणी की बैठक अगले दिन औपचारिक तौर पर शुरू हो, उससे पहले ही मोदी ने कार्यकारिणी के सभागार में ये कहकर मानो बम फोड़ दिया कि वो इस कक्ष में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, एक सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर बैठना चाहते हैं. मोदी का ये कहना नहीं हुआ कि हालात बिजली की चमक की तरह तेजी से बदल गये और नहीं, नहीं की आवाज के साथ पूरा कक्ष मानो मोदी के समर्थन में उठ खड़ा हुआ. शांता कुमार जैसे कुछ मुट्ठी भर नेता मोदी का विरोध करने का इरादा लेकर आए थे, उन्हें भी अपना मुंह बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा. खुद पार्टी में मोदी के लिए व्यापक जनसमर्थन को देखते हुए वाजपेयी ने भी अपने रुख में बदलाव किया और वहां हुई सार्वजनिक सभा में नरेंद्र मोदी का बचाव करते हुए उन्होंने विरोधियों और अल्पसंख्यक समुदाय पर जमकर निशाना साधा.

साझा योजना से बदला पार्टी का आंतरिक समीकरण
कार्यकारिणी की बैठक में, सामने से इस्तीफा देने की पेशकश, बताया जाता है कि ये मोदी-जेटली की साझा योजना थी, ये बचाव की जगह आक्रमण की योजना थी, बैकफुट की जगह फ्रंटफुट पर खेलने की योजना थी. इस रणनीति ने भारतीय राजनीति को बदल दिया, बीजेपी के आंतरिक समीकरण को हमेशा के लिए बदल दिया और यहां से मोदी ने जो आगे की तरफ बढ़ना शुरू किया, कभी पीछे मुड़कर देखा नहीं और तेरह वर्ष तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के बाद मोदी पिछले पांच वर्ष से देश के प्रधानमंत्री हैं और अपनी अगुआई में गुजरात में बीजेपी को लगातार तीन चुनाव जिताने के बाद बीजेपी के इतिहास में लगातार दूसरी दफा अपने बल पर केंद्र में सरकार बनाने में सफल रहे हैं.

Arun Jaitley, Narendra Modi

लेकिन करीब दो दशक की यात्रा के दौरान, जब मोदी लगातार लाइमलाइट में रहे हैं, जेटली उनके पीछे हमेशा शक्तिपुंज की तरह खड़े रहे. वर्ष 2002 में ही जब गुजरात में चुनाव हो रहे थे, जेटली चुनाव प्रभारी के तौर पर अमूमन दो महीने तक लगातार अहमदाबाद में कैंप किये रहे. ब्रांड मोदी के निर्माण का श्रेय भी जेटली को जाता है, जो बहुत पहले भांप गये थे कि अगर मोदी को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा जाए, तो काफी फायदा होगा. यही नहीं, जेटली ये भी जानते थे कि चुनावों में सिर्फ जातीय और सामाजिक समीकरण ही नहीं, भावनाओं का भी बड़ा महत्व रहता है. ऐसे में 2002 के चुनावों को गुजरात की अस्मिता से जोड़कर देखने का विचार भी जेटली का ही था, जिसे मोदी ने गौरव यात्रा के तहत सफल बनाया. यहां तक कि जब घोषणा पत्र ड्राफ्ट करने की बारी आई, तो बेहिचक मोदी ने ये काम जेटली को सौंपने का फैसला किया, इतना भरोसा था मोदी को अपने अरुण पर.

