OPINION: राहुल गांधी से हटा 'पप्पू' का टैग, अब लोकसभा चुनाव में मोदी से दो-दो हाथ को तैयार

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

हिंदी हार्टलैंड के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को लोकसभा 2019 के लिए फिर से संजीवनी दे दी है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर अब राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुकाबिल माना जाने लगा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 12, 2018, 1:11 PM IST
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भवदीप कांग

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने हिन्दी हार्टलैंड में शानदार प्रदर्शन किया. पार्टी अध्यक्ष का पद संभालने के एक साल के बाद आए इन चुनावी नतीजों से राहुल गांधी सियासी समर में एक मजबूत योद्धा के रूप में उभरे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अजेय होने का आभास को भी धूमिल कर दिया है.

विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजे राहुल गांधी के सियासी करियर में बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है. राहुल ने आगे आकर प्रचार अभियान का नेतृत्व किया और परिणाम आने के पहले खुद को विपक्ष का एक महत्वपूर्ण चेहरा साबित किया.



हाल ही में उत्तर-पूर्व और दक्षिण में मिली हार के बाद हिंदी हार्टलैंड की सरजमीं ने लोकसभा 2019 के लिए कांग्रेस को फिर से संजीवनी दे दी है. हालांकि क्षेत्रीय दलों के हाथों तेलंगाना और मिजोरम में पार्टी की हार से राहुल के 'सर्वमान्य नेता' होने के टैग में कमी रह गई. हालांकि इस विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद राहुल गांधी के ऊपर से 'पप्पू' होने का टैग हट गया है. सोशल मीडिया पर कभी बड़ी बेअदबी से राहुल के लिए यह शब्द इस्तेमाल किया जाता रहा है.
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राहुल गांधी की कुछ रणनीतियां भले कामयाब नहीं रहीं. इसमें तेलंगाना में टीडीपी के साथ गठबंधन करना शामिल है. इसके साथ ही राजस्थान में अगर बागियों पर नियंत्रण होता तो परिणाम और बेहतर हो सकते थे. हालांकि मध्य प्रदेश में कमलनाथ को जिम्मेदारी और सॉफ्ट हिन्दुत्व पर ज्यादा जोर देकर तथा किसानों की समस्याओं को लेकर मुखर रहने की रणनीति काम कर गई.

विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी हार बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की हुई है. पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शाह के आलोचकों को अब उनकी जगह किसी दूसरे नेता को अध्यक्ष बनाने की बात को बल देने का मौका मिल गया है. ऐसा संभव है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव से बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन की मांग तूल पकड़ने लगे. हालांकि इसके दूसरे पहलू को देखें तो शाह, नामुमकिन को मुमकिन करने में लगे हुए थे. उन्हें नाराज किसानों और सत्ता विरोधी लहरों का सामना करना था.

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साल 2018 के विधानसभा चुनाव के परिणामों के आधार पर लोकसभा चुनाव की भविष्याणी का कोई ज्यादा महत्व नहीं है. राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर रुझान अलग-अलग होते हैं. साल 2003 में बीजेपी ने हिन्दी हार्टलैंड में जीत दर्ज की, लेकिन केंद्र में हार गई. वहीं साल 2008 में बीजेपी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत दर्ज की और फिर लोकसभा का चुनाव हार गई. साल 1998 में कांग्रेस, राजस्थान और मध्य प्रदेश जीत गई थी, लेकिन लोकसभा के चुनाव में उसे शिकस्त झेलनी पड़ी थी.

हिन्दी हार्टलैंड के इन चुनावी नतीजों को आगामी लोकसभा चुनाव से जोड़कर यह मानना कि छोटे शहरों और गांव से भी बीजेपी खारिज हो जाएगी, भ्रामक है. कांग्रेस ने तीनों राज्य में पूरी तरह से नकारात्मक वोट के बल पर जीत दर्ज की है, जिससे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मतदाताओं की नाराजगी का लाभ मिला.

कांग्रेस को मिले लाभ से राहुल गांधी के नेतृत्व को भी मान्यता मिलेगी. आंतरिक तौर पर प्रियंका ब्रिगेड के समर्थक अब शांत हो जाएंगे और राहुल की राजनीतिक योग्यता के संदेह पर भी विराम लग जाएगा. दूसरी ओर, बाहर से तो कांग्रेस जीत का आनंद उठाएगी, लेकिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों के हाथों मिली हार से सवाल जरूर उठेंगे.

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कांग्रेस के भीतर का एक वर्ग तेलंगाना में हार के लिए टीडीपी के साथ गठबंधन को दोषी ठहराएगा और राहुल से अपील करेगा कि वह विपक्ष की ओर से बनाए जा रहे महागठबंधन में समन्यवक चंद्रबाबू नायडू की जगह ले लें. इसमें सपा और बसपा को भी एक मंच पर लाने की जिम्मेदारी शामिल होगी. सपा और बसपा, गुरुवार को हुई महागठबंधन की मीटिंग में नहीं पहुंचे थे.

विधानसभा चुनाव के इन नतीजों के बाद ऐसे संकेत हैं कि अगले कुछ महीने में कांग्रेस जमीन पर अपनी ताकत बढ़ाने में जुट जाएगी. इसके साथ ही कई छोटे-बड़े अवसरवादी नेता अपने समर्थकों के साथ घर वापसी करेंगे. अगर कुछ और नहीं भी किया गया तो उनकी पद उन्हें दिया जाएगा, जिससे यह महसूस हो कि वह 2019 में साथ हैं.

साल 2019 के लिए दोनों दलों के लिए रास्ता आसान नहीं है. 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए पारंपिक तौर पर कैंपेनिंग की गई, जो आर्थिक और प्रशासनिक मुद्दों जैसे, बेरोजगारी, किसानों का गुस्से समेत कई अन्य मुद्दे हैं, जिस पर बीजेपी बैकफुट पर थी.

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लोकसभा 2019 के लिए प्रचार अभियान तीन कारणों से अलग होगा. सबसे पहले, अभियान का केंद्र और चेहरा प्रधानमंत्री होंगे. दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दौरान राम जनमभूमि का मुद्दा जोर-शोर से खेला जाएगा. विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने दिल्ली में एक सफल रैली के साथ अभियान को पहले ही इस पर चेता दिया है.

तीसरा कारण यह है कि मोदी और आरएसएस घेरेबंदी में माहिर हैं. विश्लेषकों ने हिंदू राष्ट्र को खारिज कर दिया है, लेकिन हिंदू वोट को मजबूत करने के लिए वे इसे पुनर्निर्मित करने में काफी सक्षम हैं.
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