50 साल के हुए राहुल गांधी लेकिन अब भी राजनीतिक सफलता उनसे दूर, जानें क्यों?

50 साल के हुए राहुल गांधी लेकिन अब भी राजनीतिक सफलता उनसे दूर, जानें क्यों?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की फाइल फोटो (फोटो- PTI)

वर्तमान कांग्रेस (Congress) में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हर चुनाव में जीतते देखना चाहते हैं लेकिन वहीं पार्टी की सफाई के काम में उनके असफलता की चाह भी रखते हैं.

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(रशीद किदवई)

नई दिल्ली. "50 के होने का मतलब यह नहीं होता कि आप अंत (End) के नजदीक जा रहे हैं. इसका मतलब यह होता है कि आप चोटी (Top) की ओर जा रहे हैं." राहुल गांधी (Rahul Gandhi), जो शुक्रवार को 50 के हो रहे हैं, उन्हें खुद से पूछने की जरूरत है कि क्या वे चोटी (Top) के आसपास भी हैं?

कांग्रेस (Congress) के नेतृत्व का मसला सुलझने में अब भी बहुत समय है. राहुल गांधी के AICC के प्रमुख बनने को लेकर हुई काफी सारी बातों और लगाये गये कयासों पर लगातार बातचीत के बावजूद, एक्टिव पॉलिटिक्स (Active Politics) से सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) का बाहर होना या रिटायरमेंट हर स्तर के कांग्रेस पार्टी नेताओं (Congress Party Leaders) को खटकने लगता है. हर बार पार्टी में नेतृत्व के परिवर्तन या बड़े बदलाव के अनुभव के चलते चिंताएं बढ़ जाती हैं.



कांग्रेस में बड़े बदलावों के दौरान अप्रासंगिक होते रहे हैं पुराने करीबी
उदाहरण के तौर पर, जब राजीव गांधी ने संजय गांधी की जगह ली थी, कई लोग जो संजय गांधी से करीबी जुड़ाव रखते थे, उन्हें लगा था कि वे बड़े भाई की टीम में अनुपयुक्त थे. शक्तिशाली युवा कांग्रेस प्रमुख राम चंद्र रथ को राजीव गांधी के कांग्रेस का महासचिव नियुक्त होते ही, अपना प्रभाव फीका पड़ता मालूम हुआ था.

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राजीव गांधी की हत्या के बाद, उनके एमएल फोतेदार जैसे कई सारे सहयोगियों को पीवी नरसिम्हाराव ने निकाल दिया था. सीताराम केसरी के दौर में जनार्दन पुजारी, भुवनेश चतुर्वेदी और अन्य कई की धीरे-धीरे विदाई हो गई, जो राव के करीबी थे.

जब सोनिया गांधी ने बागडोर संभाली, कई सारे नेता जो राजीव, नरसिम्हा राव और केसरी के करीबी माने जाते थे, बाहर हो गये.

राहुल भी अध्यक्ष की दूसरी पारी शुरू करने से पहले चाहते हैं बड़े बदलाव
जबकि सोनिया के सलाहकारों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 87वें अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के छोटे से दौर में अपनी जगह बचाई, लेकिन इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि राहुल, कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अपनी दूसरी पारी शुरू करने से पहले पुराने नेताओं की टीम का प्रस्थान चाहते हैं.

शख्सियतों से अलग, एक चिंता यह भी है कि राहुल की पदोन्नति उनकी नीतियों, योजना निर्माण और काम करने के तरीके के जरिए भी महसूस होनी चाहिये.

मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी की तारीफ
राहुल की आर्थिक और राजनीतिक सोच लेफ्ट ऑफ सेंटर के जरिए गहराई से प्रभावित लगती है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, अमर्त्य सेन के अगस्त, 2009 के एक इंटरव्यू को याद करते हैं, जिसे विनोद मेहता और अंजली पुरी ने लिया था, जहां नोबेल पुरस्कार विजेता ने राहुल गांधी को "प्रतिभावान और भारत में वंचित लोगों के बारे में गहराई से चिंता करने वाला और बदलाव लाने की चाहत रखने वाला बताया था.

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प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने टिप्पणी की थी, "मैं उन्हें (राहुल) थोड़ा-बहुत जानता हूं. मैंने एक बार उसके साथ एक दिन बिताया था, जब वह मुझसे मिलने के लिए ट्रिनिटी (कैम्ब्रिज) आया था और मैं उससे बहुत प्रभावित हुआ था."

राहुल गांधी अक्टूबर, 1994 से जुलाई, 1995 तक ट्रिनिटी के छात्र थे और उन्होंने डेवलपमेंट स्टडीज में एमफिल किया था. सेन, जिन्हें 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने भारत रत्न दिया था, ने कहा था कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है. (लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फेलो हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
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