Exit Poll 2018: क्या इस बार सच साबित होंगे एग्जिट पोल?

Exit Poll 2018: क्या इस बार सच साबित होंगे एग्जिट पोल?
प्रतीकात्मक फोटो

एग्जिट पोल २०१८: आखिर इतना हाईटेक होने के बाद भी ये एग्जिट पोल एक दम सही आंकड़ों का पता नहीं क्यों नहीं लगा पाते है. इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमने एग्जिट पोल कराने वाली एजेंसियों से बात की.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 7, 2018, 5:44 PM IST
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पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में वोट डाले जाने के बाद से ही सबकी नजर एग्जिट पोल पर टिकी है लेकिन क्या ये एग्जिट मतदाता का नब्ज पहचानने में कारगर रहते हैं. इस सवाल के जवाब कभी हां तो कभी ना में होता है. आखिर इतना हाईटेक होने के बाद भी ये एग्जिट पोल एक दम सही आंकड़ों का पता नहीं क्यों नहीं लगा पाते है. इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमने एग्जिट पोल कराने वाली एजेंसियों से बात की.

एग्जिट पोल करने वालों के अपने तर्क हैं. सिसरो के निदेशक धनंजय जोशी की मानें तो लगातार कोशिश के बाद भी आंकड़ों के सही नहीं होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण मेल एंड फॉरवर्ड डॉमिनेटिंग फैक्टर है. इसको समझने के लिए एग्जिट पोल कराने वाली एजेंसी के सैंपल लेने के तरीके को समझना होगा. दरअसल सैंपल लेने के लिए एजेंसियां मतदान केन्द्र के बाहर वोट डालकर बाहर आने वालों से बात करती है. कभी यह 8 लोगों से बात करते हैं तो कभी 10 लोगों से.

वे कहते हैं, 'महिलाएं और आदिवासी लोग अभी भी मीडिया से उतना खुलकर बात नहीं करते जितना की पुरुष और सवर्ण मतदाता करते हैं. ऐसे में सवर्ण और पुरुष मतदाताओं की संख्या ज्यादा हो जाती है जिसका असर एग्जिट पोल के नतीजों पर पड़ता है. हालांकि उसके सुधार के लिए कई बार महिलाओं और पिछड़े आदिवासी मतदाता को संख्या के हिसाब से परसेंटेज में शामिल किया जाता है. लेकिन फिर भी ये सख्या बराबरी की नहीं होती.'



धनंजय जोशी की राय से सी-वोटर के निदेशक यशवंत देशमुख इतेफाक नहीं रखते. देशमुख का मानना है कि महिला और दलित आदिवासी और सवर्ण वोटरों की संख्या के हिसाब से उनको प्रतिशत देकर इस गड़बड़ी को दुरुस्त किया जा सकता है. लेकिन आंकड़े सटीक न होने के लिए उनका अलग तर्क है. यशवंत की मानें तो आंकड़ों का खेल बाजार बिगाड़ रहा है. दरअसल हर न्‍यूजरूम अपने दर्शकों को सीधे-सीधे सीटों के गणित समझाता है लेकिन एक्जिट पोल में ऐसा कोई आंकड़ा आता ही नहीं जिससे सीटों के समझा जा सकता है. ये जरूरी नहीं है कि ज्यादा वोट परसेंटेज पाने वाली पार्टी सबसे बड़ी पार्टी हो जबकि न्यूजरूम में ज्यादा सीट पाने वाली पार्टी को सबसे बड़ा पार्टी बना दिया जाता है.
उन्‍होंने बताया कि 2004 के आम चुनाव और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. जब ज्यादा वोट प्रतिशत पाने वाली पार्टियां सीटों के मामले में पीछे रह गई. यशवंत का यह भी मानना है कि कई बार ऐसा भी होता है जब न्यूज़ रुम में बैठे लोग प्लस-माइनस के आंकड़ों को भी अपने हिसाब से बदल देते हैं उसका असर एग्जिट पोल के पूरे परिणाम पर पड़ता है.
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