लोकसभा चुनाव 2019: मोदी लहर में औवेसी ने 2 लाख वोटों से जीती थी हैदराबाद सीट, अब इससे मिलेगी टक्कर

1951 के पहले आम लोकसभा चुनाव से लेकर 1980 तक सात बार चुनाव हो चुके हैं. 6 बार ये सीट कांग्रेस के खाते में जा चुकी है. लेकिन फिलहाल कुछ वक्त से कांग्रेस इस सीट का पाने में नाकाम रही है.

नासिर हुसैन | News18Hindi
Updated: April 2, 2019, 3:10 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019: मोदी लहर में औवेसी ने 2 लाख वोटों से जीती थी हैदराबाद सीट, अब इससे मिलेगी टक्कर
असदुद्दीन ओवैसी
नासिर हुसैन
नासिर हुसैन | News18Hindi
Updated: April 2, 2019, 3:10 PM IST
कभी आंध्रा प्रदेश की और अब तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद हमेशा से सुर्खियों में रही है. पहले निज़ामों के चलते तो अब देश की सियासत में हैदराबाद का जिक्र होता ही रहता है. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन औवेसी के बयानों को लेकर तो आए दिन कोई न कोई विवाद खड़ा ही हो जाता है.

असदुद्दीन ओवैसी इसी सीट से सांसद भी हैं. हालांकि कुछ समय पहले तक इस सीट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. 1951 के पहले आम लोकसभा चुनाव से लेकर 1980 तक सात बार चुनाव हो चुके हैं. 6 बार ये सीट कांग्रेस के खाते में जा चुकी है. लेकिन फिलहाल कुछ वक्त से कांग्रेस इस सीट का पाने में नाकाम रही है. 2014 के लोकसभा चुनावों में एआईएमआईएम नेता असदउद्दीन औवेसी ने हैदराबाद सीट पर 5.13 लाख वोट मिले थे. जिसके चलते बीजेपी को 2 लाख और कांग्रेस उम्मीदवार को 4.50 लाख से अधिक वोटों से हराया था.

इस बार ऐसी चर्चाएं थी कि कांग्रेस इस सीट को दोबारा से पाने के लिए क्रिकेटर अजहरउद्दीन को हैदराबाद से उतार सकती है. लेकिन हाल ही में घोषित की गईं टिकटों में हैदराबाद से किसी फिरोज खान को टिकट दिया गया है. इस बारे में एएमयू के प्रोफेसर एसएम हक़ का कहना है, हैदराबाद में औवेसी परिवार की एक पहचान है. दूसरे असदउद्दीन औवेसी जिस तरह से मुसलमानों के मुद्दों पर जिस तरह से बोलते हैं वो उन्हें देशभर में एक पहचान दिलाता है.

जिसका फायदा उन्हें हैदराबाद में भी मिलता है. दूसरा ये कि औवेसी की टक्कर हैदराबाद में अब बीजेपी से है. 2014 के चुनावों में भी आप देखेंगे कि उनकी जीत के बावजूद उन्हें बीजेपी उम्मीदवार से खासी टक्कर मिली थी. इसलिए सीट तक पहुंचना कांग्रेस के लिए अभी भी मुश्किल दिख रहा है.

डॉ. बीअर आंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और राजनीति के जानकार डॉ. अरशद बताते हैं कि 1951 में पहले चुनाव हुए थे. तब से लेकर 1980 में हुए सातवें आम चुनाव तक कांग्रेस ने ये सीट सात में से छह बार जीती थी. 1971 में मेलकोटे ने तेलंगाना प्रजा समिति से चुनाव लड़कर ये सीट जीती थी.

इसके बाद तो मानों इस सीट के सियासी समीकरण ही बदल गए. 1984 में इस सीट पर पहली बार ओवैसी परिवार सुल्तान सलाहुद्दीन ने निर्दलीय लड़कर जीते थे. इसी बीच एआईएमआईएम का गठन हो चुका था और 1989 में सलाहुद्दीन ने एआईएमआईएम से चुनाव लड़ा और फिर दूसरी बार जीत हासिल की.  इसके बाद वह एआईएमआईएम से 1991, 1996, 1998 और 1999 में इस पर से लगातार जीतते रहे. उम्र के साथ सेहत ने साथ नहीं दिया तो

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उन्होंने सियासत से विदाई ले ली. हालांकि इस सीट से मौजूदा उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. लेकिन 1996 में हुए उस लोकसभा चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली थी. 2004, 2009, 2014 में तीन बार असदुद्दीन ओवैसी की इस सीट से ताजपोशी हो चुकी है.

7 में से 6 विधानसभा सीट पर है एआईएमआईएम

हैदराबाद सीट में करीब 65 फीसदी अल्पसंख्यक वोट हैं जो चुनावों में अहम रोल अदा करते हैं. इस लोकसभा में सात विधानसभा सीटें मालकपेट, कारवां, गोशमहल, चारमीनार, चंद्रयान गुट्टा और याकूतपुरा हैं. इनमें से छह एआईएमआईएम के पास है जबकि सिर्फ एक सीट गोशामहल पर भाजपा का कब्जा है. असदुद्दीन ओवैसी 1994 में चारमीनार विधानसभा से पहले बार विधायक तो 2004 में हैदाराबाद सीट से सांसद बने थे.

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First published: March 20, 2019, 4:08 PM IST
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