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भारतीय राजनीति में नहीं मिलेगा करुणानिधि जैसा नेता, बनाया है ये रिकॉर्ड

News18India.com
Updated: May 19, 2016, 9:02 AM IST
भारतीय राजनीति में नहीं मिलेगा करुणानिधि जैसा नेता, बनाया है ये रिकॉर्ड
एम करुणानिधि जैसा नेता भारतीय राजनीति में एक किवदंती की तरह है। अपनी कलम के बूते इस शख्‍सियत ने न केवल समाज को बदला बल्‍कि दक्षिण भारत की सियासत का सिरमौर बन बैठा..!

एम करुणानिधि जैसा नेता भारतीय राजनीति में एक किवदंती की तरह है। अपनी कलम के बूते इस शख्‍सियत ने न केवल समाज को बदला बल्‍कि दक्षिण भारत की सियासत का सिरमौर बन बैठा..!

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तमिलनाडु ही नहीं बल्‍कि देश की सियासत के कद्दावर नेता मुत्तुवेल करुणानिधि ऊर्फ एम.करुणानिधि दक्षिण भारत की राजनीति में अपना एक अलग प्रभाव और दबदबा रखते हैं। 93 वर्षीय इस बेहद वरिष्‍ठ राजनेता की राजनीति में पहुंचने की कहानी भी बड़ी दिल्‍चस्‍प है। वे पहले फिल्‍म पटकथा, लेखक थे और फिल्‍मी पर्दे पर दर्शाई गई उनकी इन्‍हीं कहानियों ने उनके लिए राजनीति का रास्‍ता तैयार किया।

करुणानिधि का जन्‍म 3 जून 1924 तमिलनाडु के नागपट्टिनम के तिरुक्कुभलइ में हुआ। ईसाई समुदाय से संबंध रखने वाले करुणानिधि मूलत: एक फिल्‍म पटकथा लेखक रहे, लेकिन फिल्‍मों की यह दुनिया उन्‍हें ज्‍यादा दिनों तक रास नहीं आई और वे दक्षिण भारत के बड़े सामाजिक प्रभाव वाले नेता बन गए।

फिल्‍म पटकथा से लेकर राजेनता तक का सफर : करुणानिधि ने तमिल फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक के रूप में कॅरियर शुरू किया, लेकिन जल्‍द ही व्‍यवहारिक समझ, कुशलवक्‍तृत्‍व कला के बूते वे राजनेता बन गए। करुणानिधि ईवी रामास्‍वामी पेरियार के द्रविड़ आंदोलन से जुड़े थे और उस आंदोलन के प्रचार में उन्‍होंने अहम भूमिका अदा की। दरअसल वे सामाजिक बदलाव को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक कथाएं लिखने के लिए लोकप्रिय रहे थे और अपनी इसी कहानी कथन प्रतिभा का इस्‍तेमाल उन्‍होंने तमिल सिनेमा में किया और एक फिल्म 'पराशक्ति' के जरिये राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया।

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पराशक्ति तमिल सिनेमा जगत के साथ-साथ करुणानिधि की जिंदगी का भी एक अहम मोड़ साबित हुई क्योंकि इसने द्रविड़ आंदोलन की विचारधाराओं का समर्थन किया और तमिल फिल्म जगत के दो प्रमुख अभिनेताओं, शिवाजी गणेशन और एस. एस. राजेन्द्रन से दुनिया को परिचित करवाया। इसके बाद करुणानिधि ने अपनी सामाजिक बदलाव की कहानियों को फिल्‍मी पर्दे पर जीवंत करना शुरू किया और वे लगातार फिल्मों में विधवा पुनर्विवाह, अस्पृश्यता का उन्मूलन, आत्मसम्मान विवाह, ज़मींदारी का उन्मूलन और धार्मिक पाखंड के मुद्दे उठाते गए और लोकप्रिय होते गए।

राजनीति में प्रवेश : करुणानिधि का राजनीति की ओर रुझान तो बचपन से ही था और उन्‍होंने 14 साल की उम्र से ही राजनीति रास आने लगी। लेकिन राजनीति में प्रवेश स्टिस पार्टी के अलगिरिस्वामी के एक भाषण से प्रेरित होकर हुआ। उन्होंने अपने इलाके के स्थानीय युवाओं के लिए एक संगठन की स्थापना की और बाद में मनावर नेसन नामक एक हस्तलिखित अखबार भी चलाया। बाद में उन्होंने तमिलनाडु तमिल मनावर मंद्रम नामक एक छात्र संगठन की स्थापना की जो द्रविड़ आन्दोलन का पहला छात्र विंग था।

