विधानसभा चुनाव 2018: क्या अनुसूचित जातियों के गुस्से ने छीनी BJP से सत्ता?

विधानसभा चुनाव 2018: क्या अनुसूचित जातियों के गुस्से ने छीनी BJP से सत्ता?
अहमदाबाद में प्रदर्शन करते अनुसूचित जाति के लोग (फाइल फोटो)

2013 के विधानसभा चुनावों में तीनों राज्यों की कुल 78 आरक्षित सीटों में से 68 सीटें बीजेपी के पास थी हालांकि 2018 में ये आंकड़ा घटकर सिर्फ 31 रह गया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 18, 2018, 9:45 AM IST
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मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता में वापसी कर चुकी है और तीनों ही राज्यों में अध्यक्ष राहुल गांधी के चुने हुए सीएम शपथ ले चुके हैं. तीनों राज्यों में ग्रामीण इलाके के लोगों ने बीजेपी को नकार दिया है. तीनों राज्यों की कुल 424 ग्रामीण इलाकों की सीटों में से बीजेपी के हिस्से सिर्फ 153 सीटें आई हैं जबकि 236 सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है. सिर्फ इतना ही नहीं आरक्षित सीटों पर भी बीजेपी को काफी नुकसान उठाना पड़ा है. 2013 के विधानसभा चुनावों में तीनों राज्यों की कुल 78 में से 68 सीटें बीजेपी के पास थी हालांकि 2018 में ये आंकड़ा घटकर सिर्फ 31 रह गया है.

अनुसूचित जातियों ने बीजेपी से छीनी सत्ता!
आरक्षित सीटों पर तीनों ही राज्यों में बीजेपी को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है जबकि इसका सीधा फायदा बीएसपी को न होकर कांग्रेस हुआ है. 2013 के विधानसभा चुनावों में तीनों राज्यों में आरक्षित सीटों पर कांग्रेस को काफी नुकसान उठाना पड़ा था. कांग्रेस के हिस्से उस वक़्त तीनों राज्यों में सिर्फ 5 सीटें आईं थीं.हालांकि 2018 में काफी कुछ बदल गया है और तीनों राज्यों की कुल 78 आरक्षित सीटों में से कांग्रेस ने 43 पर जीत दर्ज की है.


जानकारों के मुताबिक एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में हुई हिंसा की घटनाओं ने बीजेपी के खिलाफ माहौल तैयार किया। जबकि इस साल की शुरुआत में ही CSDS के सर्वे में तीनों राज्यों में 22% दलितों ने बीजेपी के पक्ष में अपनी राय दी थी और कांग्रेस 23% के साथ सिर्फ 1% से ही आगे थी.



तीनों ही राज्यों में बुरी हालत
सबसे पहले मध्य प्रदेश की बात करें तो कुल 35 रिजर्व सीटों में से साल 2013 में बीजेपी ने 28 जीती थीं लेकिन 2018 में वो सिर्फ 18 पर ही सिमट गई है जबकि कांग्रेस 4 से 17 पर पहुंच गई है. राजस्थान की भी कुछ ऐसी ही कहानी है. कांग्रेस जिसके पास 2013 में एक भी आरक्षित सीट नहीं थी उसने 2018 में 19 सीटों पर जीत हासिल की है जबकि पहले 31 सीटों पर जीतने वाली बीजेपी 10 पर सिमट गई है. छत्तीसगढ़ में भी दलितों के बीजेपी से दूर होने का सीधा फायदा कांग्रेस को हुआ है. कांग्रेस ने यहां 2013 में सिर्फ 1 रिजर्व सीट जीती थी जो 2018 में बढ़कर 7 हो गयी हैं जबकि बाजेपी 9 सीटों से अब 2 सीटों तक सिमट कर रह गई है.



अनुसूचित जातियां क्यों नाराज़ हैं ?
राजस्थान, गुजरात और यूपी में कई जगहों पर दलितों के साथ हुई अत्याचार की घटनाओं के बाद खुद पीएम नरेंद्र मोदी को सामने आकर कहना पड़ा था कि 'मेरे दलित भाइयों पर वार करना बंद कीजिए, अगर वार करना है तो मुझ पर हमला कीजिए'. इन अनुसूचित जातियों की एट्रोसिटी की घटनाओं को विपक्ष ने लगातार मुद्दा बनाए रखा है. इसके आलावा बीजेपी अपना प्रेम लगातार दिखाती रही है लेकिन, एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के बाद सवर्णों के निशाने पर आई मोदी सरकार कई अनुसूचित जातियों के नेताओं की नाराजगी झेल रही है. इसका उदाहरण बहराइच से बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले का इस्तीफ़ा देना भी है. बीजेपी नेतृत्व में मौजूद कई छोटे-बड़े दलित नेता सरकार के प्रति नाराज़गी जाहिर करती रहे हैं.

मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रामदास अठावले ने खुलकर कह दिया है कि जैसे ही उन्हें हवा का अंदाज़ा लगेगा वो बीजेपी से किनारा करने में देर नहीं लगाएंगे। इंडियन जस्टिस पार्टी के संस्थापक रहे उदित राज भी मोदी सरकार से नाराज़ हैं उन्होने आरक्षण खत्म होने की मुद्दा उठाते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार पर उनकी बातों को अनसुना करने का आरोप लगाया था. इससे पहले उदित राज बोल चुके हैं कि मोदी सरकार के दलित मंत्री समुदाय के प्रति अपना फर्ज भूल गए हैं. इस वजह से दलित समाज बीजेपी से दूर जा रहा है.



उत्तर प्रदेश के रॉबर्ट्सगंज से बीजेपी सांसद छोटेलाल खरवार भी सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार से अपनी नाराजगी जग जाहिर कर चुके हैं. उन्होंने पीएम मोदी को एक चिट्ठी भी लिखी है कि सीएम ने उन्हें डांटकर भगा दिया था. इसी तरह यूपी के इटावा से सांसद अशोक दोहरे भी सीएम योगी समेत बीजेपी नेताओं के खिलाफ अपना गुस्सा निकाल चुके हैं. उन्होंने पीएम मोदी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि '2 अप्रैल को 'भारत बंद' के बाद एससी/एसटी वर्ग के लोगों को उत्तर प्रदेश सहित दूसरे राज्यों में सरकारें और स्थानीय पुलिस झूठे मुकदमे में फंसा रही है. उन पर अत्याचार हो रहा है.' उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस निर्दोष लोगों को जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए घरों से निकाल कर मारपीट कर रही है. इससे इन वर्गों में गुस्सा और असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है.

यूपी के नगीना से बीजेपी सांसद यशवंत सिंह भी दलितों को लेकर मोदी सरकार से नाराजगी जता चुके हैं. यशवंत सिंह ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि उनकी ओर से 4 साल में 30 करोड़ की आबादी वाले दलित समाज के लिए प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी नहीं किया गया. बैकलॉग पूरा करना, प्रमोशन में आरक्षण बिल पास करना, प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण दिलाना आदि मांगें नहीं पूरी की गईं. उन्होंने पीएम मोदी को खत लिखकर कहा था कि बीजेपी के दलित सांसद प्रताड़ना के शिकार बन रहे हैं.

दलित राजनीति की ताकत
देश की कुल जनसंख्या में 20.14 करोड़ दलित हैं. देश में कुल 543 लोकसभा सीट हैं. इनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 84 सीटों में से बीजेपी ने 41 पर जीत दर्ज की थी. दलित आबादी वाला सबसे बड़ा राज्य पंजाब है. यहां की 31.9 फीसदी आबादी दलित है और 34 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं.



उत्तर प्रदेश में करीब 20.7 फीसदी दलित आबादी है. राज्य की 17 लोकसभा और 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं. बीजेपी ने 17 लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में 76 विधानसभा आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी. हिमाचल में 25.2 फीसदी, हरियाणा में 20.2 दलित आबादी है. एमपी में दलित समुदाय की आबादी 6 फीसदी है जबकि यहां आदिवासियों की आबादी करीब 15 फीसदी है. पश्चिम बंगाल में 10.7, बिहार में 8.2, तमिलनाडु में 7.2, आंध्र प्रदेश में 6.7, महाराष्ट्र में 6.6, कर्नाटक में 5.6, राजस्थान में 6.1 फीसदी आबादी दलित समुदाय की है.

ग्रामीण भारत में भी बीजेपी को मिली है हार
मध्य प्रदेश की बात करें तो इस राज्य की कुल 230 सीटों में से 184 ग्रामीण सीटें हैं. साल 2013 में बीजेपी ने इनमें से 122 पर जीत हासिल की थी लेकिन 2018 में उसके हिस्से सिर्फ 84 सीटें ही आई हैं.उधर कांग्रेस के पास 2013 में 56 सीटें थीं जबकि इस बार उसने ग्रामीण इलाके की 95 सीटों पर कब्ज़ा जमाया है. राजस्थान की कुल 200 विधानसभा सीटों में से 162 सीटें ग्रामीण हैं. साल 2013 में बीजेपी ने इनमें से 131 सीटें जीती थीं जबकि 2018 में उसके हिस्से सिर्फ 56 सीटें ही आई हैं. उधर कांग्रेस के पास 2013 में सिर्फ 18 सीटें थीं जबकि इस बार उसने ग्रामीण इलाकों की 83 सीटों पर जीत हासिल की है. छत्तीसगढ़ की कुल 90 सीटों में से 78 ग्रामीण इलाकों की हैं. बीजेपी ने 2013 में ग्रामीण इलाकों की 41 सीट जीती थीं लेकिन 2018 में ये आंकड़ा पर पहुंच गया है जबकि कांग्रेस की सीटें 35 से बढ़कर 58 हो गयी हैं.
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