कोविड-19: जान हथेली पर रखकर मरीजों का इलाज करने जाते हैं असम के डॉक्टर, सुनिए उनका दर्द

ड्यूटी के दौरान हाथ में डंडा लिए विरोध-प्रदर्शन करते असम के डॉक्टर.

ड्यूटी के दौरान हाथ में डंडा लिए विरोध-प्रदर्शन करते असम के डॉक्टर.

Assam Corona Treatment Doctors Life Risk: आईएमए की रिपोर्ट के अनुसार देश में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान 646 डॉक्टरों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. असम में अब तक कुल 8 डॉक्टरों की जान गई है.

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(तूलिका देवी)


गुवाहाटी. अभी हाल ही में असम के एक डॉक्टर की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी जिसमें उन्हें छड़ी लेकर मरीज़ को देखने अस्पताल आते दिखाया गया है. इस डॉक्टर का नाम है दिगंत बोरा जो भोगेश्वरी फूकन्नी सिविल अस्पताल, नगाओ में काम करते हैं. एक जूनियर चिकित्सक डॉक्टर सेउज सेनापति पर हुए हमले के ख़िलाफ़ उनका यह विरोध प्रदर्शन था. अपने सहयोगी डॉक्टर के साथ हमदर्दी दिखाते हुए डॉक्टर दिगंत बोरा ने बताया कि वो और उनके सहयोगी अन्य डॉक्टर इसी तरह के डर से रोज़ गुजरते हैं.


बोरा ने कहा, ‘मैंने अपने पूरे जीवनभर मोरीगाओं के कई अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों में काम किया है. कई बार हमने मरीज़ों का उनके मां-बाप से मिली धमकियों के बीच इलाज किया है. चर क्षेत्र के गुंडे अमूमन हमें धमकाते रहते हैं. इसीलिए मैंने छड़ी लेकर यह सांकेतिक विरोध प्रकट किया है.' डॉक्टर दिगंत बोरा ने न्यूज़18 से कहा, 'हम भगवान नहीं हैं. हम भी आदमी हैं. हमारी क्षमता सीमित है. हम इसी सीमित क्षमता से सेवा करते हैं, लेकिन लोग कब हमें समझेंगे?'

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नया नहीं है असम के डॉक्टरों पर हमला

डॉक्टर सेउज सेनापति पर कोविड-19 से ग्रस्त मरीज़ के मर जाने के बाद उसके रिश्तेदारों ने जो हमला किया उसके बाद डॉक्टर काफ़ी डरे हुए हैं, लेकिन असम में डॉक्टरों पर इस तरह का हमला नया नहीं है. इस जघन्य हमले ने उन डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के उत्साह को चकनाचूर कर दिया है जो महामारी के इस समय में अपने जान को जोखिम में डालकर मरीज़ों की जान बचाने में लगे रहते हैं. असुरक्षा से भयभीत कुछ इलाक़ों में तैनात ये कोविड लड़ाके काम करने के लिए सुरक्षित माहौल की मांग कर रहे हैं.



डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की जान को दोगुना खतरा

नगरों और शहरी क्षेत्रों में डॉक्टर और मरीज़ बराबर अख़बारों की सुर्ख़ियों में रहते हैं, लेकिन कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान दूर-दराज के क्षेत्रों में तैनात डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की जान को ख़तरा दोगुना बढ़ गया है. महामारी की चुनौतियों का सामना करने के लिए टीकाकरण और इलाज की सुविधा पर्याप्त नहीं है और इस स्थिति में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को दूर-दराज के क्षेत्र में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने में काफ़ी मुश्किलें पेश आ रही हैं.

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मरीज़ के रिश्तेदार करते हैं बदसलूकी

डॉक्टर पूजारानी बोरा नलतली, कोलीयाबार में काम करती हैं. उन्होंने भी बताया कि उनके साथ मरीज़ के रिश्तेदारों ने कई बार बदसलूकी की है. उन्होंने कहा कि महिला डॉक्टर होने के कारण मरीजों के रिश्तेदारों से उन्हें गालियां सुननी पड़ती हैं और उन्हें लगातार धमकियां देते रहते हैं. कई बार उन्होंने स्वास्थ्य विभाग से किसी सुरक्षित जगह पर अपने तबादले का आग्रह किया है. उनके पति डॉक्टर हिमांशु शेखर नाथ भी डॉक्टर हैं, पर जहां वह काम करते हैं वह अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह है.

