स्मृति शेष: महाजन और शाह के बीच BJP में हुआ करता था जेटली युग

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: August 24, 2019, 10:43 PM IST
स्मृति शेष: महाजन और शाह के बीच BJP में हुआ करता था जेटली युग
अरुण जेटली (Arun Jaitley) सबसे खुलकर लड़े, लेकिन पार्टी के भीतर सुब्रमण्‍यम स्‍वामी (Subramanian Swamy) के आरोपों पर उन्‍होंने हमेशा ऐसी सधी हुई चुप्‍पी साधी कि स्‍वामी का कोई आरोप जेटली पर चिपक नहीं पाया. news18 Creative

जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने बदलाव के सबसे बड़े दौर के लिए तैयार थी यानी अटल-आडवाणी युग से नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) युग में प्रवेश करने के लिए, तब अरुण जेटली (Arun Jiatley) कृष्‍ण की भूमिका में थे. वे कार्यसमिति में आडवाणी के चहेते थे, लेकिन उन्‍हें पता था कि भाजपा (BJP) के भविष्‍य का सूर्य इस बार पश्चिम यानी गुजरात से उगने वाला है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 24, 2019, 10:43 PM IST
  • Share this:
प्रमोद महाजन (Pramod Mahajan) के परिदृश्‍य से जाने और अमित शाह (Amit Shah) के राजनैतिक रंगमंच पर आने के बीच के भारतीय जनता पार्टी (Bhartiya Janata Party) कालखंड को अगर कोई नाम देना होगा तो उसे अरुण जेटली (Arun Jaitley) युग ही कहा जाएगा. वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे. वे भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता और राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी के लंबे समय तक सदस्‍य थे. 2004 में जब वाजपेयी सरकार गिर गई और उसके कुछ समय बाद जब प्रमोद महाजन की मृत्‍यु हो गई, तो भाजपा की राजनीति के क्षितिज पर जेटली दिखाई देने लगे.

इधर अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) का स्‍वास्‍थ्‍य कमजोर हुआ और पार्टी का नेतृत्‍व लालकृष्‍ण आडवाणी के हाथ में आया तो कुछ नेताओं की हैसियत पर फर्क पड़ा, लेकिन जेटली आडवाणी के और करीबी हो गए. वे दिल्‍ली में पार्टी के सबकुछ थे. जमीनी लड़ाई के लिए नीति बनाने से लेकर अदालतों में जंग लड़ने तक वे हाजिर थे. वे पार्टी के फंडरेजर भी थे और सदन में विपक्ष की आवाज भी थे. जब भारतीय जनता पार्टी 2009 के लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार गई, तब भी अरुण जेटली पार्टी के लिए अपरिहार्य बने रहे.

जब भारतीय जनता पार्टी अपने बदलाव के सबसे बड़े दौर के लिए तैयार थी यानी अटल-आडवाणी युग से नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) युग में प्रवेश करने के लिए, तब भी जेटली कृष्‍ण की भूमिका में थे. वे कार्यसमिति में आडवाणी के चहेते थे, लेकिन उन्‍हें पता था कि भाजपा (BJP) के भविष्‍य का सूर्य इस बार पश्चिम यानी गुजरात से उगने वाला है.

एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था कि 2011 में ही वह जान गए थे कि नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री प्रत्याशी होंगे. समय रहते उन्‍होंने खुद को ऐसे व्‍यक्ति के तौर पर पेश कर दिया, जो नरेंद्र मोदी को दिल्‍ली के सत्‍ता के गलियारों से वाकिफ कराने वाला इकलौता सूत्र बन गया.

