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'उन्होंने मेरे कबूतरों को भी मार डाला'- दिल्ली हिंसा की आग में झुलसी कई मासूम कहानियां


राहत कैंप में अपने परिवार के साथ अस्थाई टेंट में रह रहे इन बच्चों का घर हिंसा की भेंट चढ़ चुका है.

राहत कैंप में अपने परिवार के साथ अस्थाई टेंट में रह रहे इन बच्चों का घर हिंसा की भेंट चढ़ चुका है.

राहत कैंप में अपना परिवार के साथ अस्थाई टेंट में रह रहे इन बच्चों का घर हिंसा की भेंट चढ़ चुका है. कुछ ने इस हिंसा में प्रियजनों को भी खोया है. उनके जेहन में हिंसा के दाग़ अब भी ताज़ा हैं.

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    ज़ेबा वारसी
    नई दिल्ली.
    'मैं अमन चाहता हूं'- दिल्ली में पिछले दिनों भड़की हिंसा (Delhi Violence) के बाद यहां मुस्तफाबाद राहत शिविर में रह रहे 11 साल के अहमद ने यह कहा. जब मैंने उसेसे पूछा कि क्या उन्हें पता है कि 'अमन' होती क्या है, तो उसने तुरंत कहा, 'हिंदू-मुस्लिम भाईचारा. मैं चाहता हूं कि हर कोई शांत हो जाए, क्योंकि तभी हम सब घर जा सकते हैं, है ना?'

    ये अकलमंदी की बातें एक ऐसे बच्चे से जुबान से निकल आ रहे थे, जिसने इस दंगों में बड़ा दर्द झेला है. उसकी बातें सुनकर कोई भी अचरज में पड़ जाए. आम तौर पर इस उम्र के बच्चे कार्टून शो और गेम्स के बारे में बातें करते हैं. हालांकि उत्तर पूर्वी दिल्ली के लिए यह आम दिनों जैसा नहीं है और ऐसे में इस बच्चे के दिल में दबा दर्द उसकी जुबां से छलक रहा है.

    उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 23 फरवरी को शुरू हुई हिंसा के दौरान उपद्रवियों ने अहमद (बदला हुआ नाम) नाम के इस बच्चे का घर भी खाक कर दिया और अब बस वह यही चाहता है कि जल्द से जल्द अपने परिवार के साथ घर वापस जा पाए.

    दिल्ली हिंसा की आग में झुलसा अहमद कोई अकेला बच्चा नहीं. उसकी तरह कई दूसरे बच्चे को भी दंगों के भयानक ख्वाब से दो-चार होना पड़ा है. हालांकि इन दुख और तकलीफों के बावजूद ये बच्चे दिल्ली सरकार की तरफ से दंगा पीड़ितों के लिए मुस्तफाबाद ईदगाह में स्थापित राहत शिविर हंसते-खेलते दिख जाते हैं.


    राहत कैंप में अपना परिवार के साथ अस्थाई टेंट में रह रहे इन बच्चों का घर हिंसा की भेंट चढ़ चुका है. कुछ ने इस हिंसा में प्रियजनों को भी खोया है. उनके जेहन में हिंसा के दाग़ अब भी ताज़ा हैं.

    अहमद उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, 'मैंने देखा कि लोग हमारे घर की तरफ दौड़ रहे हैं. उनके रास्ते में जो कुछ भी आ रहा है उस पर पत्थर बरसा रहे हैं. उन्होंने कई गाड़ियों में भी आग लगा दी थी.'

    अहमद और उनका परिवार उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सबसे ज्यादा हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में से एक शिव विहार में रहता था. 25 फरवरी को वह अपने परिवार के साथ किसी तरह वहां से भाग निकला. पास की गली में हथियारबंद लोगों को देखकर उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया था. इसके बाद उपद्रवियों ने उनके को आग लगा दी.

    इस दौरान वह अपने कबूतरों को खोने से सबसे ज्यादा परेशान है. वह कहते हैं, 'मेरे पास 17 कबूतर थे. पथराव में घायल होने से उनमें से दो की मौत हो गई. इसके बाद मैंने बाकी सभी को आजाद छोड़ने का फैसला कर लिया. मैंने उनके पिंजरे को खोल दिया और उन्हें अलविदा कह दिया. मेरे कबूतर आसमान में अब सुरक्षित हैं.' अहमद बताता है कि उसे अभी भी अपने कबूतरों के सपने आते हैं.

    अहमद का परिवार पिछले दस दिनों से राहत शिविर में रह रहा है. वह यहां खुद से ही बाकी बच्चों का मॉनीटर बन गया है और दूसरे बच्चों की देखभाल करता है. वह कहता है, 'मुझे बड़े लोगों ने उनकी देखभाल करने के लिए कहा है. चूंकि मैं मजबूत हूं, वे मेरी बात सुनते हैं. मैं देखता हूं कि वे कैंप के बाहर न चले जाएं. मैं बाहरी लोगों पर भी नज़र रखता हूं.'

    इसके बाद 10 साल की सलमा* ने मुझे पूरे राहत शिविर में घुमाया. टेंट के महिला सेक्शन में दाखिल होते ही वह और उसकी सहेलियां मेरी ओर दौड़ीं और बोलीं, 'मैं आपको पूरा कैंप घूमाउंगी. यहां आपको शिव विहार, खजूरी खास और करावल नगर की महिलाएं मिलेंगी.'

    वह बिना कोई दुख-दर्द दिखाए समतल सी आवाज़ में कहती हैं, 'क्या आप उन लोगों से मिलना चाहते हैं, जो घायल हुए हैं या फिर आप बस जले हुए घरों के लोगों से मिलना चाहती हैं.'

    इस हिंसा को लेकर सलमा की बातें सुनकर मैं भी हैरान थी. हम अपने बच्चों को हिंसात्मक चीज़ों से दूर रखने के लिए फिल्मों तक को सेंसर कर देते हैं, लेकिन तब क्या जब उनकी आंखों के सामने ही इस तरह हिंसा और आगजनी होती दिखे.


    आत्मविश्वास से भरी चमकती आंखों वाली सलमा ने तब तक मेरा हाथ नहीं छोड़ा, जब तक मैं उस कैंप में रहीं. वह मुझे प्यार से कभी चूम लेती और कभी जोर से भींच लेती. मैंने उसके इस प्यार के लायक कुछ भी नहीं किया था, लेकिन वह बस राहत शिविर में आए लोगों को देखकर ही खुश थी.

    इस त्रासदी के बीच भी सलमा के दिल में इस मासूम चंचलता को देखकर दिल भर आता है. वह मुझे अपने दूसरे दोस्तों से मिलवाने ले जाती है, जो शिव विहार में उसी की गली में रहा करते थे. उन सबके घर में हिंसा में जल गए हैं. वह बिल्कुल बेपरवाह आवाज़ के साथ बोलती हैं, 'आप तहजीब से मिलिए. उसका भी घर जला दिया गया है. उसकी बाइक भी जला दी गई.'

    इन बच्चों को इस तरह हिंसा की बात करते सुनना हृदयविदारक है. हालांकि वहां हर बच्चे की जुबान से एक ही बात सामने आती है, 'हम सभी घर जाते हैं. हम चाहते हैं कि चीज़ें पहले की तरह ही हो जाएं.'

    यहां बच्चों की पहचान गोपनीय रखने के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं.

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    ये लेख अंग्रेजी से अनुवाद किया गया है. मूल लेख यहां पढ़ें...

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