ऐसे मिली सत्‍ता : करूणानिधि ने बाकायादा विधायक के रूप में तमिलनाडु की सियासत में प्रवेश सन् 1957 में किया, जब वे तिरुचिरापल्ली जिले के कुलिथालाई विधानसभा से जीते। इसके बाद वे 1961 में डीएमके कोषाध्यक्ष बने और 1962 में राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने और 1967 में जब डीएमके सत्ता में आई, तब वे सार्वजनिक कार्य मंत्री बने। उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब 1969 में डीएमके (द्रविड मुनैत्र कसगम) के संस्‍थापक अन्नादुरई की मौत हो गई और वे अन्‍नादुरई के बाद न केवल डीएमके का न केवल चेहरा बने, बल्‍कि पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उनकी पहचान बनी।
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Vishwanath Pratap Singh, Former Prime Minister with SR Bommai, NT Rama Rao, M Karunanidhi, Ajit Singh and other Leaders at Pro Reservation Rally ( Backward Classes, Profile )

सियासत और परिवार का मेजलजोल : तमिलनाडु में फिल्‍मी पर्दे से निकलकर सियासत में चमकने वाले करुणानिधि राजनीति के सिरमौर बन जाने के बाद जल्‍द ही विवादों में भी घिर गए। उनके ऊपर सबसे बड़ा आरोप लगा परिवारवाद और वंशवाद की राजनीति का लगा। दरअसल करुणानिधि का निजी जीवन भी कम उतार-चढ़ाव वाला नहीं रहा।

M Karunanidhi arrives in Delhi to meet Kanimozhi

करुणानिधि ने तीन बार शादियां की, उनकी तीनों पत्‍नी पद्मावती, दयालु आम्माल और राजात्तीयम्माल। उनके बच्‍चे एम.के. मुत्तु, एम.के. अलागिरी, एम.के. स्टालिन और एम.के. तामिलरसु जबकि पुत्रियां सेल्वी और कानिमोझी रहीं। पद्मावती, जिनका देहावसान काफी जल्दी हो गया था, ने उनके सबसे बड़े पुत्र एम.के. मुत्तु को जन्म दिया था। अज़गिरी, स्टालिन, सेल्वी और तामिलरासु दयालुअम्मल की संताने हैं, जबकि कनिमोझी उनकी तीसरी पत्नी राजात्तीयम्माल की पुत्री हैं।

करुणानिधि पर आरोप है कि करूणानिधि मुख्यमंत्री रहते हुए अपने पुत्र स्‍टालिन को 1989 और 1996 में चुनावी जंग में उतारा और जितवाया, हालांकि स्‍टालिन को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था। यही नहीं करुणानिधि पर यह भी आरोप है कि उन्‍होंने पार्टी का चेहरा स्‍टालिन को बनाने के लिए वाइको जैसे सहयोगी को पार्टी से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिया।

Actor Khushboo joins DMK

परिवार को धोखा देने का आरोप : करुणानिधि पर उनके भतीजे मुरोसिलिनी मारन को भी धोखा देने का आरोप है। करुणानिधि ने न केवल मुरोसिलिनी मारन जैसे जमीनी नेता को पार्टी से साइड लाइन किया बल्‍कि मुरोसिलिनी मारन के दोनों बेटों कलानिधि और दयानिधि मारन के लिए भी दिक्‍क्‍तें पैदा कीं। हालांकि विवाद से पहले कलानिधि मारन (मुरासोली मारन के पुत्र) की मदद करने का आरोप लगाया गया है। फोर्ब्स के मुताबिक कलानिधि भारत के 2.9 बिलियन डॉलर की संपत्ति वाले 20 सबसे बड़े रईसों में से हैं।

नहीं है भारतीय राजनीति में ऐसा नेता : करुणानिधि जैसा नेता पूरे भारतीय राजनीति में बेहद अलग है। उनके नाम एक ऐसा रिकॉर्ड है, जो किसी के पास नहीं है। दरअसल करुणानिधि ने अपने 60 साल के राजनीतिक कॅरियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया है, ऐसा नेता पूरे भारत में कोई नहीं है। वे पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

यही नहीं उन्‍होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु और पुदुचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए (यूपीए और वामपंथी दल) का नेतृत्व किया और लोकसभा की सभी 40 सीटों को जीत लिया। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने डीएमके द्वारा जीती गई सीटों की संख्या को 16 से बढ़ाकर 18 कर दिया और तमिलनाडु और पुदुचेरी में यूपीए का नेतृत्व कर बहुत छोटे गठबंधन के बावजूद 28 सीटों पर विजय प्राप्त की. करुणानिधि उनके समर्थक उन्हें कलाईनार, जिसे तमिल में कला का विद्वान" कहते हैं, कहकर बुलाते हैं।

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First published: May 19, 2016, 8:57 AM IST
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