NRC: मतुया समुदाय का सवाल- लौटे तो मारे जाएंगे क्‍या आप अपनाएंगे

असम का एक बांग्लादेशी समुदाय मतुया भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ है. असम में तकरीबन 5 लाख मतुया समुदाय के लोगों के नाम खारिज होने का दावा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 19, 2018, 7:21 PM IST
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असम के NRC ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों को भारत का नागरिक नहीं माना गया है. इस मुद्दे पर संसद में हंगामा भी हुआ और सड़क पर राजनीति भी. लेकिन असम का एक बांग्लादेशी समुदाय मतुया भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ है. असम में तकरीबन 5 लाख मतुया समुदाय के लोगों के नाम खारिज होने का दावा है. इन लोगों के तमाम रिश्तेदार पश्चिम बंगाल में भी हैं जो बंगाल में आन्दोलन कर रहे हैं. इन्हें लगता है कि बंगाल में NRC अगर तैयार हुआ तो इनकी भी नागरिकता जाने का खतरा हो जाएगा. इस समुदाय के लोगों का कहना है कि लौटे तो मारे जाएंगे तो क्‍या भारत उन्‍हें अपनाएगा.

असम में एनआरसी ड्राफ्ट के मुताबिक उन 40 लाख लोगों की भारतीय नागरिकता पर तलवार लटकी है जो ज़रूरी दस्तावेज नहीं दे पाए हैं. सरकार का कहना है कि यह फाइनल ड्राफ्ट नहीं है. लेकिन लोगों का कहना है कि शरणार्थी और घुसपैठियों में फर्क साफ़ हो. भारत में लाखों लोग शरण लेने आए तो लाखों लोग अवैध तौर पर भी घुस आए.

बीजेपी और तृणमूल दोनों ही अब एनआरसी पर आमने सामने हैं. बीजेपी घुसपैठियों को निकालने के दावे कर रही है तो तृणमूल मानवाधिकारों का मुद्दा उठा रही है. 2019 के चुनावों के लिए अब बंगाल और असम में NRC बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. ऐसे में पूर्व बंगाल से आकर भारत में बसे मतुया समुदाय के लाखों लोग इस राजनीति का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं.



कोलकाता से 65 किलोमीटर दूर ठाकुरनगर वो जगह है जहां विभाजन के बाद पहली शरणार्थी कॉलोनी बनाई गई थी. आज इस कॉलोनी में मतुया समुदाय की बड़ी आबादी रहती है.
पश्चिम बंगाल में मतुया समुदाय की आबादी करीब दो करोड़ बताई जाती है. ये सभी बांग्लादेश से अलग-अलग समय पर भारत पहुंचते रहे हैं.
ठाकुरनगर के अलावा भी पश्चिम बंगाल में कई जगह मतुया समुदाय के लोग हैं
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असम के NRC ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों को भारत का नागरिक नहीं माना गया है. (AP Photo/Anupam Nath)


कौन हैं मतुया समुदाय
मतुया समुदाय हिन्दू धर्म से निकला है. मतुया समुदाय की शुरुआत पूर्वी बंगाल के फ़रीदपुर ज़िले के ओराकान्दी से हुई. हरिचंद ठाकुर मतुया समुदाय के संस्थापक थे. समुदाय के लोग मतुया को अलग धर्म मानते हैं. विभाजन के बाद ठाकुरनगर में प्रमथा रंजन ठाकुर ने पहली शरणार्थी कॉलोनी बनाई. ठाकुरनगर मतुया समुदाय का आस्था केंद्र है. कॉलोनी के संस्थापक प्रमथा रंजन ठाकुर की पत्नी बिनापानी ठाकुर अब समुदाय की आध्यात्मिक मुखिया हैं. उन्‍हें बड़ी मां कहा जाता है और उनके दर्शन के लिए लोग दूर दूर से आते हैं.