यह भी पढ़ें:  जेटली के निधन पर शोक की लहर, शिवराज ने कहा बड़ा भाई खो दिया

लेकिन अरुण जेटली चुनाव हार गए...
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में बीजेपी को जबरदस्‍त जीत मिली, लेकिन अरुण जेटली अमृतसर से लोकसभा चुनाव हार गए. दलअसल, वे अपनी जिंदगी में लोकसभा चुनाव कभी जीते ही नहीं, वे अंतिम सांस तक राज्‍यसभा के ही सदस्‍य रहे. इसके बावजूद 2014 में मोदी के देश के नेता बनने के बाद, कम से कम शुरुआती दो साल तक सरकार का मतलब अरुण जेटली ही था. उनके पास लंबे समय तक वित्‍त और रक्षा दोनों ही मंत्रालय बने रहे. यही नहीं मामला किसी भी मंत्रालय का हो, अगर कहीं कोई बड़ा सवाल खड़ा हो गया तो जवाब देने जेटली ही आए.
Loading...



जेटली और मोदी दोनों को पता था कि राज कैसे करना है. मोदी पूरे देश में अपार लोकप्रिय हो चुके थे. लेकिन लुटियन की दिल्‍ली के गलियारों में कैसे संभल संभल के चलना है, यह बात जेटली ज्‍यादा बेहतर जानते थे. मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में सबसे बड़ा फैसला भूमिअधिग्रहण कानून में बदलाव का लिया. यह कानून उद्योग के लिहाज से सुधार और किसानों के लिहाज से मुसीबत था. इसके सूत्रधारों में जेटली शामिल थे.

दरअसल किसानों को लेकर शुरू में सरकार बड़े तेज ढंग से सोच रही थी. सरकार चाह रही थी कि उर्वरक सब्सिडी की व्‍यवस्‍था खत्‍म हो और किसान ज्‍यादा वैज्ञानिक ढंग से काम करें. सरकार अनाजों के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य यानी एमएसपी की व्‍यवस्‍थ भी धीरे धीरे खत्‍म करना चाहती थी.

ये सब वे चीजें थीं जो भारतीय कृषि को बुनियादी ढंग से बदल देतीं और सब्सिडी और एमएसपी खत्‍म होने के दूरगामी परिणाम के तौर पर कृषि न सिर्फ पुराने जमाने की तरह विविधतापूर्ण हो जाती, बल्कि ज्‍यादा आत्‍मनिर्भर भी हो जाती. लेकिन करीब नौ महीने की लड़ाई के बाद सरकार ने भूमि कानून बदलने की मंशा टाल दी. यही नहीं मोदी सरकार के कार्यकाल की मध्‍यावधि आते आते बाकी दोनों चीजों को हटाने के बजाय मजबूत करने पर काम हुआ.

यह भी पढ़ें:  जहां खुद के बच्चे पढ़े वहीं ड्राइवर-कुक के बच्चों को पढ़ाया

जेटली ने अपने वकील के हुनर का पूरा परिचय दिया
इस पूरी कवायद में जेटली ने अपने वकील के हुनर का पूरा परिचय दिया. पहले वे सरकार के फैसलों के साथ खड़े रहे और बाद में सरकार का मन बदलने के समय भी उसी ताकत से खड़े रहे. दिलचस्‍प बात यह है कि इतनी बड़ी पार्टी होने के बावजूद अक्‍सर ऐसा दिखता था जैसे वे अकेले ही अभिमन्‍यु की तरह सरकार का बचाव कर रहे हैं.

मोदी सरकार के दो बड़े आर्थिक फैसलों नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के दौरान भी कमान उन्‍हीं के हाथ में थी. फैसले प्रधानमंत्री ने लिए थे, लेकिन जनता और अधिकारियों को समझाने की कमान जेटली के हाथ में थी.

चाहे व्‍यापमं घोटाले का मामला हो, चाहे ललित मोदी के भारत से भागने में सुषमा स्‍वराज पर लग रहे आरोप हों, या फिर राफेल पर चल रहे विपक्ष के तीर हों, जेटली हर समय फ्रंटफुट पर खड़े होकर सरकार का बचाव कर रहे थे. वे अक्‍सर उन मंत्रालयों का सबसे जोरदार बचाव करते थे, जिनका उनसे कुछ भी लेना देना नहीं होता था. दूसरों को बचाने के साथ वे खुद को बचाने में भी पीछे नहीं रहे. जब अरविंद केजरीवाल ने उन पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाए और केजरीवाल के वकील रामजेठमलानी ने अदालत में जेटली पर हमले बोले तो जेटली झुकने के बजाय और तन गए.