कुछ मरीज राजनीतिक रसूख़ का भी दिखाते हैं डर

यह स्पष्ट है कि इस तरह की चुनौतियों के बीच अधिकांश डॉक्टर लोगों का इलाज करने में हिचकिचा रहे हैं, ये अलग बात है कि वे इस बारे में खुलकर नहीं बोलते. वे हमेशा इस बात से डरे रहते हैं कि उन्हें कभी भी किसी मरीज़ के रिश्तेदार के ग़ुस्से का सामना करना पड़ सकता है. कोविड महामारी के समय में उनके जीवन को यह ख़तरा दोगुना बढ़ गया है. 'मुझ पर कई बार हमले हुए हैं', यह कहना है नगाओ के समगुरी स्थित कवोईमरी अस्पताल के एक डॉक्टर का. डॉक्टर ने अपना नाम बताने से मना कर दिया. उन्होंने दावा किया, 'कुछ मरीज़ अपने राजनीतिक रसूख़ का डर दिखाते हैं. जब कोई मरीज़ मर जाता है, हम अपने जान की सुरक्षा के लिए डरने लगते हैं, पर इसके बावजूद हम अपनी ड्यूटी करते हैं.'

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चाय बाग़ान क्षेत्र में कई डॉक्टरों ने इस बारे में अपनी चिंता जतायी. दो साल पहले एक वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर देवेन दत्ता को अपनी जान गंवानी पड़ी क्योंकि असम के टेओक क्षेत्र के चाय बाग़ान के कुछ ग़ुस्साए कामगारों ने उन पर हमला कर दिया. उन पर हमला करनेवाली भीड़ में ऐसे लोग भी थे जो उनके इलाज की वजह से बचे हुए थे और कम उम्र से ही उनसे इलाज करा रहे थे. इस घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी.


तब से चाय बाग़ान क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने वाले कई डॉक्टरों ने कई बार अपने ऊपर ख़तरे की बात कही है. ऐसे ही एक डॉक्टर ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, 'सीमित सुविधाओं के बावजूद हम लोगों का इलाज करते रहे हैं. जब किसी मरीज़ को ज़्यादा बड़ी परेशानी होती है, हम उसको बेहतर अस्पताल भेजते रहे हैं. हमें डर लगा रहता है कि मरीज़ के रिश्तेदार हम पर कभी भी हमला कर सकते हैं.'


कुछ दूसरे चाय बाग़ानों में काम करनेवाले डॉक्टरों ने कहा कि निरंतर डर बने रहने के कारण वे चाय बाग़ान के क्षेत्र में काम नहीं करना चाहते हैं. चाय कामगार अमूमन डॉक्टरों की इज्जत करते हैं और उनकी मदद करते हैं, पर अचानक परिस्थितियां बदलने के कारण उनकी सोच में बदलाव का डर रहता है. इसलिए अधिकांश डॉक्टर डरे हुए रहते हैं.


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दूसरी ओर, कुछ ऐसे भी डॉक्टर हैं जो इस तरह के किसी डर का अनुभव नहीं करते. ऐसे ही एक डॉक्टर ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि चाय बाग़ान के जिस अस्पताल में वह काम करते हैं उसमें कई बुनियादी सुविधा जैसे कि पानी की उपलब्धता नहीं है. इस तरह के अभाव के बीच लोगों को इलाज उपलब्ध कराना आसान नहीं है. चाय बाग़ान के कर्मियों को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि चाय बाग़ान के क्षेत्र में लंबे समय से काम करते हुए उन्होंने कभी भी असुरक्षित महसूस नहीं किया.


डॉक्टर ने कहा, 'यहां सुविधाओं की कमी है, जबकि इसी स्थिति में लंबे समय से चाय बाग़ान कर्मियों को स्वास्थ्य सुविधाएं दी जा रही हैं. मैं यहां रहता हूं और मुझे कोई डर नहीं है. मैं दूसरे चिकित्सकों को भी कहता हूँ कि डरने की कोई बात नहीं है, पर मुझे पता है कि उनके मन में डर बसा हुआ है.'



आईएमए (IMA) की रिपोर्ट के अनुसार देश में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान 646 डॉक्टरों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. असम में अब तक कुल 8 डॉक्टरों की जान गई है. इस कठिन समय में यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो गया है कि चाय बाग़ान और दूर-दराज के क्षेत्रों में काम करनेवाले डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों के मन से डर दूर करने के लिए विशेष कदम उठाए जाएं और उनमें सुरक्षा की भावना भरी जाए ताकि वे बिना किसी डर के अपना कर्तव्य पूरा कर सकें.

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