मोदी के पक्ष में पार्टी के अंदर बनाया माहौल
2002 के बाद 2007, फिर 2012 और यहां तक कि 2017, गुजरात के हर चुनाव में जेटली प्रचार-प्रसार की कमान संभाले रहते थे, वो भी तब जबकि उनका सियासी कद लगातार बढ़ता गया था. 2014 में जब लोकसभा चुनावों की बारी आई, तो भी मोदी को केंद्र में रखकर ही चुनाव लड़े जाएं, इसके लिए सबसे अधिक न सिर्फ जेटली ने दबाव बनाया, बल्कि पार्टी के अंदर इस पर सहमति बनाने में भी कामयाब रहे.
बहुत कम लोगों को आज याद होगा कि जून 2013 में जब गोवा के उसी मैरियट होटल में, जहां 11 साल पहले अपने इस्तीफे की पेशकश कर मोदी ने बाजी पलट दी थी, वहीं पर जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की बात चल रही थी, तो आडवाणी के विरोध के कारण घोषणा तो नहीं हो पाई, लेकिन जेटली ने ये सुनिश्चित किया कि मोदी को कैंपेन कमिटी का अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर ही दी जाए और आखिरकार पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह ने 9 जून 2013 को इसकी घोषणा भी की.

माहौल इस हद तक मोदी के पक्ष में बनाया जा चुका था कि जब अगले दिन आडवाणी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने की घोषणा की, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उल्टे आडवाणी को तुरंत अपना इस्तीफा लेने के लिए बाध्य होना पड़ा. इसके तीन महीने बाद 13 सितंबर 2013 को मोदी बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार भी घोषित हो गये और जेटली की इसमें भी बड़ी भूमिका रही. ध्यान रहे कि दोनों मौकों पर आडवाणी बगावती तेवर में ही थे, लेकिन जेटली के मन में कोई दुविधा नहीं थी कि उन्हें अपने दोस्त का साथ देना है या फिर अपने उस मार्गदर्शक का, जो उसे राजनीति में लेकर आया.

Arun Jaitley, Narendra modi

खराब सेहत के बावजूद रहे मुख्य रणनीतिकार
2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान जेटली ने प्रचार-प्रसार की कमान तो संभाली ही, 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी खराब सेहत के बावजूद पीछे नहीं हटे. कभी कुर्सी पर, तो कभी बेड पर लेटकर वो चुनावी रणनीति क्या हो और प्रचार कैसे चले, इस पर मार्गदर्शन देते रहे. पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का उन पर भरोसा वैसा ही बना रहा था. दरअसल मोदी, जेटली और अमित शाह तीनों की 2002 से ही इस मामले में एकता रही कि कभी विपक्ष के टर्फ पर जाकर न खेलो, बल्कि अपना एजेंडा लेकर आगे बढ़ो और अगर विपक्ष कोई आसान सी गेंद डाल दे, तो उस पर चौके-छक्के लगाने में देर न करो.

इन दो दशकों में जेटली न सिर्फ सियासी तौर पर, बल्कि कानूनी तौर पर भी मोदी और बाद में अमित शाह के लिए भी ट्रबलशूटर का काम करते रहे. 2002 के दंगों से जुड़े मामले ही नहीं, बल्कि मुठभेड़ मामलों में भी लंबी कानूनी लड़ाई चली, जेटली हमेशा मोदी को सही राय देते रहे, हर मंच पर उनका समर्थन करते रहे, कानूनी लड़ाइयों में मदद करते रहे. यही मदद उन्होंने अमित शाह की भी, यहां तक कि जब गुजरात हाईकोर्ट से जमानत पर रिहा होने के बाद अमित शाह को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2010 में गुजरात छोड़ना पड़ा, तो जेटली ने अपना दिल्ली का घर ऑफर किया कि वो वहां आकर रहें. अमित शाह को संबल देने के लिए वो रोजाना उनसे मिलते रहे और न सिर्फ कानूनी तौर पर बल्कि राजनीतिक तौर पर भी अमित शाह के हित का ध्यान रखा. यहां तक कि जिस उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा के चुनावों के दौरान अमित शाह ने नाम कमाया, उस उत्तर प्रदेश की सियासी बारीकियां समझाने में भी जेटली ने अहम भूमिका निभाई.

