ANALYSIS: क्या मोदी सरकार के पास 2019 जीतने का सिर्फ एक ही रास्ता बचा है?

ANALYSIS: क्या मोदी सरकार के पास 2019 जीतने का सिर्फ एक ही रास्ता बचा है?
पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

पिछले कुछ विधानसभा चुनावों के नतीजों के आधार ये बात सही नज़र आती है कि जिस भी पार्टी ने सत्ता में आकर किसानों का कर्ज माफ़ करने की घोषणा की, ग्रामीण इलाकों में उसे बढ़त मिलती हुई नज़र आई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 13, 2018, 3:08 PM IST
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राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार के बाद बीजेपी के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव पहले से ज्यादा मुश्किलों भरा हो गया है. विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद ये साफ़ हो गया है कि नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारी और किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादों पर ही जनता मोदी सरकार को टेस्ट कर रही है. तीनों ही राज्यों के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा. सवाल ये है कि क्या इस सबक के बाद मोदी सरकार कर्ज माफी को लेकर अपनी रणनीति पर फिर विचार करेगी?

जो कर्ज माफ़ करेगा उसे ही वोट मिलेगा!
पिछले कुछ विधानसभा चुनावों के नतीजों के आधार ये बात सही नज़र आती है कि जिस भी पार्टी ने सत्ता में आकर किसानों का कर्ज माफ़ करने की घोषणा की, ग्रामीण इलाकों में उसे बढ़त मिलती हुई नज़र आई. उत्तर प्रदेश, पंजाब, कर्नाटक और हाल ही में हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों को इसके उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने साल 2008 में किसानों का 72 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ किया और उसे 2009 लोकसभा चुनावों में इसका सीधा फायदा भी हुआ.  मध्य प्रदेश की 126 ग्रामीण सीटों में से 2013 में 38 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार बढ़त लेकर 68 सीटों पर पहुंच गई है.


2014 में पीएम मोदी ने भी किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था. साल 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कर्जमाफ़ी का वादा किया और ग्रामीण इलाकों में उसे अभूतपूर्व सफलता हासिल हुई. 2017 के पंजाब विधानभा चुनाव और 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भी कर्जमाफी का ये फॉर्मूला हिट रहा. मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने 10 दिन में किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया था और अब दोनों ही जगह कांग्रेस की सरकार बनती नज़र आ रही है. हालांकि अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार 26.3 करोड़ किसानों का 4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज माफ़ करने के लिए तैयार है?



मोदी सरकार ने भी कोशिशें की
मोदी सरकार ने कर्जमाफी की जगह किसानों की आय दोगुनी करने के लिए अशोक दलवई की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जो कृषि सुधारों संबंधी अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है. हालांकि नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डवलपमेंट यानी नाबार्ड का सर्वे कह रहा है कि बीते चार सालों में किसानों की आय सिर्फ 2505 रुपए ही बढ़ सकी है. गांवों में रहने वाले 41% से ज्यादा परिवार अभी भी कर्जे में दबे हैं और इनमें से 43% वो हैं जिनकी आय कृषि पर निर्भर हैं.

डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अशोक दलवाई का कहना है कि किसानों की प्रोडक्टिविटी बढ़ जाए, उत्पादन लागत कम हो, मार्केट मिल जाए और उचित मूल्य मिले तो किसानों की आय दोगुनी करने का सपना साकार हो सकता है. इस दिशा में सरकार काम कर रही है. पहले सिर्फ कृषि के बारे में सोचा जाता था लेकिन पहली बार किसानों के बारे में भी सोचा गया है, ताकि वह खुशहाल हों. कितनी उपज हुई इसके साथ-साथ यह बहुत महत्वपूर्ण है कि किसान को लाभ कितना मिला.

किसानों की हालत क्या?
NAFIS सर्वे के मुताबिक गांव में रह रही आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी किसानी या दिहाड़ी मजदूरी से अपना खर्चा चला रहा है. गांव में रह रहे परिवार की औसत आमदनी 8,931 रुपए है जिसका सबसे बड़ा हिस्सा 3140 रुपए करीब 35% अभी भी किसानी से ही आ रहा है. इस आमदनी का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा 3025 रुपए करीब 34% दिहाड़ी मजदूरी से आ रहा है. सरकारी या प्राइवेट नौकरी से अभी भी सिर्फ 1444 रुपए सिर्फ यानी ग्रामीण आमदनी का सिर्फ 16% हिस्सा ही आ रहा है.



बकाया कर्ज के मामले में आईओआई की रिपोर्ट के मुताबिक कृषि से जुड़े 52.5 प्रतिशत परिवारों और 42.8 प्रतिशत गैर-कृषि परिवारों कर्ज में दबे हैं. हालांकि सर्वे कहता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के 88.1 प्रतिशत परिवारों के पास बचत खाते हैं और 55% किसान परिवारों के पास भी बैंक खाता उपलब्ध है. किसान परिवारों की सालाना बचत औसतन 17,488 रुपए है. कृषि से जुड़े करीब 26 प्रतिशत परिवार और गैर-कृषि क्षेत्र के 25 प्रतिशत परिवार बीमा के दायरे में है. इसी प्रकार, 20.1 प्रतिशत कृषक परिवारों ने पेंशन योजना ली है जबकि इसके मुकाबले 18.9 प्रतिशत गैर-कृषक परिवारों के पास पेंशन योजना है.