ऑल इंडिया मतुया महासंघ के सेक्रेटरी सुकेश चौधरी ने बताया कि मतुया धर्म एक विचारधारा है. यह मानवतावादी है और दलित-पिछड़ों के लिए है. यह ब्राह्मणवाद के खिलाफ विरोध के साथ शुरू हुआ. मतुया महासंघ के सदस्‍य मृदुल रंजन बिस्वास ने कहा, 'हम लोग 1947 के बाद यहां आए. हम 48 में आए. हर साल लोग आ रहे हैं. 1971 में भी इधर लोग आए. अभी भी बांग्लादेश से यहां लोग आ रहे हैं. मतुया अभी भी असम में हैं.'

एक अनुमान के अनुसार भारत में अब 5 करोड़ मतुया रहते हैं जिनमें से अधिकतर वोटर बन चुके हैं.
असम में 10 लाख की मतुया आबादी में तकरीबन आधी आबादी यानी 5 लाख लोग नागरिकता साबित नहीं कर पाए. कई परिवार ऐसे हैं जिनके रिश्तेदार पश्चिम बंगाल में रहते हैं. अपने लोगों की तकलीफ में मतुया बंगाल में आन्दोलन पर हैं. ये लोग रेल रोको, पथ सभा और कई कार्यक्रम चला रहे हैं.

मतुया समुदाय किस दिशा में चलेगा इस मामले पर समुदाय के दो नेतृत्व दिखते हैं. आल इंडिया मतुया महासंघ के दफ्तर के पास ही शांतनु ठाकुर रहते हैं जो सारा भारत मतुया महासंघ के संघाधिपति हैं. उन्‍होंने बताया, 'हमारी संख्या चार लाख से ज़्यादा है. 1971 के बाद जो आए बाहर कर देंगे. नेहरू ने कमिटमेंट दिया था जो भी इस देश में आएंगे नागरिक होंगे. बीजेपी बंगाल से दिलीप घोष पूछने आए थे. उन्‍होंने आश्वासन दिया था कि हिन्दू मतुया रहेंगे. राजनीतिक लाभ सभी लेना चाहते हैं लेकिन जो विकास करेगा वही वोट पाएगा. असम में भाजपा का समर्थन किया था.'

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(AP Photo/Anupam Nath)


'अपने' लोगों के लिए आन्दोलन
मतुया समुदाय के परिवार बंगाल और असम के बीच बसे हुए हैं. इनके रिश्तेदार दोनों राज्यो में बसे हैं. इसी समुदाय के हेमंत अभी पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन साथ-साथ आंदोलन में भी जुटे हुए हैं. अपने रिश्तेदारों की नागरिकता जाते हुए देखकर हेमंत लड़ाई में जुट गए हैं. उन्‍होंने बताया, 'असम के तरुणगांव में मेरी फूफी-फूफा रहते हैं. उनका नाम एनआरसी में नहीं आया. मैं मथुया समाज से हूं. कई लोग बिना देश के हो गए हैं इसलिए आंदोलन कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हमारा समर्थन किया है. हम चाहते हैं नागरिकता मिले हम बरसों से रह रहे हैं.'

असम में बाहर से आए लोगों के साथ सख्ती नई बात नहीं है. घुसपैठ के खिलाफ प्रशासन सक्रिय होता है तो कुछ ऐसे लोग भी चपेट में आ जाते हैं जिनके परिवार 70 से पहले भारत में आ बसे थे.
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एनआरसी बंगाल की राजनीति बदल सकता है. ऐसे में मतुया इस परिभाषा में किस तरफ होंगे? बीजेपी का कहना है कि शरणार्थी आने वाले सिटिज़न बिल में संशोधन के तहत नागरिकता पाएंगे, केवल घुसपैठिए ही भगाये जाएंगे. बंगाल बीजेपी के अध्‍यक्ष ने कहा, ' गड़बड़ की वजह से 40 लाख लोगों का नाम डॉक्‍यूमेंट में नहीं आया. हर शरणार्थी जो मजबूरी के कारण आया है उसे नागरिकता मिलेगी.'

मतुया कई दशकों से एक अनिश्चित भविष्य के साथ जी रहे हैं. असम और बंगाल में अब समस्याएं बढ़ रही हैं. मतुया जान बचाकर बांग्लादेश से भारत आए थे अब डर है कि कहीं फिर से पलायन ना करना पड़े.
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