दोस्त मोदी का हर जगह किया बचाव
संसद के बाहर ही नहीं, संसद के अंदर भी जेटली अपने दोस्त मोदी का बचाव करते रहे. मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राज्यसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर जेटली ने मोदी के समर्थन में हमेशा आवाज बुलंद की और बताया कि किस तरह कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार न सिर्फ गुजरात के साथ अन्याय कर रही है, बल्कि जानबूझकर मोदी को फंसाने की कोशिश कर रही है.

एक तरफ जेटली का मोदी के प्रति इस तरह का समर्पित भाव, तो दूसरी तरफ मोदी का जेटली पर अटूट विश्वास, ये लगातार बना रहा. अपने हर चुनाव में मोदी जेटली पर पूरा भरोसा किया करते थे, जो जेटली ने कह दिया वो फाइनल. दोनों के बीच केमिस्ट्री ऐसी थी कि अगर कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो जेटली को ये भली-भांति पता होता था कि मोदी क्या चाहते हैं और मोदी को ये विश्वास था कि वो जेटली के जिम्मे सब कुछ छोड़कर लगातार रैलियों को संबोधित करने में अपना ध्यान लगा सकते हैं.

Arun Jaitley, Narendra Modi

पीएम मोदी ने पूरा किया वादा
2014 के लोकसभा चुनावों में जब जेटली पहली बार खुद लोकसभा का चुनाव अमृतसर से लड़ रहे थे, मोदी उनके प्रचार के लिए वहां पहुंचे थे. मोदी को लग गया था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुकाबले जेटली की हालत अच्छी नहीं है, लेकिन मोदी एक बड़ा वादा करने से नहीं चूके. जेटली के साथ ही अमृतसर की जनता को भी मोदी ने कहा कि सरकार बनने पर जेटली उनके मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जगह पाएंगे. इसके बावजूद भले ही अमृतसर के लोगों ने जेटली को नहीं जिताया, लेकिन मोदी ने अपना वादा पूरा किया. जेटली के चुनाव हारने के बावजूद मोदी ने अपने पहले मंत्रिमंडल में उन्हें न सिर्फ वित्त मंत्री बनाया बल्कि रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी दिया. ये पहली बार ही हुआ कि वित्त और रक्षा जैसे दो महत्वपूर्ण प्रभार, जो सर्वशक्तिशाली कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी का महत्वपूर्ण हिस्सा हों, वो किसी एक आदमी के खाते में जाएं, लेकिन जेटली के मामले में मोदी ने ये किया. यही नहीं, मोदी मंत्रिमंडल में उन नये चेहरों को भी जगह मिली, जो जेटली के करीब माने जाते थे, मसलन पीयूष गोयल, धर्मेद्र प्रधान या फिर निर्मला सीतारमण. जब केंद्र सरकार ने अदालतों के लिए अपनी लीगल टीम तय की, उस वक्त भी अकेले तुषार मेहता, जो अमित शाह के करीब थे, उन्हें छोड़कर सभी लोग जेटली के करीबी ही थे, जो एटॉर्नी जनरल से लेकर सॉलिसिटर जनरल और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बने.

यहां तक कि दूसरी दफा भी जब पूर्ण बहुमत की सरकार केंद्र में मोदी बनाने जा रहे थे और अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए जेटली ने पहले ही सरकार में शामिल होने से मना कर दिया था, तो शपथ ग्रहण के ठीक पहले की शाम वो जेटली के घर पहुंचे उन्हें मनाने के लिए, सरकार में शामिल होने की दावत देने के लिए. जेटली ने भले ही खऱाब सेहत का हवाला देते हुए फिर से मोदी को मना कर दिया, लेकिन ये पहली बार ही हुआ कि अपनी सरकार में शामिल होने के लिए, मनाने के लिए मोदी किसी के घर पर गये हों. लेकिन मोदी ने अपने खास दोस्त अरुण के लिए ये भी किया.