एक ग्रामीण परिवार की औसत सालाना आय 1,07,172 रुपये है, जबकि गैर-कृषि गतिविधियों से जुड़े परिवारों की औसत आय 87,228 रुपए है. हालांकि 2016 के आर्थिक सर्वे पर नज़र डालें तो कृषि पर निर्भर प्रमुख 17 राज्यों में किसानों की सालाना आय का औसत बीस हज़ार रुपए है. इस हिसाब से किसान हर महीने क़रीब 1,700 से 1,800 रुपए में अपने परिवार को पाल रहा है. एसोचैम के एक अनुमान के मुताबिक देश में कृषि इसलिए घाटे का सौदा साबित हो रही है क्योंकि हम जि‍स फल या सब्‍जी के लि‍ए दि‍ल्‍ली में 50 रुपए देते हैं. उसका व्‍यापारी कि‍सान को 5 से 10 रुपए ही देता है.


किसानी आसान नहीं
बता दें कि साल 2014 और 2015 लगातार दो साल पड़े सूखे ने कृषि क्षेत्र की कमर तोड़ दी थी. उधर, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में पड़े सूखे ने किसानों की मुश्किलों को और बढ़ाया हुआ है. खेती के लिए सिंचाई महत्वपूर्ण है और भारत में ज्यादातर खेती योग्य भूमि के लिए किसान मॉनसूनी बारिश पर निर्भर रहते हैं. केंद्र ने 40,000 करोड़ का दीर्घकालिक सिंचाई फंड (नाबार्ड द्वारा संचालित) देने की घोषणा की थी और 99 बड़े सिंचाई प्रॉजेक्टों को दिसंबर 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य था हालांकि ये प्रोजेक्ट 50% भी पूरा नहीं हो पाया है.

GDP में कृषि क्षेत्र का शेयर 1990 में 29 फीसदी से 2016 में 17% पर आ गया लेकिन यह क्षेत्र अब भी रोजगार देने में सबसे आगे है. कृषि जनगणना 2016 के अनुसार केवल 5 फीसदी किसान ऐसे हैं जो 4 हेक्टेयर्स से ज्यादा जमीन पर खेती करते हैं. भारत में वैश्विक उत्पादन की तुलना में चावल का उत्पादन करीब 3 गुना कम है जबकि आम, केला, प्याज और टमाटर का उत्पादन 2 से 7 गुना कम है. सरकार द्वारा नियुक्त एक पैनल ने सुझाव दिया है कि FCI गेहूं, धान और चावल की खरीद के सभी ऑपरेशनों को राज्यों को सौंप दे, जिन्हें इस क्षेत्र का अनुभव है और उन्होंने खरीद प्रक्रिया के लिए पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है. किसानों को सीधे कैश सब्सिडी (7000 रुपया/हेक्टेयर) दिए जाने का भी प्रस्ताव है. हालांकि लगातार बंद होते जनधन खाते इस पर भी सवाल खड़े करने लगे हैं.



एग्रो इकॉनोमिस्ट देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि हम अर्थव्यवस्था के जिस मॉडल को आगे बढ़ा रहे हैं उसमें किसानों की कोई जगह ही नहीं है. वो उदाहरण देते हुए कहते हैं कि साल 1970 में गेहूं की एमएसपी 76 रुपए थी जो साल 2015 तक बढ़कर 1450 रुपए हो गई. इस बढ़ोत्तरी को अगर बाकी प्रोफेशन की तनख्वाह या आमदनी में बढ़ोत्तरी से तुलना की जाए तो ये सिर्फ 19% ही है. कृषि क्षेत्र में ध्यान न देने से हर साल किसानों को 12 लाख 80 हज़ार करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है.

बैंक और आरबीआई कर्जमाफी के पक्ष में नहीं
बता दें कि किसान कर्ज माफी का विरोध करने वालों में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल समेत डिप्टी गवर्नर एस.एस. मूंदड़ा भी शामिल थे. कर्जमाफी का विरोध करते हुए मूंदड़ा ने कहा था कि इससे कर्ज लेने और देने वाले के बीच अनुशासन बिगड़ता है. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया था कि यह रिजर्व बैंक का रुख नहीं बल्कि उनका निजी रुख है. बहरहाल, रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी कर्जमाफी के जरिए राजनीति सफल करने को ‘नैतिक रूप से गलत’ मानते थे. देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की 2017 में चेयरपर्सन रहीं अरुंधति भट्टाचार्य ने भी किसान कर्जमाफी पर आपत्ति जताई थी. भट्टाचार्य ने भी इससे बैंकिंग अनुशासन बिगड़ने की बात कही थी. उन्होंने कहा था कि कर्ज लेने वाले कर्ज चुकाने के बजाय अगले चुनाव का इंतजार करने लगते हैं.
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