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Assam NRC List: खुद को भारत का नागरिक साबित करने के लिए लोगों को करनी पड़ी ये जद्दोजहद

कई लोगों ने नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज बचाने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया.

कई लोगों ने नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज बचाने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया.

असम (Assam) के बक्सा जिले में गोबिंदा नंदी और उनके परिवार का नाम एनआरसी (National Register of Citizens) में नहीं है. नं ...अधिक पढ़ें

    असम में पिछले एक दशक से चली आ रही एनआरसी (National Register of Citizens) की प्रक्रिया को शनिवार को अंतिम रूप दे दिया गया. एनआरसी के संयोजक प्रतीक हजेला ने बताया कि फाइनल एनआरसी में तीन करोड़ 11 लाख लोगों के नाम शामिल किए गए हैं, जबकि करीब 19 लाख लोग इसमें जगह नहीं पाए हैं. इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने रजिस्टर में अपना नाम शामिल करने का कोई दावा नहीं किया.

    असम (Assam) में NRC की फाइनल लिस्ट में जिनके नाम शामिल हैं, वे ही देश के नागरिक माने जाएंगे. हालांकि लिस्ट से बाहर छूट गए लोगों के पास अब भी अपील का अधिकार है. यहां खुद को भारत का नागरिक साबित करने के लिए लोगों को यहां काफी जद्दोजहद करते देखा गया.

    हैदर के पास 1962 और 1966 के दस्तावेज हैं
    इन्हीं लोगों में मोरीगांव जिले के लारीघाट के निवासी हैदर अली भी शामिल है, जिन्हें अपनी नागरिकता (Citizenship) साबित करने के लिए अपने कई स्टील ट्रंक की याद आई, जिसमें वो तमाम दस्तावेजों को जमा करके रखता था. उन्होंने न्यूज़18 को बताया, 'ये दस्तावेज़ हमारे वजूद के लिए हैं. अपनी नागरिकता को बचाने के लिए मैंने अपने दस्तावेजों को सहेज कर रखा हुआ है. इन्हीं दस्तावेजों की वजह से मेरा परिवार बच जाएगा. मेरे पास 1962 और 1966 के दस्तावेज हैं. मेरे पास मेरे जमीन के रिकॉर्ड हैं. मैंने एनआरसी के लिए ये दस्तावेज जमा किए, ताकि मेरा परिवार शांति से यहां रह सके."

    एनआरसी प्रक्रिया के शुरू होने से दशकों पहले तक हैदर एक फाइल फोल्डर के अंदर सील करके प्लास्टिक की पतली शीट के भीतर नागरिकता के अपने सबूतों को बड़े कायदे से लपेट कर रखते आए हैं. बिस्तर के नीचे सिल्वर स्टील का ट्रंक में चार लोगों के परिवार के तमाम दस्तावेजों के कई फाइल फोल्डर सुरक्षित स्थिति में मौजूद हैं.

    हैदर ने कहा, 'हमारी नागरिकता के लिए ये महत्वपूर्ण दस्तावेज कई हाथों से होकर गुजरे हैं.' पिछले 50 से भी ज्यादा सालो में एनआरसी को 3.9 करोड़ आवेदकों ने 6.6 करोड़ दस्तावेजों को जमा करने में कामयाब रहे. इन सभी दस्तावेजों को एनआरसी प्रक्रिया में नागरिकता के प्रमाण के तौर पर जमा किया गया है.

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    NRC में नाम जोड़ने के लिए आवेदन करते लोग.


    बिस्वास ने बताई आपबीती
    न्यूज़18 ने असम के शैक्षणिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रसेनजीत बिस्वास से इस बदलाव के बारे में बात की. उन्होंने कहा कि लोगों ने दशकों की मेहनत के बाद इन दस्तावेजों को इकठ्ठा किया है. इनमें से कुछ कागजात आज एनआरसी के अदालत के सामने नहीं ठहर पाएंगे. आगे उन्होंने कहा, 'तय अवधि पर कानून के मुताबिक 1971 में जो दस्तावेज जारी किया गया था, वो आज के समय में सरकार के पास नहीं हो सकता है.  कई आवेदक इस समस्या का सामना कर रहे हैं, क्योंकि सरकार की नजर में उसका रिकॉर्ड गैरमौजूद रह सकता है.'