दरअसल चुनावों के काफी पहले से ही जब जेटली का स्वास्थ्य खराब रहने लगा था, तब मोदी लगातार उनका हालचाल पूछने के लिए जाते रहते थे. बहुत कम लोगों को पता होगा कि जब जेटली का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था, तो मोदी बिना शोर मचाए एम्स पहुंच गये थे और अमूमन पूरी रात जेटली के कमरे में मौजूद रहे थे. उनकी आखिरी बीमारी के समय भी मोदी लगातार उनका हालचाल लेते रहे, बाकी मंत्रियों और नेताओ को उनके पास भेजते रहे.

Arun Jaitley, Narendra modi

दोनों के रिश्ते के कुछ हल्के-फुल्के पल
मोदी और जेटली के रिश्तों की कहानी में हल्के-फुल्के क्षणों की भी कोई कमी नहीं थी. मोदी को ये भली-भांति पता था कि क्रिकेट का शौक जेटली के लिए जुनून जैसा है और उसके चक्कर में वो सबकुछ भूल जाते हैं. ऐसे में 2002 विधानसभा चुनावों के वक्त वो हमेशा अपना एक कार्यकर्ता क्रिकेट मैच में खोये जेटली के सामने ये याद दिलाने के लिए बैठाया करते थे कि ये प्रेस नोट क्लियर होनी बाकी है, चुनाव आयोग को ये पत्र लिखना है या फिर चुनाव घोषणा पत्र का कितना काम बाकी रह गया है.

खुद जेटली भी कई बार मोदी को लेकर चुहल करते थे. एक घटना 2007 विधानसभा चुनावों के वक्त की है. उसके पहले भ्रष्टाचार को खत्म करने की अपनी मुहिम के तहत मोदी हमेशा ये कहा करते थे कि न तो मैं खाता हूं और न खाने देता हूं. 2007 का चुनाव आसान नहीं था और मोदी या फिर जेटली किसी भावनात्मक मुद्दे की तलाश में थे, जो विपक्ष के आक्रमण को भोंथरा तो कर ही दे, साथ में पार्टी के अंदर जो विरोधी धड़ा था, उसको भी शांत कर दे. इसी दौरान गुजरात के दौरे पर आई सोनिया गांधी ने दक्षिण गुजरात की एक सभा में सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले को लेकर मोदी को मौत का सौदागर कह दिया. सोनिया का ये कहना नहीं था कि मोदी और जेटली को मुद्दा मिल गया. रात के दो बजे तक दोनों इसका चुनाव में कैसे अपने हक में इस्तेमाल किया जाए, गांधीनगर के मुख्यमंत्री आवास में बैठकर इसकी रणनीति बनाते रहे. अगले दिन सुबह जब बीजेपी के मीडिया सेल से जुड़े कुछ कार्यकर्ता जेटली के पास पहुंचे, तो जेटली की नींद पूरी नहीं हुई थी. आंखे मलते हुए जेटली उठे और कहा कि नरेंद्र भाई पहले तो कहा करते थे कि न मैं खाता हूं और न खाने देता हूं, लेकिन भई अब तो उन्होंने तय कर लिया है कि न तो मैं सोता हूं और न सोने दूंगा. जाहिर है, जेटली का ये डायलॉग सुनकर सामने खड़े लोग अपनी हंसी नहीं रोक सके.

हंसी-मजाक के ये कुछ पल और उदाहरण एक तरफ, लेकिन सच्चाई यही है कि मोदी और जेटली की दोस्ती इतनी गहरी थी कि बीजेपी के अंदर और बाहर ज्यादातर लोग इस गहराई का अंदाजा नहीं लगा पाते थे. इसका अंदाजा दो ही लोगों को था, जो चार दशक से भी अधिक समय से एक-दूसरे के करीब थे, जिसमें से एक का तो कल स्वर्गवास हो गया और दूसरा रुंधे गले से इतना ही कह पाया कि मेरा अरुण चला गया और उसकी आंखों में आंसू आ गये. आखिर ये दोस्त अब अपने दिल की बात किससे कहेगा.
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