असम में NRC ने परिवारों को बांटा, किसी को अपनाया तो कोई हुआ पराया

प्रशासन का कहना है कि जिन लोगों को एनआरसी में जगह नहीं मिली है उन्‍हें एक महीने के अंदर दोबारा से आवेदन करने का मौका मिलेगा.

News18Hindi
Updated: July 30, 2018, 11:53 PM IST
असम में NRC ने परिवारों को बांटा, किसी को अपनाया तो कोई हुआ पराया
(News18 Creative by Mir Suhail)
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Updated: July 30, 2018, 11:53 PM IST
असम में राष्‍ट्रीय नागरिक रजिस्‍टर (एनआरसी) का दूसरा ड्राफ्ट जारी हो गया और जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था इसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं. एनआरसी प्रशासन ने व्‍यक्तिगत निजता का हवाला देते हुए निकाले जाने की वजह नहीं बताई. जो लोग इसमें जगह नहीं बना सके उनके लिए दो कैटेगरी बनाई गई है. एक का नाम है 'खारिज' और दूसरे का 'ऑन हॉल्‍ड.' पहली कैटेगरी में 2.48 लाख लोग हैं और ट्रिब्‍यूनल ने इन्‍हें विदेशी घोषित किया है. इनके अलावा संदेह के घेरे वाले लोग भी इसी कैटेगरी में हैं. वहीं 3.8 लाख लोगों की अर्जी खारिज कर दी गई और इसका कोई कारण भी नहीं बताया गया है.

प्रशासन का कहना है कि जिन लोगों को एनआरसी में जगह नहीं मिली है उन्‍हें एक महीने के अंदर दोबारा से आवेदन करने का मौका मिलेगा. जमीनी हकीकत के अनुसार लिस्‍ट से निकाले गए ज्‍यादातर लोग ऐसे हैं जो गांवों में रहते हैं और वे अनपढ़ हैं. हालांकि कुछ पढ़े-लिखे और संपन्‍न लोगों को भी जगह नहीं मिली है. न्‍यूज18 ने लिस्‍ट में जगह न पाने वाले लोगों से बात की और उनकी चिंताएं सुनी.

36 साल के सरकारी अध्‍यापक और मशहूर कवि शफीउद्दीन अहमद असम के बारपेटा जिले के कायाकुची इलाके में रहते हैं. लिस्‍ट में नाम न आने से वे हैरान हैं. उनके दो भाई-बहनों का भी नाम नहीं है. उन्‍होंने बताया, 'हमारे पास कई दस्‍तावेज थे लेकिन फिर भी निश्चिंत होने के लिए हमें पासपोर्ट जमा कराया था. हमारे नाम पहली लिस्‍ट में नहीं थे लेकिन मुझे 100 फीसदी भरोसा था कि आखिरी ड्राफ्ट में हमारा नाम आ जाएगा.'

36 साल के सरकारी अध्‍यापक शफीउद्दीन अहमद का नाम एनआरसी में नहीं है.


अहमद राजनीति से जुड़े परिवार से आते हैं. उनके पड़दादा पहर खान 1952 में ताराबारी विधानसभा से विधायक चुने गए थे. उनके नाना मुख्‍तार हुसैन खान वर्तमान में असम बीजेपी के अल्‍पसंख्‍यक मोर्चे के अध्‍यक्ष हैं. उनके परिवार में 12 लोग हैं और इनमें से नौ का नाम एनआरसी में है.

कुछ ऐसी ही कहानी 25 साल की मासूमा बेगम की है. वह ऑल असम माइनोरिटी स्‍टूडेंट्स यूनियन(आम्‍सू) की केंद्रीय समिति की सदस्‍य हैं. साथ ही वह कॉटन यूनिवर्सिटी यूनियन की असिस्‍टेंट जनरल सेक्रेटरी भी रह चुकी हैं. बेगम का कहना है कि उनका नाम ड्राफ्ट से निकाल दिया गया जबकि उन्‍होंने और उनके भाई-बहनों ने एक जैसे दस्‍तावेज ही दिए थे. वह सवाल करती हैं कि उनके माता-पिता और तीन भाई-बहनों के नाम लिस्‍ट में कैसे आ गए. उन्‍होंने अधिकारियों पर बचकाना हरकतें करने का आरोप भी लगाया.