    बिस्वास ने उस समय को याद किया जब उन्होंने गुवाहाटी में एक एनआरसी सेवा केंद्र में अपने पिता के 1955 का नागरिकता प्रमाण पत्र जमा किया था. अधिकारियों ने कहा कि वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि कोई बैकएंड कॉपी नहीं है.

    बिस्वास ने बताया, 'हम दस्तावेजों को रखने के पारंपरिक तरीके से आधुनिक तरीके को अपना रहे हैं. 1950-60 के दशक में गांवों में लोग बांस के बड़े टुकड़ों के अंदर खोखली जगह में जरूरी कागजात रखा करते थे. 1970 के दशक के बाद से अलमीरा में रखने लगे. बाढ़ के दौरान, लोगों ने अपने घरों के अंदर ऊंची जगहों पर दस्तावेजों को रखना शुरू किया.'

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    NRC की स्थिति को जाहिर करती तस्वीर.


    अरफान अली ने दस्तावेज बचाने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया

    जुलाई 2019 में जब बाढ़ आई तो मोरीगांव जिले में अपने परिवार के साथ रहने वाले अरफान अली ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर एनआरसी के दस्तावेजों को बचाया. बाढ़ के बढ़ते पानी की वजह से उनको शारीरिक नुकसान का सामना कराना पड़ा और अंत में बाढ़ के पानी की वजह से उनका सारा दस्तावेज बेकार हो गया. उन्होंने न्यूज़18 को बताया, 'मेरे परिवार में चार सदस्य हैं. हम सभी ने एनआरसी के लिए आवेदन किया. पहले ड्राफ्ट में चार में से तीन का नाम था. मेरी पत्नी को छोड़ दिया गया था. मैंने अपनी पत्नी को सूची में शामिल करने का दावा किया है, लेकिन बाढ़ ने मेरे सभी दस्तावेजों को बर्बाद कर दिया. बाढ़ में मेरा घर भी बह गया.' अरफान के लिए अंतिम एनआरसी का प्रकाशन उनके परिवार के लिए भारतीय नागरिकता को बनाए रखने के लंबे इंतजार का अंत है. आगे उन्होंने कहा, '1960 के दशक के हमारे दस्तावेज हमसे ज्यादा लंबे समय तक जिंदा रहेंगे.'

    गोबिंदा नंदी और उनके परिवार का नाम एनआरसी में नहीं
    असम के बक्सा जिले में गोबिंदा नंदी और उनके परिवार का नाम एनआरसी में नहीं है. नंदी ये नहीं समझ पा रहे हैं कि सही दस्तावेजों के बावजूद वो अपनी नागरिकता साबित करने में कैसे असफल रहे, उन्होंने दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए अपने पिता की बातों को याद किया.

    उन्होंने कहा, "मेरे भाई-बहन और मैं बहुत छोटा था जब मेरे पिता ने पहली बार इन दस्तावेज़ों को रखने के लिए एक फोल्डर खरीदा था. जब मैं बड़ा हो रहा था तो हमें अपने स्कूल की आंसरसीट को भी सबूत के तौर पर सुरक्षित रख रहे थे. दूसरे लोगों की जिंदगी में ये चीजें मायने नहीं रखती हैं, लेकिन वे इस धरती पर हमारे वजूद के सबूत हैं.' नंदी ने 1964 से अपने पिता के मूल स्थायी निवास प्रमाण पत्र और एनआरसी के लिए 1968 से स्कूल प्रवेश दस्तावेज जमा किया था. ऐसी कई कहानियों के साथ असम के लोगों के लिए एनआरसी के समक्ष अपनी नागरिकता का सबूत पेश करना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है.

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    Tags: Assam, Guwahati, India, NRC Assam

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