वे सबसे खुलकर लड़े, लेकिन पार्टी के भीतर सुब्रमण्‍यम स्‍वामी के आरोपों पर उन्‍होंने हमेशा ऐसी सधी हुई चुप्‍पी साधी कि स्‍वामी का कोई आरोप जेटली पर चिपक नहीं पाया.

जब अमित शाह पार्टी अध्‍यक्ष बन गए...
बाद में जब अमित शाह पार्टी अध्‍यक्ष बन गए, तो जेटली को अपनी जिम्‍मेदारियों से कुछ हद तक राहत मिली. वे सरकार में तो पहले की तरह जुटे रहे, लेकिन संगठन की जिम्मेदारी शाह ने बखूबी संभाल ली. शाह के उदय के साथ ही जेटली की भूमिकाएं सीमित होने लगीं और लोगों की जुबान पर मोदी-शाह की जोड़ी का नाम चढ़ने लगा. परिदृश्‍य से पीछे हटने की एक वजह जेटली का खराब स्‍वास्‍थ्‍य भी था.
जेटली जान रहे थे कि महाजन के जाने के बाद और शाह के आने से पहले पार्टी के चाणक्‍य की भूमिका का काम वे बखूबी निभा चुके हैं. इसीलिए पिछली सरकार में एक ऐसा मौका भी आया जब वे बिना विभाग के मंत्री भी बने रहे.



संघर्षशील प्रवृत्ति को उनकी खराब सेहत भी झुका न सकी
उनकी संघर्षशील प्रवृत्ति को उनकी खराब सेहत भी झुका न सकी. वे अस्‍पताल के अपने बिस्‍तर से भी लंबे लंबे ब्‍लॉग लिखकर सरकार के बचाव और नेहरू से लेकर आज तक की कांग्रेस को घेरने में लगे रहे. अपने ब्‍लॉग लिखते समय वे चतुराई से इतिहास के ऐसे हिस्से काट काटकर निकालते थे जो पूरी सच्‍चाई को भले बयां न करें, लेकिन पार्टी का काम तो बना ही देते थे. स्‍कूल की कक्षा में इस आचरण को सत्‍याग्रही नहीं कहा जा सकता, लेकिन वकालत की दुनिया तो ऐसे ही खंडसत्‍यों पर टिकी रहती है.

पार्टी के लिए अपने संपूर्ण समर्पण के साथ ही जेटली पत्रकारों के लिए तो समाचारों की खान थे. जितनी ऑफ रिकॉर्ड ब्रीफिंग जेटली ने की होगी, उतनी शायद ही किसी नेता ने की हो. पाकिस्‍तान के शरणार्थी परिवार का होने के कारण उनके मन में कांग्रेस से सहज नफरत थी, लेकिन इसके बावजूद विरोधी नेताओं से उनके संबंध मधुर थे. उनके साथ बीजेपी के वरिष्‍ठ नेताओं की पंक्ति का एक ऐसा दीया बुझ गया, जो विपक्षी को अपना राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी तो मानते थे, लेकिन अपना दुश्‍मन नहीं समझते थे.

जीवन का बड़ा हिस्‍सा विपक्ष की राजनीति में गुजारने वाले जेटली को पता था कि जब लोकतंत्र में विरोधी को दुश्‍मन माना जाने लगता है, तो लोकतंत्र का क्षरण शुरू हो जाता है. उनके जाने से इस क्षरण के रास्‍ते का मजबूत तटबंध ढह गया. जेटली युग के अवसान की यह कम बड़ी क्षति नहीं होगी.

यह भी पढ़ें:  जानिए कितने पढ़े-लिखे थे पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देश से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: August 24, 2019, 3:52 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...