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25 साल की मासूमा बेगम के माता-पिता और तीन भाई बहनों के नाम लिस्‍ट में है जबकि उनका नहीं है.

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टाटा इंस्‍टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से ग्रेजुएट और मशहूर बाल अधिकार कार्यकर्ता 26 साल की ईशानी चौधरी का नाम भी लिस्‍ट में नहीं है. उनको डर है कि लिस्‍ट में नाम न होने से कहीं संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार आयोग के जेनेवा में होने वाले कार्यक्रम में शामिल होने पर पानी न फिर जाए. उन्‍होंने फोन पर बताया, 'मुझे 28 सितम्‍बर को जेनेवा में जनरल डिस्‍कशन में हिस्‍सा लेना है. मुझे चिंता हो रही है कि एनआरसी में नाम न होने से कहीं पासपोर्ट मिलने पर बुरा असर न पड़ जाए.' एनआरसी में उनकी मां और दादी का नाम है जबकि ईशानी व उनकी बहन का नहीं.

मशहूर बाल अधिकार कार्यकर्ता 26 साल की ईशानी चौधरी का नाम भी लिस्‍ट में नहीं है.


एनआरसी में नाम न होने से परेशान लोगों के बीच कुछ ऐसे भी हैं जिन्‍हें इस लिस्‍ट में शामिल होने की उम्‍मीद हैं. उदरगुरी जिले के मुसाबिरुल हक पेशे से अध्‍यापक हैं. उन्‍हें उम्‍मीद है कि दावे और आपत्तियों वाली प्रक्रिया के बाद उनका नाम इस लिस्‍ट में आ जाएगा. बकौल हक, 'मेरे परिवार के कुछ लोगों के नाम ड्राफ्ट में नहीं है लेकिन मैं चिंतित नहीं हं. फाइनल एनआरसी में हमारा नाम आ जाएगा.' हालांकि वह यह भी कहते हैं कि एनआरसी को लोगों को निकालने के लिए तैयार किया गया है. हक के अनुसार, 'जोर इस बात पर है कि विदेशी मुक्‍त एनआरसी बनाया जाए लेकिन जोर असली भारतीय नागरिकों को निकाले नहीं जाने पर होना चाहिए था.'

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उदरगुरी जिले के मुसाबिरुल हक पेशे से अध्‍यापक हैं. उन्‍हें उम्‍मीद है कि दावे और आपत्तियों वाली प्रक्रिया के बाद उनका नाम इस लिस्‍ट में आ जाएगा.


एक उदाहरण देते हुए उन्‍होंने बताया कि एनआरसी अधिकारियों ने गरीब और अनपढ़ नागरिकों को जांच पड़ताल के दौरान पढ़े लिखे लोगों या वकीलों से मदद लेने से रोक दिया. हक ने बताया, 'मेरी जांच पड़ताल के दौरान जब हम लोग लाइन में लगे हुए थे तब उस अधिकारी ने एक व्‍यक्ति से इसलिए बदसलूकी की क्‍योंकि वह ठीक से जवाब नहीं दे पाया. वह आदमी डर के मारे कांप रहा था. जब मैंने उसकी मदद करनी चाही तो उस अधिकारी ने यह कहते हुए रोक दिया कि कोई दूसरा आदमी मदद नहीं कर सकता.'

अहमद का मानना है कि राजनीतिक दबाव में जान बूझकर लोगों को बाहर रखने की कोशिश की गई. उनका कहना है, 'चुनिंदा दलों की उम्‍मीदों को पूरा करने के लिए हमारे नामों को हटाया गया. हम किसी भी कीमत पर भारतीय नागरिकता साबित करेंगे और इसमें कोई शक नहीं. लेकिन देश को बनाने में जो प्रयास और ताकत लगनी चाहिए थी वह अब राष्‍ट्रीयता साबित करने में खर्च हो जाएगी.'

उन्‍होंने आगे कहा कि जो व्‍यक्ति समाज के सबसे निचले पायदान पर है और दो वक्‍त की रोटी के लिए भी जूझता है वह सरकारी मशीनरी से कैसे लड़ेगा.
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